Friday, 19 August 2016

(रीवा, म.प्र.) दिनांक 19 अगस्त को कैथा-करहिया में रक्षाबंधन-खाजुलैयाँ पर संगीतमय श्रीरामचरित मानस का भंडारे के साथ हुआ समापन, खाजुलैयाँ हर्षोल्लास के साथ मनाया गया


स्थान – कैथा-करहिया, गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 19.08.2016, दिन शुक्रवार,

कैथा-करहिया में रक्षाबंधन-खाजुलैयाँ पर संगीतमय श्रीरामचरित मानस का भंडारे के साथ हुआ समापन, खाजुलैयाँ हर्षोल्लास के साथ मनाया गया 

विषय – कैथा-करहिया क्षेत्र में रक्षाबंधन-खाजुलैयाँ के अवसर पर आयोजित हुए परंपरागत मानस के कार्यक्रम का भंडारे के साथ हुआ समापन, खाजुलैयाँ पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया. ज्वारे भेंटकर सुख-शांति-समृद्धि की कामना के साथ मनाया गया खाजुलैयाँ का त्यौहार.

 (कैथा-करहिया, रीवा) विन्ध्य क्षेत्र में परंपरागत रूप से मनाया जाने वाला खाजुलैयाँ का पर्व बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया. यज्ञों की पावन स्थली कैथा स्थित श्री हनुमान मंदिर प्रांगण के पास हिनौता सरोवर में ज्वारे प्रवाहित कर और एक-दूसरे को ज्वारे भेंटकर सुख-शांति भाईचारे की कामना कर उपस्थित क्षेत्रवासियों ने खाजुलैयाँ का पर्व मनाया.

ज्ञातव्य हो की खाजुलैयाँ का पर्व मुख्य रूप से विन्ध्य क्षेत्र में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है की इसमें सभी अपने बैर-भाव भूलकर एक दूसरे को ज्वारे (जिसे खाजुलैयाँ भी कहते हैं) भेंटकर उनके सुख-शांति की कामना करते हैं. खाजुलैयाँ पर्व के एक सप्ताह पूर्व से यह ज्वारे छोटे-बड़े पके हुए मिटटी के बर्तन, जिसे पैना भी कहा जाता है, में बुबाई कर जब ज्वारे बड़े हो जाते हैं उसे लेकर नजदीक स्थित धर्मस्थल-सरोवर के पास आकर प्रवाहित करते हैं और ज्वारे उस मिटटी के बर्तन से उखाड़कर आपस में बांटते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं.

पावन स्थली कैथा के नजदीक स्थित करहिया ग्राम में रक्षाबंधन और खाजुलैयाँ पर आयोजित हुआ श्रीरामचरित मानस का कार्यक्रम – कैथा के नजदीक स्थित करहिया ग्राम में आयोजित मानस के कार्यक्रम का आज खाजुलैयाँ के दिन भंडारे और प्रसाद वितरण के साथ समापन हो गया. ज्ञातव्य हो की कैथा-करहिया क्षेत्र में यह मानस का कार्यक्रम प्रत्येक वर्ष रक्षाबंधन के पावन पर्व से प्रारंभ होकर अगले दिन खाजुलैयाँ तक चलता है और खाजुलैयाँ के दिन भंडारे और प्रसाद वितरण के साथ सम्पूर्ण कार्यक्रम का समापन किया जाता है. करहिया स्थित लोनियाँ-टोला में स्थित श्री शिव-हनुमान मंदिर में यह आयोजन प्रत्येक वर्ष खाजुलैयाँ के सुभावसर पर मनाया जाता है.

धर्मार्थ समिति का अगला आयोजन कैथा के श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर होगा – श्रीमद भागवत कथा धर्मार्थ समिति-भारत के युवा-प्रकोष्ठ के तत्वावधान में आयोजित होने वाले अगले विशेष कार्यक्रम का आयोजन भाद्रपद में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर होगा. यह आयोजन भगवान श्रीकृष्णजी की झांकी और भजन-कीरत का होगा. प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में परंपरागत रूप से आयोजित होने वाले श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर झांकी-भजन-कीर्तन का कार्यक्रम रखा जाता है जिसमे कैथा और उसके आसपास के कई ग्रामों के श्रीकृष्ण भक्त मध्य-रात्रि बारह बजे तक व्रत रहकर भगवान श्रीकृष्ण के अवतार का इंतज़ार करते हैं और उसके पश्चात पूजन-अर्चन के उपरान्त प्रसाद वितरण का कार्यक्रम रखते हैं तदोपरांत व्रत तोड़ते हैं. इस अवसर पर सायं से प्रारंभ होकर अर्धरात्रि तक सतत भजन-कीर्तन का कार्यक्रम चलता रहता है.

