स्थान – कैथा-गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 10.10.2016, दिन सोमवार,
(कैथा-गढ़, रीवा) पवित्र यज्ञस्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा में दिनांक 10 अक्टूबर को नवरात्रि आयोजन के दसवें और आश्विन शुक्ल की नौवीं तिथि को देवी सिद्धिदात्री की पूजा आराधना की गयी. इस दिन शाक्त योगी-साधकों और हिन्दू धर्मावलम्बियों का ध्यान “निर्वाण चक्र” में स्थित होता है. निर्वाण चक्र सहस्रार चक्र का ही उपचक्र है. आज्ञा और सहस्रार चक्र के मध्य भी जो अन्य सूक्ष्म ज्योति और ऊर्जा केंद्र योगी-साधकों द्वारा अनुभव किये गए हैं वह भानु, सोम और निर्वाण चक्र हैं. सोम, भानु और निर्वाण सभी सहस्रार के ही उपचक्र अर्थात ऊर्जा केंद्र होते हैं जहाँ पर ध्यान केन्द्रित कर योगी साधक कुण्डलिनी और अष्टांग योग का अनुसरण करते हैं और मोक्ष की दिशा में अग्रसर होते हैं. निर्वाण का तात्पर्य मोक्ष से है. सिद्धिदात्री देवी का संस्कृत अनुवाद है सभी प्रकार की शास्त्रविहित सिद्धियाँ प्रदान करने वाली इसीलिए इसे सिद्धिदात्री देवी कहा जाता है.
श्रृष्टि निर्माण के समय शक्ति का प्रथम स्वरुप हैं सिद्धिदात्री -
सिद्धिदात्री देवी इस श्रृष्टि निर्माण के समय परमेश्वर द्वारा आवाहन करने पर प्रथम देवी शक्ति का अवतार मानी जाती हैं. ईश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, अन्तर्यामी, आदि उपाधियों से विभूषित बताया गया है. यह सब उपाधियाँ ईश्वर में स्वयम्भू विराजमान है. ईश्वर को किसी के सहारे और शक्ति की आवश्यकता नहीं होती. स्वयं शक्ति भी उसी का स्वरुप हैं शक्ति ब्रह्म या परमेश्वर से पृथक नहीं हैं. इसीलिए शिव-शक्ति स्वरुप में उसे अर्ध-नारीश्वर भी दिखाया और चित्रण किया गया है. अर्ध-नारीश्वर का अवतार हमारे भारतीय संस्कृति की अति उच्च बुद्धिमत्ता और सोच का परिणाम है. ईश्वर को अर्ध-नारीश्वर के रूप में चित्रण और इसके दर्शन की व्याख्या कोई सामान्य संस्कृतियों का कार्य नहीं हो सकता और यह कार्य अति विकसित संस्कृति और बौद्धिक परंपरा का ही हो सकता है. भारतीय संस्कृति में ईश्वर का अर्ध-नारीश्वर स्वरुप भारतीय और आचार्य शंकर के अद्वैत के सिद्धांत का अत्यंत सुन्दर चित्रण है. यह उन संस्कृतियों के मुह में जोरदार तमाचा भी है जो स्त्री शक्ति को पुरुष शक्ति से अलग और कमतर कमज़ोर मानते हैं. कुछ पाश्चात्य संस्कृतियों में मध्यकालीन और उससे भी पूर्व नारी जाति में आत्मा न होना बताया जाता था और नारियों को चुड़ैल बताया जाता था वह नारी शक्ति के लिए सबसे कठिन समय रहा होगा.
