दिनांक 14 अक्टूबर 2021 रीवा मप्र.
आज वर्तमान भारतीय हिन्दू समाज एक विचित्र दौर
से गुजर रहा है जहां वर्तमान भौतिक शुख सुविधाओं युक्त जिन्दगी की भागदौड़ जहां
मात्र शारीरिक सुख और विलासितापूर्ण जीवन ही समृद्धि की परिभाषा में आता है इसकी
लालसा हर एक नागरिक को है. जहाँ तक हिन्दुओं से इतर समाज की बात करें तो यह
सार्वभौमिक सत्य है की गोवंशों को मात्र कई अन्य समाज में उपभोग और भोज्य सामग्री के
तौर पर ही माना जाता है. विश्व में एक मात्र हिन्दू समाज ही ऐसा समाज है जहाँ पर
गाय की धर्मशास्त्रों में बड़ी महिमा बताई गयी है. श्रीमद भागवत और श्री कृष्ण लीला
में तो हिन्दुओं के अवतारी भगवान् श्रीकृष्ण को गायों की सेवा करते और उन्हें
चराते हुए दिखाया गया है. गायों के लिए बड़े बड़े राक्षसों से युध्य करते हुए दिखाया
गया है. आखिर इन धर्म शास्त्रों का क्या औचित्य है और क्या जो बातें पुराणों में
बताई गई है वह वर्तमान समाज में कितना चरितार्थ हो पा रही है आइये इस पर एक नजर डालेंगे?
धर्म से इतर यदि बात
की जाए तो भारत जैसे कृषि प्रधान देश में पारंपरिक कृषि खेती बाड़ी में पशुओं के
योगदान को भुलाया नहीं जा सकता. हालाँकि न केवल भारत अथवा हिन्दू समाज में बल्कि
सभी धर्मों और सभी समाज में जब कृषि यंत्रों का आविष्कार नहीं हुआ था तो पशुओं पर
निर्भरता सर्वाधिक थी. इसका प्रमाण तो इतिहास में भली भांति प्राप्त किया जा सकता है.
लेकिन समय के साथ सब कुछ बदल जाया करता है. यहाँ तक की एक कहावत है की स्टेटस के
साथ सम्बन्ध और उंच-नीच के व्यवहार भी समय के साथ बदल जाया करते हैं. यद्यपि
नैतिकता शब्द ऐसा है जिसके अंदर हर प्रकार के भौतिक बदलाव के बाद भी सम्बन्ध और
मानवीय पहलू नहीं बदलते. पर सवाल यह है की इस नैतिकता की आज के वर्तमान समय में
कोई कीमत बची है की नही? क्या इस नैतिकता को कोई जानने, मानने और समझने वाला है?
जरूरत गयी बात गयी और कीमत गयी –
इसी सिद्धांत
पर आज का वर्तमान समाज काम कर रहा है. बहुत से लोग तो बड़े गर्व के साथ कहते हैं की
भोजन की परिभाषा में सब जीव आ जाते हैं इसलिए यदि अन्न खा सकते हैं तो पशुओं को
क्यों नहीं? ऐसे बहुतायत लोग इतने प्रचंड
तर्क देते हैं की नैतिकता को मानने वाले भी कई बार अपना सिर शर्म से झुका लेते हैं
नहीं शायद अमुक व्यक्ति ठीक कह रहा है और शायद हमी गलत थे जो अब तक शाकाहारी भोजन
करते थे और पशुओं को सम्मान देते थे. शायद यह तो खाने पीने वाली सामग्री ही हों? आज हमारे चारों तरफ एक विचित्र आवरण बनता जा रहा है जहाँ सही और नैतिकता की
बातें करने वाला वेवकूफ और अनपढ़ लकीर का फ़कीर कहलाता है जबकि बड़े तामझाम प्रदर्शन
करने वाला और अनैतिक व्यवहार करने वाला पढ़ा लिखा एडवांस्ड और बड़ा कहा जाता है. ऐसे
में जाहिर है नैतिकता वाला व्यक्ति अपना मुह कहीं छुपाकर बैठा रहता है और चाहते
हुए भी कुछ नहीं कर पाता. एक कहावत भी है की यदि गलत को एक हज़ार व्यक्ति मिलकर
बोलें की यही सही है तो शायद वह सही हो जाता है. और वास्तव में देखा जाय तो आज के
समय में यही चल रहा है. आज भीड़ तंत्र का जमाना है. भीड़ जो कहे वही सही बांकी सब
नैतिकता भरी बातें गलत हैं.