      पावन स्थली कैथा के श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव में सम्मिलित  होने के लिए आप सभी सादर आमंत्रित हैं.

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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता, एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा  (म.प्र.) पिन ४८६११७
मोबाइल नंबर – 07869992139


























Thursday, 18 August 2016

(रीवा, म,प्र.) आज दिनांक 18 अगस्त को कैथा-करहिया में रक्षाबंधन पर संगीतमय श्री रामचरित मानस का आयोजन, कल दिन शुक्रवार खाजुलैयाँ को होगा समापन और भंडारा



स्थान – कैथा, गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 18.08.2016, दिन गुरूवार,

कैथा-करहिया में रक्षाबंधन पर संगीतमय श्री रामचरित मानस का आयोजन, कल खाजुलैयाँ को समापन और भंडारा होगा 

विषय – यज्ञ स्थली कैथा के नजदीक स्थित करहिया ग्राम में रक्षाबंधन और खाजुलैयाँ के पावन अवसर पर परंपरागत रूप से आयोजित होने वाले संगीतमय श्रीरामचरित मानस कार्यक्रम का आयोजन. कल दिनांक 19 अगस्त शुक्रवार के दिन भंडारे के साथ होगा समापन. श्री हनुमान मंदिर प्रांगण स्थित हिनौता सरोवर के पास एक दुसरे को ज्वारे (खाजुलैयाँ) भेंटकर मनाई जाएगी खाजुलैयाँ.

 (कैथा, रीवा) कई मायनों में पावन भूमि कैथा और उसके आसपास का क्षेत्र भी पावन और ईश्वरमय है. यहाँ पर ग्राम कैथा स्थित प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में तो विभिन्न धार्मिक आयोजनों की परंपरा दसकों से चलती ही आ रही है, साथ ही आसपास के अन्य ग्राम क्षेत्र में भी धार्मिक प्रभाव के कारण वर्षभर विभिन्न धार्मिक आयोजन और अनुष्ठान चलते रहते हैं.
आप इस क्षेत्र में कभी भी किसी त्यौहार के उपलक्ष में पधारें तो आप पाएंगे की कहीं न कहीं कोई न कोई चाहे वह मानस हो, श्रीमद भागवत का कार्यक्रम हो, सामान्य तौर पर पांच दोहा गाया जाने वाला रामायण हो अथवा कोई अन्य धार्मिक उत्सव, कुछ न कुछ धार्मिक आयोजन इस क्षेत्र में चलते ही रहते हैं. लोगों की ऐसी मान्यता है कि सारे संसार में कुछ भी चल रहा हो लेकिन कैथा और उसके आसपास कोई भारी प्राकृतिक आपदा कम ही परिस्थितियों में आयी है. पिछले साल ही इतने सूखे के वावजूद यद्यपि यह क्षेत्र काफी ऊँचाई में बसा है फिर भी हैण्ड-पम्पों का जलस्तर नियंत्रित रहा, अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा फसल भी लोगों को खाने जीने के लिए पर्याप्त हुई है. कहीं न कहीं यह सब ईश्वर के प्रति श्रद्धा और आस्था से ही होता है ऐसा यहाँ के लोगों का मत है.

सर्वव्यापी ईश्वर न दीखते हुए भी अस्तित्व में है और हमारे सभी कर्मों के अनुरूप ही फल देने वाला है  - निश्चित तौर पर उस सर्वव्यापी परमेश्वर की ही दया दृष्टि से सब संभव होता है. वह परमेश्वर कण-कण में व्याप्त, भूत-भविष्य-वर्तमान का ज्ञाता, अनंत चैतन्य स्वरुप, सत-चित-आनंद स्वरुप  होने से सर्वव्यापी, सर्वज्ञ है. वह सभी जीवों को उनके कर्मों के आधार पर यथोचित फल प्रदान करने वाला है. व्यक्ति अहंकार वश उस परम शक्ति को भूल अपने गर्व में मदमत्त रहता है परन्तु किसी के नकारने अथवा स्वीकारने से ईश्वर का अस्तित्व न तो सिद्ध किया जा सकता और न ही निसिद्ध किए जा सकता. वह है तो है. जैसे हिन्दू-सनातन संस्कृति के महँ और कालजयी ग्रन्थ श्रीमद भगवद गीता में भगवान् श्रीकृष्ण के माध्यम से अर्जुन को बताया गया है की –वह परम-ब्रह्म दशों कर्मेन्द्रियों, दशों ज्ञानेन्द्रियों, इनको नियंत्रित करने वाले मन, मन को नियंत्रित करने वाले बुद्धि, अहंकार, इन सबसे श्रेष्ठ है वह. जो इन सबके परे हैं वही है परमात्मा. मानवीय तर्क-बुद्धि से मात्र उस परम-ब्रह्म को समझने में और उसकी भक्ति में मदद मदद मिल सकती है न की उसे सिद्ध अथवा असिद्ध किया जा सकता. उसकी कृपा प्राप्ति के लिए मात्र भाव-भावना की आवश्यकता है ऐसा बार-बार हिन्दू-सनातन धर्म-अध्यात्म ग्रंथों में कहा गया है. क्योंकि यदि वह परमेश्वर नहीं होता तो यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड स्वयं नहीं चल सकता था. जिस प्रकार आज आधुनिक समय में किसी भी कृति और यंत्र को चलाने के लिए इंटेलिजेंस की आवश्यकता है इसी प्रकार इस सृष्टि रुपी यंत्र को चलाने के लिए भी इंटेलिजेंस की आवश्यकता है. और वह इंटेलिजेंस कोई सामान्य नहीं होती बल्कि वह है “सुप्रीम-इंटेलिजेंस” अथवा “परम-ब्रह्म”.