नारी शक्ति का ईश्वरीय देवी रूप में चित्रण उत्कृष्ट संस्कृति की पहचान -
भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति को माता समझ कर उसकी पूजा आराधना का पर्व है नवरात्रि. शायद किसी भी संस्कृति में नारी शक्ति को इतनी महत्वा कभी नहीं दी गयी जितनी भारतीय संस्कृति में दी गयी है. कुछ अन्य वैश्विक संस्कृतियों में नारी को मात्र पशुओं की भांति उपभोग और भोग-विलास का उपकरण समझा जाता है. नारियों के चित्रण में उन्हें तथाकथित स्वतंत्र बताकर उनके शरीर और बाह्य अंगों की नुमाइश आज पेपर पत्रिकाओं, टीवी से लेकर हर स्थान पर मिल सकता है. ऐसा नहीं है की भारतीय संस्कृति किसी की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करती है पर यह समझने की आवश्यकता है की जहाँ भारतीय दर्शन मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण और चित्त-वृत्तियों के निरोध की बात करता है जो नारी शक्ति को माँ शक्ति समझ कर पूजने और आराधना करने के बिना संभव नहीं होगी इसीलिए कई मायनों में माँ शक्ति के अवतार का सिद्धांत और ईश्वरीय शक्ति को माता शक्ति के रूप में मानना और पूजना तार्किक भी है और भारतीय संस्कृति के बौद्धिकता की उच्चतम शिखर पर पंहुचने की भी परिचायक है. जो संस्कृतियाँ और ऐसे लोग हिन्दू-धर्म को बहु-देव-देवी पूजन और इसे तथाकथित पाली-थिज्म कहकर भारतीय संस्कृति की आलोचना और अपमान करते रहते हैं उनको संतुष्ट करने और तार्किक जबाब देने के लिए भारत माता का एक बालक ही पर्याप्त है कि आज दुनिया जिस लोकतंत्र की दुहाई दे रही है वह हमारी भारतीय संस्कृति में सनातन काल से चला आ रहा है. हमारी संस्कृति में मानवीय लोकतंत्र की परंपरा तो आज से हजारों वर्ष पूर्व महाभारत काल के पहले ही चन्द्रवंश के राजा भरत के समय से ही लिखित रूप में मिल जाती है जब उन्होंने अपने पुत्रों में एक राजा बनने की योग्यता न देख ऋषि-पुत्र को भारत के साम्राज्य का उत्तराधिकारी नियुक्त किया था. जहाँ तक प्रश्न ईश्वर को पूजने चुनने में भी लोकतंत्र का है यहाँ कोई भी हिन्दू सनातन धर्मी अपनी क्षमता और रूचि के अनुरूप जिस ईश्वर के स्वरुप के भाव में आरूढ़ होना चाहे वह चुन सकता है. हमारा सनातन धर्म उन सम्प्रदायों में से नहीं है की किसी को पूजा न करने और किसी इष्टदेव विशेष को न पूजने पर उसे फांसी और शूली पर चढ़ा दिया जाए ऐसी मान्यता रखते हैं. सनातम धर्म-दर्शन में सभी के लिए यथोचित स्थान है चाहे वह साकार को मानने वाला हो अथवा निराकार को मानने वाला हो. क्योंकि श्रृष्टि का सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋगवेद ही स्पप्ष्ट तौर पर दसवें मंडल के 129 अध्याय में सात सूक्तियों के माध्यम से कह रहा है की कौन जनता है की उस परमब्रह्म परमेश्वर की श्रृष्टि की रचना कब और कैसे हुई? ऋग्वेद मात्र कहता है की यह विद्वानों और जिज्ञासुओं का कार्य है की उसे जानने का प्रयास करें? अतः भारतीय संस्कृति मार्ग बताती है और अंतिम सत्य बताती है यह किसी अन्य सम्प्रदायों के धर्मगुरुओं की तरह यह नहीं कहती की मैंने उस परम ब्रह्म को हमेशा के लिए कैद कर लिया है और हमने उसे सातवें असमान में देख लिया है और बस हम ही अब जानते हैं की उस गॉड को कैसे प्राप्त कर पयोगे और यदि हमारे मार्ग का अनुसरण नहीं करोगे तो तुम अधर्मी और ईश्वर के विरोधी समझे जाओगे और तुम्हे मृत्यु के घाट उतार दिया जायेगा – यह सब सनातन हिन्दू धर्म कभी नहीं कहा और किसी भी वैदिक धर्म ग्रन्थ में यह कहीं लिखा भी नहीं है.
भारतीय संस्कृति में अहिंसा त्याग वैराग्य का दर्शन सिद्धांत-
हिन्दू सनातन धर्म दर्शन दो प्रकार के मुख्य आराधकों को वर्गीकृत करता है. एक तो बाह्यमुखी और दूसरे अंतर्मुखी. जो बाह्यमुखी व्यक्तित्व का धनी है ऐसा व्यक्ति धर्म और शास्त्र विहित कर्म अर्थात श्रीकृष्ण के कर्मयोग को आधार बनाकर ईश्वर को प्राप्त कर सकता है और जो अंतर्मुखी है वह सांख्य और योग-साधना के मार्ग का अनुसरण करके ईश्वर को प्राप्त कर सकता है.