क्यों प्रताड़ित है
हमारी गोमाता?
आइए चलते हैं धार्मिक ग्रंथावली की तरफ. यदि
रामायण और महाभारत और अन्य महापुराण ग्रन्थों को उठाया जाय तो उसमे एक बात बार बार
उल्लेखित मिलती है. वह है की कलयुग का जब समय आयेगा तो गो और ब्रह्मण की बड़ी
दुर्दशा होगी. यहाँ पर यह उल्लेखनीय है की ब्रह्मण वह है जो ब्रह्म अर्थात ईश्वर
को मानने वाला है जो आस्तिक है जो ईश्वर की बात करता है जो नैतिकता की बात करता है
वह ब्राह्मण है. यहाँ ब्राह्मण का जाति से कोई मतलब नहीं है. और सही में यदि देखा जाय
तो यह बात अब अक्षरसः सही भी हो रही है. आज इश्वर की बात करने वाला, आस्तिकता की बात करने वाला, गाय की बात करने वाला, पशुओं की
बात करने वाला मूर्ख अनपढ़ और लकीर का फ़कीर कहा जा रहा है. जो नैतिकता की बात करता
है उसको निचले बुद्धि का माना जाता है. जो गाय की बात करता है उसे भी यही कहा जाता
है. आज जहाँ बड़े बड़े जज साहब और बड़े बड़े कथित बुद्धिजीवी अपने आपको बड़े शौक और गर्व के साथ नास्तिक कहते हैं की हम
बीफ ईटर हैं. कहते हैं हमें गर्व है की हम बीफ खाते हैं. अब ऐसे में वह लोग हैरान रह जाते
हैं जो यह मानते थे की मांस खाना हिंसा कहलाता है. और जहां तक गाय का सवाल है तो भारतीय हिन्दू
समाज के लिए इसका एक बड़ा महत्व है जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है.

क्या भारतीय समाज
दुविधा में है? गोमांस का भक्षण करे कि नहीं?
आज जब हम गोवंशों की दुर्दशा देखते हैं तो बड़ी
पीड़ा होती है क्या समय आ गया है. क्या यह वही भारतीय समाज है जिसमे कभी गाय को माता
बनाकर पूजा जाता था और यदि ढोंग के तौर पर बातें करें तो अभी भी कागजों फोटो किसी
के मरने पर वैतरणी के नाम पर और गोदान के नाम पर खूब ढोंग किया जा रहा है. अभी हाल ही में रीवा मप्र के जिस
टेहरा-लालगांव ग्राम से सैकड़ों गोवंशों को रेहवा घाटी में धकेलने के लिए ले जाया गया था
उसी ग्राम में एक व्यक्ति के मरने पर कर्मशाला बनाई जा रही थी और अगले दिन मृत्यु
कर्म किया गया जिसमे एक गाय को पूंछ से पकड़कर कुछ वही हिन्दू समाज के लोग काफी
ढोंग कर रहे थे जिनके ग्राम से यही रेहवा घाटी की गोहत्या की वारदात की गयी थी. है
ना हैरानी वाली बात?
नैतिकता को मानें कि
आवश्यकता अनुरूप जीवन यापन को?
उक्त सभी बातों को देखा जाय तो एक प्रश्न उठता
है की मानव नैतिकता को मान रहा है की आवश्यकता को? जब तक बैलों की
कृषि के लिए आवश्यकता थी तब तक गाय माता और बैल को भाई की संज्ञा दे दी गयी थी.