पावन स्थली कैथा के नजदीक स्थित करहिया ग्राम में रक्षाबंधन और खाजुलैयाँ पर मानस का कार्यक्रम – कैथा के नजदीक स्थित करहिया में आज सुबह लगभग दस बजे से पिछले कई वर्षों से परंपरागत रूप से आयोजित होने वाले मानस का कार्यक्रम रखा गया. करहिया स्थित लोनियाँ-टोला में स्थित श्री शिव-हनुमान मंदिर में यह आयोजन चल रहा है. कल शुक्रवार के दिन खाजुलैया को इस मानस का समापन और भंडारा होगा तत्पश्चात सभी क्षेत्रवासी कैथा श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में उपस्थित होकर कई दिनों पहले बोये गए ज्वारे को एक दूसरे को देकर बंधाई देते है और गले मिलते है ऐसी परंपरा है. बताया गया है की खाजुलैयाँ में ज्वारे बोने और इस त्यौहार को मनाने की परंपरा काफी प्राचीन है और यह मात्र वर्ष में एक बार आती है. इस बीच लोग सब गिले-सिकबे भूल एक-दूसरे को ज्वारे (अथवा खाजुलैयाँ) का अदन-प्रदान करते हैं और सुख-शांति-समृद्धि की कामना करते हैं. इस बीच आसपास के कई ग्राम क्षेत्रों के काफी लोग एकत्रित होते हैं और श्री हनुमान मंदिर में भी ज्वारे भेंट करते हैं.     
  
|||धन्यवाद|||
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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता, एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा  (म.प्र.) पिन ४८६११७
मोबाइल नंबर – 07869992139 











Wednesday, 17 August 2016

(रीवा, म.प्र.) Dated 17-08-2016: कैथा की पावन भूमि में भारी बारिश के मध्य संपन्न हुआ भागवत महापुराण कथा में हवन और भंडारे का कार्यक्रम. चौथी-दहकंदो की परंपरा के साथ हुआ विषर्जन.


स्थान – कैथा, गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 17.08.2016, दिन बुधवार,
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कैथा की पावन भूमि में भारी बारिश के मध्य संपन्न हुआ भागवत महापुराण कथा में हवन और भंडारे का कार्यक्रम. चौथी-दहकंदो की परंपरा के साथ हुआ विषर्जन.  
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विषय - कैथा की पावन भूमि में भारी बारिश के मध्य संपन्न हुआ भागवत महापुराण कथा में हवन और भंडारे का कार्यक्रम. प्रतिकूल प्राकृतिक दशाओं के मध्य हजारों की संख्या में चढ़ोत्तरी चढाने और भंडारे का प्रसाद ग्रहण करने पंहुचे भक्त-श्रद्धालु. नवरात्रि के पावन अवसर पर आयोजित होने वाले दुगोत्सव के कार्यक्रम की रूपरेखा तय.
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 (कैथा, रीवा) यज्ञों की पावन भूमि कैथा में स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व से हिन्दू-पंचांग के पवित्र श्रवण मास में आयोजित होने वाले जीव-कल्याणार्थ श्रीमद भागवत महापुराण भक्ति ज्ञान महायज्ञ कल दिनांक 16 अगस्त 2016 को हवन और भंडारे के साथ संपन्न हुआ, और आज दिनांक 17 अगस्त को सुबह दस बजे तक सम्पूर्ण कार्यक्रम का विसर्जन चौथी-दहकंदो की क्षेत्रीय परंपरा अनुसार कर दिया गया. इस बीच कल 16 अगस्त दोपहर लगभग 12 बजे से लेकर देर रात्रि तक बिलकुल ही कोई बारिस नहीं हुई. इस बीच लोगों की मान्यता है की श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में जब कभी भी भंडारे का कार्यक्रम होता है तो कैथा के आसपास भंडारे के समय बारिस नहीं होती है. निश्चित रूप से कल मौसम ने जिस तरह भक्त-श्रद्धालुओं का साथ दिया इससे ऐसी मान्यता को बल मिलता है और भक्तों का भगवान् के प्रति विश्वास प्रबल होत्ता है.