हिन्दू-सनातन धर्म की बहुत महत्वपूर्ण विशेषताओं में से सत्य, कल्याणकारी, अहिंसा, और त्याग-वैराग्य हैं. सनातन धर्म सत्य और धर्म के मार्ग का अनुसरण करने को कहता है. हिन्दू दर्शन लोक-कल्याणकारी कार्यों को करने की बात करता है. हिन्दू धर्म-दर्शन क्योंकि सभी जीवों, सर्वत्र, कण-कण में एक ही ईश्वरीय भाव को देखता है अतः वह किसी जीव अथवा पेंड मात्र को भी क्षति पंहुचाने में ईश्वर को क्षति और चोट पंहुचाना मानता है अतः वह अहिंसा की बात करता है. क्योंकि यदि सर्वत्र कण-कण में ईश्वर सर्व व्याप्त है तो भला किसी जीव मात्र को भी नुक्सान पंहुचाना स्वयं को और ईश्वर को नुक्सान पहुचाने जैसा ही है. अतः हिन्दू-सनातन धर्म मात्र शास्त्र-विहित और धर्म की रक्षा हेतु ही हिंसा को करने की अनुमति देता है अन्य सभी हिंसा पाप और अधर्म की श्रेणी में रखी जाती हैं.
सनातन हिन्दू दर्शन है समष्टि का प्रतीक, इसमें सभी के लिए है यथोचित स्थान -
जैन धर्म और बौद्ध धर्म आज चाहे अपने आपको को भले ही सनातन संस्कृति और सनातन धर्म से अलग माने, लेकिन सनातन धर्मावलम्बी कभी भी जैन और बौद्ध को अपने से पृथक नहीं समझते. दोनों ही सनातन धर्म की ही शाखाएं हैं और दोनों का ही उद्भव सनातन धर्म से ही हुआ है, और कहना पड़ेगा की जब हिन्दू संस्कृति में पोंगा पंडितों और धर्म के ठेकेदारों का साम्राज्य बढ़ रहा था और जब यह स्वार्थी प्रवृति के लोग हिन्दू-सनातन धर्म को अपने स्वार्थपूर्ण कार्यों में उपयोग कर रहे थे तब महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध जैसे महान विभूतियों ने एक प्रकार से हिन्दू धर्म के कुछ बहुत मूलभूत सिद्दांतों जैसे – अहिंसा और “एकोब्रह्म द्वितीयो नास्ति”, निराकार ब्रह्म को ग्रहण कर पुनः एक बार हिन्दू-धर्म दर्शन की अलख जगाई. आज जैन और बौद्ध दर्शन में अहिंसा का सिद्धांत हमारी भारतीय संस्कृति और परम्परा की ही देन है जिसे आज वर्तमान समय में भी महात्मा गाँधी जैसे महान भारतीय सपूतों ने अपने जीवन में उतार कर भारतीय संस्कृति और परंपरा के नाम पर चार चाँद लगाई है. यद्यपि यह भी विचारणीय है की जिस मूल सिद्धांत को महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध लेकर चले थे वह बाद के उनके अनुयायिओं ने भी छोंड़ दिया और यही वह वजह थी की यद्यपि अपने उद्भव के समय दोनों ही शाखाएं काफी समर्थन जुटा पायीं परन्तु समय के साथ आज स्वयं भारत में ही अपने अस्तित्व को बचाने में लगी हैं. इस सबसे यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है की किसी भी धर्म और दर्शन के मूल आधार का होना अति आवश्यक है. यदि मूल और आधार नहीं है और वह मात्र शाखाओं के रूप में ही विकसित हुआ है तो अंततः ऐसी शाखाएं उसी मूल में समाहित हो जाएँगी जहाँ से उसकी उत्पत्ति हुई. और हुआ भी वही जो भी हिन्दू-सनातन धर्म से प्रस्फुटित हुए थे वह अंततः उसी में समाहित हो गए क्योंकि हिन्दू-सनातन धर्म-दर्शन में इतनी विशालता है की यह अपने आप में सब कुछ अच्छा-बुरा समाहित कर लेता है. हिन्दू-धर्म दर्शन की तुलना सूर्य के प्रकाश से की जा सकती है जिसमे कई रंग मिले होते हैं जो अंत में मथकर सूर्य के सफ़ेद प्रकाश के रूप में ही दृष्टि गोचर होता है बिलकुल ऐसा ही है सनातन धर्म-दर्शन.