हिन्दू समाज में तो बकायदे हरछठ में हल और बैलों की भी पूजा आज भी होती है. लेकिन
यदि जीवित बैल को भोजन देने की बात आ जाए तो हमारा समाज यह स्वीकार नहीं कर सकता. ऐसा
इसलिए की यह मानव बड़ा ही स्वार्थी है. अपने स्वार्थ के आगे यह सब नैतिकता भूल जाता
है. धर्म-कर्म और नैतिकता की परिभाषा भी मानव आवश्यकता और समय के अनुसार यह स्वार्थी प्राणी बना-बिगाड़
लेता है. भला अब कहाँ बैल और हल की आवश्यकता रह गयी है. भला अब कहाँ कंडे और गोबर
की जरूरत है. अब तो उज्जवला योजना का घर घर कनेक्शन है. अब तो सभी कृषि उपकरण जो
सरकारें अब आसानी से सब्सिडी में दे रही है. दूध के लिए डेयरी खुल गयी है जो
घर में दूधवाला मशीन से दुहा और इंजेक्शन सीमन से तैयार गाय का दूध उपलब्ध करा दे
रहे हैं और बैलों बछड़ों को सीधे कटने के लिए भेज दे रहे हैं. घर का लड़का तो नौकरी करता ही है शहर में. वहां से मोटी रकम आ जाती और
उससे सब कुछ खरीदा जा सकता है. सब कुछ? जी हाँ सब कुछ.
नैतिकता अनैतिकता सब कुछ. इसलिए आज मानव को जिसकी आवश्यकता है वह आसानी से मिल रहा
है इसमें नैतिकता कहाँ से आ गयी.
कलयुग के अगले चरण
में मानव मानव को खायेगा?
चलिए यहाँ तक तो बात समझ आ रही है की अपने
स्वार्थ और आवश्यकता के लिए मानव गोवंश हो अथवा नैतिकता सब की बलि चढ़ा सकता है पर
क्या एक और भी बात इसी दौर में देखने को मिलेगी? शास्त्रों में एक
बात और भी आती है. कहा गया है कि आने वाले सबसे बुरे दौर में मानव मानव की मांस भी
खायेगा? हालांकि कभी कभी कैनिबाल की
कहानियां सुनने को मिलती है कि यह वह जीव होता है जो हम मानव ही होते हैं लेकिन
यह जीवित मानव की गोस्त को खा जाते थे. हमने अपनी आँखों से तो अभी तक ऐसा नहीं
देखा पर कहानियों में सुना है. कुछ समय पूर्व चाइना जैसे देशों से एक न्यूज़ हवा
में उड़कर आ रही थी की वहां गर्भवती महिलाएं अपने 3 से 4 माह तक के फ़ीटस को बेंच
लेती हैं और वह कुछ विशेष प्रकार की ताकत की दवा बनाने में काम आता है जिसे कुछ
कथित लोग उपयोग करते हैं. ऐसी सूचनाएं इन्टरनेट आदि माध्यमों से समय समय पर मिलती
रहती हैं की ह्यूमन गोस्त का रैकेट भी पकड़े गए थे. जहाँ तक मेडिकल साइंस का सवाल
है तो वहां पर भी समय-समय पर इस प्रकार की ख़बरें सुनने में आती रहती हैं की ऐसे
एक्सपेरिमेंट भी होने की संभावना बनी रहती है.
भारतीय समाज को गाय
माता नहीं एक बोझ है
जिस प्रकार की पशु क्रूरता की वारदातें पिछले
कुछ वर्षों से निरंतर बढ़ी हैं उसमे यह तो स्पष्ट है की वह परम्परागत ग्रामीण और
हिन्दू समाज जो गाय को माता मानने का बोझ ढोए जा रहा था वह अब गाय को माता मानने
की इच्छा बिलकुल नहीं रखता. खैर कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो अपनी माता को भी माता
मानने को तैयार नहीं हैं. क्यों की वृद्ध और अनुपयोगी माता पिता जिस प्रकार वृद्धाश्रम
की शोभा बढ़ा रहे हैं उससे साफ़ स्पष्ट है समाज मात्र स्वार्थ के लिए सम्बन्ध बनाता
है न की नैतिकता के लिए. सुर नर मुनि सब की यह रीति स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती-
यह चौपाई तुलसीदास ने अपने रामचरित मानस नमक ग्रन्थ में लिखा है जो अब अक्षरसः
सत्य है.