इस बीच भारी संख्या में आसपास और दूर दराज से लोग भंडारे का प्रसाद लेनें और चढ़ोत्तरी चढाने के लिए एकत्रित हुए. चढ़ोत्तरी का तात्पर्य होता है किसी भी धार्मिक कार्यक्रम में अपना यथा संभव योगदान देना. सार्वजनिक कार्यक्रमों में यह योगदान दो तरह का होता है. एक तो कार्यक्रम के सफल संचालन हेतु भक्त-श्रद्धालु अपना मनसा-कर्मणा-वाचा सहयोग देते हैं और दूसरा प्राचीन भारतीय परम्परा अनुसार भागवताचार्य या गुरु-महाराज जी के लिए दक्षिणा के तौर पर प्रत्येक प्रसाद ग्रहण करने वाला व्यक्ति एक रुपये से लेकर अधिकतम जिसकी जितनी ईक्षा हो उतना दान-दक्षिणा देता है और अपना नाम चढ़ोत्तरी रजिस्टर में दर्ज करवाता है. प्राचीन भारतीय परंपरा अनुसार यह चढ़ोत्तरी पूर्णतया गुरु जी महाराज का मेहनताना होता है और उन्हीको दिया जाना चाहिए ऐसी मान्यता है.

पिछले एक सप्ताह से हो रही भीषण बारिस के कारण जितनी संख्या में शद्धालुओं के उपस्थिति की संभावना थी उतनी नहीं हो पाई परन्तु फिर भी प्रतिकूल प्राकृतिक दशाओं को देखते हुए हजारों की संख्या में श्रद्धालुगण उपस्थित हुए और भंडारे का प्रसाद ग्रहण किये. ऐसा पहले भी देखा गया है की श्री हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा में होने वाले सभी सार्वजनिक-धार्मिक कार्यक्रमों में चाहे जैसी भी प्राकृतिक-परिस्थिति हो श्रद्धालुओं का काफी जमावड़ा लगता है. यद्यपि इस बार धर्मार्थ समिति की कार्यकारिणी ने मौसम के रुतबे को देखते हुए सब्जी-पूड़ी-मिष्ठान की परंपरा से थोड़ा हटकर मात्र पूड़ी-हलुआ (साथ में पंजीरी) का भंडारा रखा. चूंकि भारी बारिस के मध्य श्रद्धालुओं को बैठाकर प्रसाद वितरण संभव न हो पाने के कारण और भारी बारिस की वजह से ज्यादा व्यापक व्यवस्था न बन पाने के कारण मात्र पूड़ी-हलुआ (और साथ में पंजीरी) का प्रसाद वितरण ज्यादा उचित समझा गया.
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आज दिनांक 17 अगस्त दिन बुधवार को मत्रोच्चरण के साथ पारंपरिक विसर्जन हुआ संपन्न – इस बीच आज भी क्षेत्रीय मौसम खुला रहा और कैथा-हिनौती-गढ़ क्षेत्र में बिलकुल भी बारिस नहीं हुई. प्रातः से ही भक्त-श्रद्धालु श्री हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा में एकत्रित हुए और ग्रामीण अंचलों में परंपरागत रूप से चौथी-दहकंदो की परंपरा अनुसार आचार्य जी के मंत्रोच्चारण के साथ विसर्जन का कार्यक्रम संपन्न हुआ. गौर करने की बात है की जब भी कोई भी साप्ताहिक अथवा उससे अधिक समय का धार्मिक कार्यक्रम जैसे – श्रीमद भागवत कथा, बाल्मीकि कथा, श्रीशिव-महापुराण कथा, दुर्गोत्सव आदि कार्यक्रम कराया जाता है तो कार्यक्रम की शुरुआत में व्यास-गादी के नीचे के भू-स्थल पर ज्वारा बोया जाता है. ऐसी मान्यता है की यह ज्वारा कार्यक्रम के अंत तक बड़े होकर रंग में पीले पड़ जाते हैं. जो ज्वारे पीले होते हैं उनको उखाड़कर खाया भी जाता है जिसका अधिक पुण्यलाभ प्राप्त होता है. ऐसी भी मान्यता है की जितने अधिक ज्वारे पीले होते हैं यज्ञ का फल उतना ही अधिक प्राप्त होता है. अंत में इस ज्वारे को भक्त-श्रद्धालुगण उखाड़ कर पास स्थित जलाशय के जल में प्रवाहित कर देते हैं. साथ ही पूजा से बचा हुआ सब निर्माल्य और अन्य उपयोग में लाये गयी पूजा सामग्री आदि को भी जल में जाकर प्रवाहित कर दिया जाता है. एक बात और भी गौर करने वाली है की आज के वर्तमान मेडिकल शोध में यह बात सिद्ध हो चुकी है की ज्वारे का रस कैंसर-एड्स जैसी बीमारियों के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. ज्वारे का जूस और रस नियमित पीने से शरीर की रोग-प्रतिरोधक शक्ति में विकास होता है और लाइलाज बीमारियों को ठीक करने में मदद मिलती है. यह हुआ भारतीय-धर्म परंपरा में ज्वारे बोने और और उसके खाने का सिद्धांत, निश्चित रूप से इससे हमारे धार्मिक कार्यक्रमों में उपयोग किये जाने वाले अवयवों की प्रमाणिकता और वैज्ञानिकता को बल मिलता है. अर्थात हिन्दू-धर्म सस्कृति में उपयोग होने वाले रूपकों का निश्चित रूप से एक न एक वैज्ञानिक सिद्धांत है.