सिक्ख संप्रदाय भी है माता शक्ति का आराधक है - लगभग सभी हिन्दू-सनातन धर्म के देवी देवताओं आदि को उतना ही सम्मान सिक्ख संप्रदाय में भी दिया जाता है. श्री वायगुरु के नामों की महत्वा के वर्णन में उसी ईश्वर ने नाम की महानता का वर्णन सिक्खिज्म में भी आता है. भारत के संकटकालीन समय में सिक्ख बंधुओं का अपनी भारतीय संस्कृति की रक्षा में किया गया बलिदान और योगदान ठीक महाभारत काल में अर्जुन द्वारा श्रीकृष्ण की शिक्षा के माध्यम से धर्मरक्षा हेतु उठाये गए अस्त्र-सस्त्रों का ही परिचायक है. प्रत्येक सिक्ख बंधुओं द्वारा अपनी मातृभूमि और धर्म की रक्षा हेतु अपने शरीर में धारण की जाने वाली तलवार उसी धर्म रक्षा हेतु तत्परता का द्योतक है.
“अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता अस वर दीन जानकी माता”
श्री तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस में वर्णन आता है की माता शक्ति की अवतार माता सीता ने श्री बजरंगवली को आठों सिद्धियों और नौ निधियों का वरदान दिया था. यह वर्णन उस समय आता है जब पवनपुत्र ने राक्षसराज रावण की अहंकार की निशानी सोने की लंका को धू-धू करके जलाकर राख में बदल दिया. और अति दुष्कर दिखने वाले कार्य कर दिखाए, उनसे प्रसन्न होकर माता सीता ने अजरता-अमरता और कलयुग के देवता होने और सदैव श्रीराम का कृपापात्र और सेवक होने का वरदान दिया. यह उक्त चौपाई श्री हनुमान चालीसा से ली गयी है. क्या हैं वह अष्ट सिद्धियाँ और नौ निधियां आईये उसे जानने का प्रयास करते हैं?
आठ सिद्धियाँ और नौ निधियां -
महादुर्गा के अंतिम और सिद्धिदात्री के अवतार की पूजा आराधना करने वाला साधक योगी आठों सिद्धियाँ प्राप्त करता हैं. हिन्दू धर्म-दर्शन के मार्कंडेय और ब्रह्मवैवर्तपुराण में इन आठों सिद्धियों का विस्तृत वर्णन आता है.
अणिमा लघिमा गरिमा प्राप्ति: प्राकाम्यंमहिमा तथा।
ईशित्वं च वशित्वंच सर्वकामावशायिता:।।
उपरोक्त मन्त्र से समझा जा सकता है की - अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशिता, वशिता इस प्रकार आठ प्रमुख सिद्धियाँ बताई गयीं हैं.
अणिमा सिद्धि – अणिमा का तात्पर्य अणु रूप या सूक्ष्म रूप धारण से है. तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस में वर्णन आता है की माता सीता की खोज में लंका गमन के समय समुद्र पार करते समय श्री हनुमान जी की जब सुरसा राक्षसी ने परीक्षा लेनी चाही तो पवनपुत्र ने सूक्ष्म रूप धारण कर उसके मुख में प्रवेश कर लिया था और वापस निकल आये थे. इसी प्रकार लंका में पंहुचकर भी आंजनेय ने सूक्ष्म रूप धारणकर पूरी लंका में भ्रमण कर शत्रु का जायजा लिया था.
महिमा सिद्धि – महिमा का तात्पर्य है अपने आपको बड़ा या विशाल बना लेना. श्रीहनुमान चालीसा और श्रीरामचरितमानस में वर्णन आता है की जब सुरसा राक्षसी ने श्रीहनुमान जी की परीक्षा लेनी चाही और अपना मुख फ़ैलाने लगी तो बजरंगवली ने अपना शरीर सौ योजन का बना लिया. दूसरा वाकया आता है जब श्री हनुमान जी ने माता सीता को श्रीराम की वानर भालुओं की सेना का की शक्ति का अहसास दिलाने के लिए अपना शरीर विशालकाय बनाया था.