यह बात भी सही है कि
हालांकि मानव का नैतिक पतन तो निरंतर हो रहा है लेकिन अभी तक इतना नहीं हुआ है की
भारतीय हिन्दू समाज गोवंशों को चावल दाल मानकर उनको अपना भोज्य बना ले. शायद इसलिए
अभी वह उन्हें समाज से बहिष्कृत कर रहा है. शायद आने वाले समय में यह भोज्य भी बन
जाएँ लेकिन अभी पहले चरण में है जहां अभी गोवंशों को समाज से बहिष्कृत कर रहा है
इसीलिए पहले उन्हें घर से खदेड़ कर अवैध बाड़ों में डाल दे रहा है, नहरों, घाटियों, खाइयों, जलप्रपातों में धकेल दे रहा है-
चलो भाग जाओ, मर जाओ यहाँ मत दिखना अब
क्योंकि हम तुम्हे खा नहीं रहे हैं यह तुम्हारी गनीमत समझो, अब यहाँ से भाग जाओ हमारी दृष्टि
से ओझल हो जाओ, दिखना बिलकुल नहीं, तुम मवेशी अब हमारे किसी काम
के नहीं बचे, दूध हमे दूधवाले से मिल जाता
है तुम्हारी जरुरत नहीं. मेरे जी का जंजाल मत बनो, हमारी फसलों को मत
खाओ,
हमारे खेतों के नजदीक मत आना.
भाग जाओ अब हमें सरकार ने गैस दे दिया है तुम्हारे गोबर कंडे की भी हमे
जरुरत नहीं. हमे बैल की कोई जरूरत नहीं देख नहीं रहे हमारे पास ट्रैक्टर और
थ्रेसर हैं? हम सब काम मशीनों से कर लेंगे चले जाओ यहां से हमें तुम्हारी कोई जरूरत नहीं,
रुक जाओ तुमने हमारी फसल खाई है न अब लो हम तुम्हारा मुह तार से बांध दिए दे रहे
हैं तब न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी..... ब्लाह ब्लाह.... इस प्रकार के मानव
के विचार रहते हैं जब वह इन बेजुबानो को घर से खदेड़ कर इनके साथ विभिन प्रकार से
क्रूरता करता है.
समाधान मात्र एक –
नैतिकता नहीं बल्कि स्वार्थ की पूर्ति
अब जब इस वर्तमान समय में नैतिकता को बाय बाय
हो चुका है तो जरूरत को हाइ हाइ होगा. ऐसे में अब समाज का वह वर्ग जो अपने आप को
नैतिक भी मानता और मजबूत भी की वह इस बुरे दौर में स्थाई तौर पर अंगद की तरह पैर
जमाये खड़ा रहे और उसका भी दायित्व बनता है की चाहे उसे अपनी कुर्बानी ही क्यों देनी
पड़े लेकिन वह वह सब रास्ते इजाद करे जिससे गोवंशों को इस स्वार्थी समाज में उपयोगी
बनाया जा सके. इन्हें उपयोगी तो खैर समय भी बना देगा क्योंकि रासायनिक खादों से
आने वाली बीमारियाँ जब इस मानव के अस्तित्व के लिए चुनौती बन जाएँगी तो गोबर कंडों
और जैविकता की तरह लौटना ही पडेगा लेकिन वह भी एक मज़बूरी ही होगी या यूँ कहें की
वह भी उस आने वाले समय की जरुरत ही होगी तब देखेंगे की नई इबारतें लिखीं जाएँगी नए
सिद्धांत आ जायेंगे क्योंकि सब सिद्धांत और इबारतें तो आवश्यकता और जरुरत के हिसाब
से ही बनती बिगडती हैं. इसलिए यदि हम कुछ पशु प्रेमी या गोवंश प्रेमी चाहते हैं की
गोवंश भी समाज में बने रहें और सम्मान के साथ बने रहें तो उन्हें उनका सम्मान
दिलाने का तरीका अब नैतिकता का पाठ पढ़ाना बिलकुल नहीं रह गया बल्कि उन्हें इस
अनैतिक और स्वार्थी समाज के लिए कैसे उपयोगी बनाया जाय इस पर विचार करना होगा और
कार्य करना होगा.

संलग्न – लेखक की फोटो और कुछ फुटेज.
शिवानन्द द्विवेदी
(सामाजिक कार्यकर्ता) जिला रीवा मप्र.
मोबाइल 9589152587