इस बीच उपस्थित भक्त-श्रद्धालुगण चौथी खेलने की परंपरा का भी निर्वहन करते हैं. इस चौथी-दहकंदो की परंपरा में लोग सब बैर-भाव भूलकर एक दूसरे के ऊपर रंग-मिटटी आदि फेंकते हैं और एक-दूसरे को सफल कार्यक्रम की बंधाई देते हैं. वास्तव में यही हमारी भारतीय सस्कृति का सन्देश भी है अर्थात “वसुधैव कुटुम्बकम” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” के भाव में दृढ होकर सभी मानव और जीवों में एक ही परम शक्ति को देखना यही है भारतीय संस्कृति का सन्देश.  
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श्रीमद भागवत कथा धर्मार्थ समिति का अगला आयोजन दुर्गोत्सव का होगा- इस बीच शारदेय नवरात्रि के पावन अवसर पर प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले दुर्गोत्सव के कार्यक्रम की भी चर्चना कार्यकारिणी द्वारा हुई जिसमे दुर्गोत्सव के कार्यक्रम भी रूपरेखा अभी से तैयार करने पर विचार किया गया. इस सन्दर्भ में जल्द ही एक बैठक बुलाकर धर्मार्थ समिति के युवा-प्रकोष्ठ के द्वारा आयोजित होने वाले इस विशेष दुर्गोत्सव के कार्यक्रम की तैयारिओं पर विचार-विमर्श किया जायेगा.
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श्रीमद भागवत कार्यक्रम में विशेष सहयोगीगण - इस सार्वजनिक कार्यक्रम के विशेष सहयोगियों में कैथा ग्राम से श्री भैयालाल द्विवेदी, बी.एस.एफ सेवानिवृत निरीक्षक बुद्धसेन पटेल, समिति सदस्य वृजभान केवट, विशेषर प्रसाद केवट, दसरथ केवट, नन्दलाल केवट, गोकुल केवट, सेवानिवृत शिक्षक भैयालाल पाण्डेय, सेवानिवृत आर्मी कैप्टन रामाधार पाण्डेय, शैलेन्द्र पटेल, अम्बिका प्रसाद मिश्रा, बडोखर से मुनेन्द्र सिंह परिहार, सोरहवा निवासी हरिबंस पटेल, अरुणेन्द्र पटेल, राम नरेश पटेल, आदित्य पटेल, हिनौती से अखिलेश उपाध्याय, शिक्षक उमाकांत चतुर्वेदी, शिक्षक सोमधर द्विवेदी, जमुई से आचार्य पंडित श्री त्रिवेणी प्रसाद उपाध्याय, दुवगमा से महेंद्र त्रिपाठी, अमिलिया से मतिगेंद पटेल, और सिद्धमुनि प्रसाद द्विवेदी मुख्य सहयोगियों में से थे.

 
|||धन्यवाद|||
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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता, एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा  (म.प्र.) पिन ४८६११७
मोबाइल नंबर – 07869992139


Tuesday, 16 August 2016

(रीवा, म.प्र.) दिनांक 16 अगस्त को यज्ञ स्थली कैथा में भागवत कथा का सातवाँ दिन - कार्यक्रम में हवन और प्रसाद वितरण आज.




