दिनांक 11 फरवरी 2018, स्थान - श्री हनुमान मंदिर, पावन यज्ञस्थली कैथा से, गढ़/गंगेव रीवा मप्र
(शिवानंद द्विवेदी, रीवा मप्र)
पावन यज्ञस्थली कैथा में चल रहे शिव महापुराण कथा के नौवें दिन उमा संहिता का वर्णन चल रहा है जिसके अंतर्गत नरक के विभिन्न स्वरूपों का निरूपण, शक्ति के विभिन्न अवतारों का वर्णन, दान और तप के प्रभाव से नरक के प्रभाव का कम होना, जम्बूदीप का निर्धारण सहित छः द्वीपो का निरूपण, मृत्यु ज्ञान का वर्णन, ब्रह्मांड के वर्णन में पाताल का निरूपण, योगियों की शक्ति से काल प्रभाव निवारण, चौदह मन्वंतर का वर्णन, राजा सुरथ की कथा, देवी का अवतरण, महालक्ष्मी, महाकाली, सरस्वती, एवं महा दुर्गा शक्ति का अवतरण और शुम्भ निशुम्भ, मधु कैटभ, रक्तबीज आदि असुरों का देवी द्वारा संहार आदि कथा प्रसंग निरंतर चल रहे हैं।
शिवमहापुराण महायज्ञ के अगले कथा प्रसंगों में कैलाश संहिता और वायवीय संहिता का वर्णन किया जाएगा।
"शिव और शक्ति एक दूसरे के पूरक हैं, शिव-शक्ति की अभिन्नता का यथार्थ है भगवान शिव का अर्धनारीश्वर स्वरूप"
शिव और शक्ति एक दूसरे से अभिन्न हैं।
शास्त्रों में बताया गया है कि शिव साकार एवं निराकार दोनो स्वरूपों में विद्यमान हैं परंतु यह दोनों स्वरूप अभिन्न हैं। जब ब्रह्मांड अव्यक्त रूप में होता है तब शिव निराकार स्वरूप में विद्यमान रहते हैं। शिव लिंग का कुछ अण्डाकार स्वरूप भी इसी शिव के निराकार स्वरूप को दर्शाता है। लिंग का तात्पर्य प्रतीकात्मक चिन्ह से होता है। शिव लिंग की मानव लिंग से तुलना करने के सभी कथानक व्यर्थ हैं और बहुत गलत भ्रामक अवधारणा है। यह गलत अवधारणा हिन्दू धर्म को कुंठित कर नुकसान पहुचने वाले तत्वों द्वारा किया गया है।
जब सृस्टि का सृजन होता है तो शिव को स्वयं में निहित शक्ति का प्रादुर्भाव करना पड़ता है। कहते हैं कि शक्ति के बिना शिव शव जैसे हैं, तात्पर्य यह है कि किसी प्रकार के सृजन के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है। जब शिव में शक्ति का प्रादुर्भाव होता है तब शिव- शक्ति की पूर्णता से सृस्टि का प्रादुर्भाव, संचालन एवं अंततः पुनः प्रलय होता है।
यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे" अर्थात जो इस पिण्ड रूपी शरीर मे है वही इस ब्रह्मांड में है -
शास्त्रों में कहा गया है 'एक एवं तदा रुद्रो न द्वितीयो असनि कश्चन' अर्थात सृष्टि के प्रारंभ में एक ही रुद्र विद्यमान रहते हैं दूसरा कोई नही होता। रुद्र रूपी परम शिव ही तीनो रूपों में विद्यमान हैं और इस जगत की सृष्टि, पालन और अधर्म अत्याचार बढ़ने पर प्रलय करते हैं।
"रु" का अर्थ दुःख से है और "द्र" का तात्पर्य द्रवित करना अथवा हटाने से है। अर्थात रुद्र का तात्पर्य है दुःख को हरने या हटाने वाला। शिव सर्वव्यापक सर्वात्मा, सर्वज्ञ एवं सम्पूर्ण ब्रह्मांड का आधार हैं।
"अहं शिवः शिवश्चर्य, त्वं छापी शिव एवं हि।
सर्व शिवमयं ब्रह्म शिवत्त्परं न किंचन।।"
अर्थात मैं शिव, तू शिव, यह जगत शिव, यह ब्रह्मांड शिव, शिव से परे कुछ भी नही इसीलिए कहा गया है - 'शिवोदाता, शिवोभोक्ता, शिवं सर्वमिदं जगत। शिव ही दाता हैं, शिव ही भोक्ता हैं, जो दिखाई पड़ रहा है यह सब शिव ही है, शिव का अर्थ है जिसे सब चाहते हैं। सभी अखंड आनंद, अखंड कल्याण, और अखंड मंगल चाहते हैं और वह सब शिव तत्व में ही निहित हूं अतः शिव की भक्ति में रत होते हुए सम्पूर्ण जीवन शिवमय कर देना और सर्व कल्याण जगत कल्याण के भाव से कर्म करते हुए शिव अर्थात परम ब्रह्म को समर्पित कर देना ही मॉनव का उद्देश्य होना चाहिए।
!!!!बम बम भोले, हर हर महादेव!!!!
संलग्न - श्रीशिवमहापुरण महायज्ञ कथा श्रवण उपस्थित शिव भक्त श्रद्धालु गण।
- शिवानंद द्विवेदी, संयोजक एवं प्रचारक श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति भारत।
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