गरिमा सिद्धि - गरिमा का तात्पर्य भारीपन से होता है. जब अपने शरीर को भारी बना लिया जाए उसे गरिमा कहते हैं. तुलसीकृत रामायण और महाभारत काल में कम से कम दो स्थानों में ऐसा कथानक आता है जब गरिमा सिद्धि प्रकाश में आती है. अंगद के पैर तो सबने ही सुना होगा की कैसे रावण की दरबार में जम गए तो उसे उठा पाना रावण जैसे योध्याओं को भी भारी पड़ गया. इसी प्रकार श्री हनुमान द्वारा भीम का घमंड तोड़ने हेतु रस्ते में पड़ी अपनी पूंछ को इतना भारी कर दिया गया की भीम हांफने लगे थे.
लघिमा सिद्धि – लघिमा का तात्पर्य बहुत हलके होने से है. लघिमा सिद्धि का वर्णन श्री हनुमान के ही चरित्र में आता है जब वह समुद्र पार कर अशोक वाटिका में सीता माता के समक्ष पहुचते हैं तब वहां पर अणिमा, महिमा और लघिमा सिद्धियों का चमत्कार दिखाते हैं और अशोक वाटिका के पत्ते पत्ते में ऐसे छुप जाते हैं जैसे वायु. एक अन्यत्र वर्णन आता है जब लक्ष्मण को शक्ति बाण लगने के बाद सुषेण वैद्य द्वारा संजीवनी मगाने के लिए हिमालय क्षेत्र में श्री हनुमान को भेजा जाता है तब वह इतना विशाल पर्वत अपने हाँथ में लेकर उड़ आते हैं यह सब लघिमा सिद्धि से ही संभव हुआ.
प्राप्ति सिद्धि – सभी सिद्धियों का प्रयोग सकारात्मक और धर्मार्थ और लोक-कल्याण के कार्यों में ही किया जाना चाहिए अन्यथा सभी सिद्धियाँ दुरुपयोग पर निष्क्रिय हो जाती ऐसा भी वर्णन धर्म-शास्त्र ग्रंथों में आता है बारम्बार आता है.
प्राप्ति का तात्पर्य है सामान्य रूप से कोई असंभव सी दिखने वाली वस्तु को भी प्राप्त कर लेना. जैसे इसकी सिद्धि के बाद साधक में पशु-पक्षियों की आवाज़ समझ लेना, कुछ भी निर्माण कर लेने की क्षमता प्राप्त हो जाना. विश्वकर्मा द्वारा मात्र इस सिद्धि के बल पर ही द्वारिका का निर्माण रातो-रात कर दिया गया था. श्रीहनुमान के सन्दर्भ में जब वह लंका में गमन किये तब पशु पक्षियों से बात किये और साथ ही श्रीराम ने भी पौधों, पुष्पों, और भवरों, पक्षियों आदि से सीता माता के विषय में पूंछ रहे हैं ऐसा वर्णन आता है अतः वहां भी इसी सिद्धि की बात को समझा जा सकता है यद्यपि श्रीराम के विषय में यह कहना सूर्य के समक्ष दीपक दिखाने जैसा है क्योंकि श्रीराम तो स्वयं भी मर्यादा पुरुषोत्तम और परम ब्रह्म के अवतार सर्वज्ञ अन्तर्यामी थे.
प्राकाम्य सिद्धि – प्राकाम्य का तात्पर्य है कोई भी रूप को धारण कर लेना. इस सिद्धि को प्राप्त करने वाला साधक शक्तिशाली बनकर सभी कुछ प्राप्त कर सकता है परन्तु साधक इसका प्रयोग लोक कल्याणकारी कार्यों में ही करे.