स्थान – कैथा, गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 16.08.2016, दिन मंगलवार,

यज्ञ स्थली कैथा में भागवत कथा का सातवाँ दिन – भगवान श्रीकृष्ण के लीलावतार के कुछ रहस्यों के साथ अन्य कथा प्रसगों की हुई संक्षिप्त चर्चना. कार्यक्रम में हवन और प्रसाद वितरण आज.

विषय- भारी बारिश के बीच पावन स्थली कैथा के श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में आज हवन-भंडारे के साथ होगा कार्यक्रम का समापन. श्रीमद भागवत के दसवें, ग्यारहवें और बारहवें स्कंध के परायण और श्रीकृष्ण लीला प्रसंग के साथ हुआ महापुराण का होगा विसर्जन. महायज्ञ का हवन और भंडारा आज.

 (कैथा, रीवा) श्रीमद भागवत के कथा प्रसंगों में मूल चर्चना भगवान् श्रीकृष्ण की लीला प्रसगों पर ही केन्द्रित है. हिन्दू-वैदिक संस्कृति में भगवान् नारायण के चौबीस अवतारों में से एक मुख्य अवतार भगवान् श्रीकृष्ण का है. महाभारत काल की कथा का वर्णन सम्पूर्ण भागवत महापुराण में जगह-जगह पर मिलता है परन्तु श्रीकृष्ण जी का विस्तृत लीलाचरित्र मुख्य रूप से दसवें स्कंध में मिलता है. भागवत कथा में दसवां स्कंध सबसे बृहद भी है. ग्यारहवां और बारहवां स्कंध अपेक्षाकृत छोटे हैं.

दसवें स्कंध को दो भागों में – पूर्वार्ध और उत्तरार्ध में विभाजित किया गया है. पूर्वार्ध के भागों की श्रीकृष्ण के अवतरण से लेकर अक्रूर के हस्तिनापुर गमन तक की कथा का वर्णन आता है. उत्तरार्ध की कथाओं में जरासंध का भीम के साथ युद्ध और जरासंध वध, विश्वकर्मा द्वारा द्वारिकापुरी का निर्माण, रुक्मिणी के सन्देश पर श्रीकृष्ण द्वारा रुक्मिणी का हरण, श्रीकृष्ण जी के गृहस्थ-धर्म का वर्णन और पांडवों की राजसूय यज्ञ में आकर श्रीकृष्ण को अपमानित करने वाले शिशुपाल का वध, सत्यभामा और जाम्बवंती के साथ कृष्ण जी की लीलाएं, उषा-अनिरुद्ध प्रेम-प्रसंग, बाणासुर के साथ युद्ध और श्रीकृष्ण-सुदामा की मैत्री प्रसंग भी सम्मिल्लित है.

ग्यारहवें और बारहवें स्कंध के कथा प्रसंग का वर्णन - भगवान के भक्तों के क्या लक्षण होने चाहिए इसका विस्तृत वृत्तान्त जनक और नौ-योगियों के संवाद से प्राप्त होता है. पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, चन्द्रमा, और सूर्य से हमे क्या शिक्षा ग्रहण करनी है इसका वृत्तान्त ब्रह्मवेत्ता दत्तात्रेय और यदु के संवाद से प्राप्त होता है. उद्धव को शिक्षा देते हुए आगे अठ्ठारह सिद्धियों का वर्णन आता है और तत्पश्चात ईश्वर की विभूतियों का वर्णन करते हुए वर्णाश्रम धर्म, भक्ति योग, कर्म योग, और ज्ञान योग का वर्णन आता है. बारहवें स्कंध में महाराज परीक्षित और उनके बाद के राजाओं का विवरण आता है. इस प्रकार अध्यात्मिक-धार्मिक के अतिरिक्त साहित्यिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी बारहवां स्कंध ज्यादा महत्वपूर्ण है.

