Wednesday, 7 February 2018

Rewa, MP - कैथा में शिवमहापुराण महायज्ञ का पांचवां दिन - कुमारखंड एवं युद्ध खंड का चल रहा वर्णन, तारकासुर एवं त्रिपुरासुर का वध, असुर जालंधर का वर्णन

दिनाँक 7 फरवरी 2018, स्थान - पावन यज्ञस्थली कैथा से, रीवा मप्र।

(शिवानंद द्विवेदी, रीवा मप)

     दिनाँक 31 जनवरी से प्रारंभ हुआ महाशिवरात्रि महोत्सव यज्ञों की पावन स्थली कैथा के श्री हनुमान मंदिर कैथा में निरंतर चल रहा है। इस बीच श्रीशिवमहापुरण कथा के पांचवें दिन कुमारखंड एवं युध्य खण्ड का वर्णन हुआ। आचार्य श्री चंद्रमणि प्रसाद पयासी जी ने कथा के अगले चरण में शिव पार्वती का विवाह, कार्तिकेय का सरखंडों के बीच मे जन्म, तारकासुर, त्रिपुरासुर का राक्षसी उत्पात, इन्द्रादि देवों का भयाक्रांत होकर पलायन करना, कुमार द्वारा तारकासुर का वध, शिवजी तीनों पुरों सहित त्रिपुरासुर को भस्म करना और इसीलिए शिवजी का नाम त्रिपुरारी पड़ना, पार्वती द्वारा गणेश जी का निर्माण कर अपनी सुरक्षा में नियुक्त करना, शिवगणों का गणेश के साथ युद्ध, शिवगणों का परास्त होकर शिव को सूचित करना, शिव द्वारा त्रिशूल से गणेश का सिर काटना, पार्वती जी का कुपित होना, गणेश के हांथी का सिर लगाना, शिव की नेत्राग्नि से जालंधर नामक असुर की उत्पत्ति, जालंधर की पत्नी का विष्णु द्वारा पतिव्रत भंग करना जिससे जालंधर को परास्त किया जा सके, विष्णु को श्राप, जालंधर से भीषण युध्य आदि कथा प्रसंग चल रहे हैं।

   सर्वं खल्विदं ब्रह्म अर्थात सभी जड़ चेतन ईश्वर से ही आच्छादित है - 

        ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या अर्थात मात्र ब्रह्म ही सत्य है और जगत माया का खेल मात्र है   का उद्घोष आचार्य आदि शंकर ने अपने अद्वैत वेदांत में किया। भीषण रण क्षेत्र में जब अर्जुन अपने स्वजनों को देख मोहित हुए तब उनको गीता का ज्ञान देते हुए श्रीकृष्ण ने यह अर्जुन को महाभारत काल मे ही स्पष्ट कर दिया कि हे अर्जुन यह जो भी दृश्य जगत है यह होते हुये भी नही है। क्योंकि यह जगत परिवर्तनशील है और जो हर क्षण बदलने वाला हो वह मात्र माया का खेल ही हो सकता है वह सत्य कदापि नही हो सकता क्योंकि सत्य अपरिवर्तनीय है। आगे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता के विभूतियोग में बताया कि इस चराचर स्थावर जंगम जगत में सब कुछ ईश्वर के ऊपर ही टिका है और सभी मे मैं अर्थात ईश्वर ही विद्यमान है और इसी से स्पष्ट हो जाता है कि क्योंकि सभी मे एक वही परमात्मा है अतः यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड अद्वैत ही है। अब इस अद्वैत को कैसे अनुभव किया जाय यह तब तक संभव न होगा जब तक हमारे ज्ञान चक्षु न खुलेंगे।

      इस प्रकार आदि आचार्य शंकर ने जो अद्वैत वेदांत की महिमा का गुणगान अपने ग्रंथों में किया है वह भारतीय संस्कृति के मूल में है क्योंकि भारतीय संस्कृति वसुधैव कुटुम्बकम, अहिंसा, एकोब्रह्मद्वितीयोनास्ति, सर्वे भवन्तु शुखिनः की जो बात निरंतर करती आई है वह अद्वैत वेदांत से ही प्रेरित है जिसमे किसी भी जीव मात्र की बिना कारण हत्या करना हिंसा करना अपने आप अर्थात ईश्वर को कष्ट देने जैसा है।

    कैथा की पावन भूमि पर चल रहे श्री शिवमहापुराण कथा का श्रवनपान करने के लिए आप सभी को सादर आमंत्रित किया जाता है। भंडारा एवं हवन का कार्यक्रम महाशिवरात्रि 13 फरवरी को रखा गया है।

संलग्न - श्रीशिवमहापुरण कथा स्थल की फ़ोटो एवं उपस्थित भक्त श्रद्धालुजनों के छयाचित्र।

  - शिवानंद द्विवेदी, संयोजक एवं प्रचारक श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति भारत।

     7869992139

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