जब भगवान श्रीराम और लक्ष्मण सीता माता की खोज करते हुए वन में भ्रमण कर रहे थे उस समय जैसे ही वह किसकिन्धा में पहुचते है वैसे ही सुग्रीव और मंत्रियों ने श्री हनुमान को भगवान श्रीराम-लक्ष्मण बंधुओं के समक्ष भेजा की जाकर पता करो की वह कौन हैं और क्या ढूंढ रहे हैं. इस प्रकार आंजनेय एक योगी-ब्राह्मण का स्वरुप धारण कर बन्धु-द्वय के समक्ष उपस्थित होते हैं यह सब प्राकाम्य सिद्धि से ही संभव होता है. कई मायावी राक्षसों का भी वखान आता है की वह भी विभिन्न रूप धारण कर अधर्म अत्याचार को बढ़ावा दिए और अंत में उनका विनाश हुआ. लंकाधिपति रावण भी सभी सिद्धियों को प्राप्त किया था परन्तु उसने इनका प्रयोग अधर्म अत्याचार और अन्याय में किया. प्राकाम्य सिद्धि के कारण ही रावण ने सीता हरण के समय एक भिक्षुक ब्राह्मण का रूप धारण कर पंचवटी में आया था.
ईशिता सिद्धि - अपने आप को स्वयं ईश रूप में परिवर्तित कर लेना ही ईशित्व है. इस सिद्धि की प्राप्ति के पश्चात साधक किसी भी पर भी नियंत्रण कर सकता है चाहे वह बड़े से बड़ा सम्राज्य ही क्यों न हो.
जहाँ साधक के लिए स्वयं अपने मन, इन्द्रियों और मस्तिष्क पर अधिकार और नियंत्रण प्राप्त करना ही मुख्य उद्येश है वहीँ सांसारिक सिद्ध व्यक्तियों के लिए अपने शक्ति प्रदर्शन के लिए बाह्य वस्तुओं पर अधिकार ही महत्वपूर्ण होता है.
श्री हनुमान के विषय में कहा जाता है की उन्होंने इस सिद्धि के बलबूते पर वानर सेना पर नियंत्रण प्राप्त किया.
वशित्व सिद्धि – वशित्व का तात्पर्य वशीकरण से है. जिस प्रकार दुर्गा सप्तसती के कई प्रयोगों में से वशीकरण एक महत्वपूर्ण सिद्धि होती है वैसे ही जो साधक वशित्व सिद्धि प्राप्त कर लेता है वह सब कुछ अपने वश में कर लेता है.
श्री हनुमान के सन्दर्भ में ऐसा आता है की उन्होंने इसी सिद्धि की बदौलत अपने मन, दशों इन्द्रियों में नियत्रण कर स्वयं को वश में किया और जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी बने. वास्तव में साधक को भी श्रीहनुमान से ही शिक्षा लेनी चाहिए की सभी सिद्धियों का प्रयोग उन्होंने अपने स्वयं को परिष्कृत करने और श्रीराम भगवान की सेवा और कृपा प्राप्त करने में ही लगाया और धर्म रक्षा हेतु ही सदैव तत्पर रहे.
महादुर्गा के सिद्धिदात्री माता के स्वरुप का चित्रण -
देवी सिद्धदात्री के चित्रण में इन्हें चार भुजाओं वाली चतुर्भुजी माता के रूप में कमल पर आसीन बताया गया है. इनका वाहन सिंह है. इनकी दाहिनी नीचे वाली भुजा में चक्र और ऊपर वाली भुजा में गदा धारण किया हुआ बताया गया है. इनकी बायीं भुजा के नीचे वाले हाँथ में शंख और ऊपर वाले हाँथ में कमल धारण किया हुआ दर्शाया गया है. संख-चक्र-गदा और कमल पुष्प वैष्णव मतावलंबियों के इष्टदेव देविओं के महत्वपूर्ण चिन्ह हैं. ऐसी मान्यता है कि देवी सिद्धिदात्री की अनुकम्पा से ही भगवान शिव का शरीर अर्ध-नारीश्वर का हुआ. इनके पूजन आराधना से निर्वाण चक्र जागृत होता है.
महादुर्गा के सिद्धिदात्री देवी के अवतार का ध्यान मन्त्र-
वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥
स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।
शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥
पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्।
कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥
महादुर्गा के स्वरुप माँ सिद्धिदात्री देवी का स्तुति मन्त्र
या देवी सर्वभूतेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।
अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा में शारदेय नवरात्रि के इस विशेष आयोजन में आप सभी सादर आमंत्रित हैं.
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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा (म.प्र.) पिन ४८६११७
मोबाइल नंबर – 07869992139, 09589152587