श्रीमद भागवत कार्यक्रम में विशेष सहयोगीगण - इस सार्वजनिक कार्यक्रम के विशेष सहयोगियों में कैथा ग्राम से श्री भैयालाल द्विवेदी, बी.एस.एफ सेवानिवृत निरीक्षक बुद्धसेन पटेल, समिति सदस्य वृजभान केवट, विशेषर प्रसाद केवट, दसरथ केवट, नन्दलाल केवट, गोकुल केवट, सेवानिवृत शिक्षक भैयालाल पाण्डेय, सेवानिवृत आर्मी कैप्टन रामाधार पाण्डेय, सोरहवा निवासी हरिबंस पटेल, अरुणेन्द्र पटेल, राम नरेश पटेल, आदित्य पटेल, हिनौती से अखिलेश उपाध्याय, अश्वनी द्विवेदी, जमुई से आचार्य पंडित श्री त्रिवेणी प्रसाद उपाध्याय, दुवगमा से महेंद्र त्रिपाठी, अमिलिया से मतिगेंद पटेल, और  समिति के उपाध्यक्ष सिद्धमुनि प्रसाद द्विवेदी मुख्य सहयोगियों में से थे.    
श्रीमद भागवत महायज्ञ का हवन और भंडारा होगा आज – यज्ञों की पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में दिनांक 9 अगस्त से 16 अगस्त तक आयोजित होने वाली पापविनाशक, मोक्षप्रदायक, अमृतमयी श्रीमद भगवद कथा का समापन आज हवन और भंडारे के साथ दिनांक 16 अगस्त दिन मंगलवार को किया जायेगा.

भारी प्राकृतिक प्रकोप और बारिस के मध्य कार्यक्रम का सफल संचालन - सम्पूर्ण रीवा क्षेत्र में पिछले कुछ दिनों से हो रही भारी बारिस के वावजूद श्रीमद भागवत का कार्यक्रम अपने नियत समय और रूपरेखा के अनुसार चल रहा है. कार्यक्रम में प्रसाद वितरण का कार्यक्रम अपने यथावत प्लान के अनुरूप आज मंगलवार दोपहर दो बजे से श्रद्धालुओं के आगमन तक चलता रहेगा. भारी वर्षा के वावजूद भक्तों श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहा. कार्यक्रम का पूर्णरूपेण विषर्जन कल दिनांक 17 अगस्त 2016 को सुबह 10 बजे तक “चौथी-दहकंदो” आदि की ग्रामीण परंपरा का निर्वहन कर पूर्ण किया जायेगा.
यज्ञों की पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में भंडारे का प्रसाद ग्रहण करने हेतु आप सभी को सादर आमंत्रित किया जाता है.  

संलग्न - १) उपरोक्त प्रसंग का  MS Word और PDF file २) कार्यक्रम की कुछ फोटोग्राफ ३) समिति का लोगो 
|||धन्यवाद|||
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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता, एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा  (म.प्र.) पिन ४८६११७
मोबाइल नंबर – 07869992139 














Monday, 15 August 2016

(रीवा, म.प्र.) दिनांक 15 अगस्त को पावन स्थली कैथा में भागवत कथा का छठा दिन – मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और परशुराम के चरित्र का हो रहा वर्णन. हवन भंडारे के साथ महायज्ञ का समापन कल दिनाक 16 अगस्त 2016 को



स्थान – कैथा, गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 15.08.2016, दिन सोमवार,

पावन स्थली कैथा में भागवत कथा का छठा दिन – मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और परशुराम के चरित्र का हो रहा वर्णन. हवन भंडारे के साथ महायज्ञ का समापन कल दिनाक 16 अगस्त 2016 को.

विषय- प्रतिकूल प्राकृतिक दशाओं के वावजूद कैथा की पावन भूमि के श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में चल रही भागवत कथा का आज छठा दिन, आज दिनांक 15 अगस्त को नौवें और दसवें स्कंध की कथा का हो रहा वर्णन. भगवान् श्रीराम के आदर्श अनुकरणीय पावन चरित्र और परशुराम के तेजस्वी चरित्र का हो रहा वर्णन. हवन और भंडारे के साथ कल 16 अगस्त दिन मंगलवार को सम्पूर्ण होगा कार्यक्रम. आचार्य श्री चंद्रमणि प्रसाद पयासी द्वारा स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायों के साथ प्रारंभ हुआ छठे दिन के परायण का कार्य.

(कैथा, रीवा) सम्पूर्ण भागवत महापुराण की कथा भगवान् नारायण के चौबीस अवतारों और उनकी लीलाओं पर केन्द्रित है. श्रीमद भागवत महापुराण आज भटकी हुई मानवता के लिए एकमात्र सहारा और वरदान है. इस संसार सागर रुपी घोर अन्धकार से पार लगाने का एकमात्र प्रकाश रुपी पुंज है. भागवत कथा में मानव जीवन के प्रवंधन के सभी गुर मौजूद हैं. भागवत कथा के रूपकों को समझाने के लिए इसके ज्ञानपरक व्याख्या और टीका की आवश्यकता है. व्यक्ति के मानव धर्म, पति धर्म, स्त्री धर्म, सभी प्रकार के धर्मों के मर्यादित होने की वैज्ञानिक व्याख्या है श्रीमद भागवत महापुराण. आदर्शों के बिना कोई भी संस्कृति जीवित नहीं रह सकती विलुप्त संस्कृतियाँ इसका जीवंत उदाहरण है. और भारत वर्ष की सस्कृति में आदर्शों की कोई कमी भी नहीं है. मात्र आवश्यकता है उन आदर्शों के बौद्धिक अनुकरण की तरफ अग्रसर होने की. आज का समाज भौतिक सुख-सुविधा और विलासिता को ही अपना आदर्श मानता है. बिना त्याग के मानव जीवन परिष्कृत नहीं किया जा सकता. तप आदि का जो वर्णन हमारे शास्त्र-ग्रंथों में बारम्बार आता है उसका तात्पर्य ही है की जीवन में भले ही उतने अधिक कठिन और सैकड़ों-हजारों वर्षों के ऋषि मुनियों जैसे तप न हो पायें पर तप-त्याग बिना प्राप्त वरदान और सुख भी बेमानी होता है क्योंकि उसके उपभोग में वह आनंद की प्राप्ति नहीं होती है. तप-त्याग अर्थात कठिन परिश्रम से प्राप्त सुख (चाहे भौतिक हो अथवा अध्यात्मिक) उसका ज्यादा महत्व बन जाता है. नैतिक शास्त्रों में परिश्रम से प्राप्त धन की तीन गतियों का वर्णन आता है – दान, भोग और नाश. जो धन दान अथवा भोग नहीं किया जाता उसकी तीसरी गति अर्थात नाश बताई गयी है. आज विश्व भर की विभिन्न आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं में भी इसकी पुष्टि मिलती है की जो बजट उस देश विशेष के विकास के लिए नियत समय के लिए पास होता है यदि उसका उपभोग अर्थात उपयोग उस कार्य विशेष के लिए न हो तो वह लैप्स हो जाता है. अर्थात ज्यादा समय तक पड़ा हुआ धन जिसका न तो दान किया जाय और न उपभोग वह मात्र मिटटी अथवा पत्थर के सामान है उसका कोई उपयोग नहीं होता.   

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण का पावन और अनुकरणीय चरित्र-
भागवत कथा में श्री नारायण के चौबीस अवतारों में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम और लीला पुरषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण का चरित्र उल्लेखनीय और अत्यंत अनुकरणीय है. भगवान श्रीराम का अवतरण दिन के 12 बजे हुआ बताया गया है और श्रीकृष्ण का अवतरण रात्रि 12 बजे होना बताया गया है. भगवान श्रीराम का चरित्र अत्यंत शांत और सीधा-सरल है जबकि भगवान् श्रीकृष्ण का चरित्र रहस्यमय और अत्यंत गूढ़ है. भगवान् श्रीकृष्ण अर्धरात्रि में अवतरित हुए जबकि भगवान श्री राम मध्यान दिन में. श्रीराम, भगवान् शिव और श्रीकृष्ण भारतीय संस्कृति के आधार स्तम्भ हैं. आज सम्पूर्ण हिन्दू-सनातन संस्कृति में प्रत्येक माता-पिता अपने बालक-बालिकाओं का नामकरण इन्ही महान पुरुष और नारी शक्तिओं (सीता, राधा, पार्वती, शक्ति आदि के विभिन्न नाम) के आधार पर करते हैं. नाम मात्र का स्मरण आते ही उस नाम विशेष में छिपे गुण और शक्तियों का ध्यान सहज ही आ जाता है. वैसे आज वर्तमान आधुनिक परंपरा में भारतीय संस्कृति की यह भी विशेषता समाप्त होती प्रतीत हो रही है. आज के बच्चों का नामकरण उनके माता-पिता पश्चिमी सभ्यता के नामों के आधार पर रखना ज्यादा पसंद करते है जो कि हमारे संस्कृति का दुर्भाग्य है. ऐसे में होगा यह कि एक दिन व्यक्ति अपने आदर्शों को भी पूर्णतया भूल जायेगा. वैसे भी हमारे महान भगवत-स्वरुप पुरुष पहले आदर्श कम और हमारे संस्कृति के वास्तविक चरित्र ज्यादा थे. आज श्रीराम और श्रीकृष्ण वास्तविक चरित्र न होकर आदर्श बताये जा रहे हैं. आने वाले कल में यह भी संभव है कि इन महान चरित्रों को पूर्णतया काल्पनिक चरित्र बताकर एलियन अथवा दुसरे ग्रहों से आया हुआ बताया जाए. ऐसी परिस्थिति मात्र पश्चिमी संस्कृति के अन्धानुकरण और भारतीय संस्कृति और अपने प्रति हीनभावना से उत्पन्न हुई है. यदि इतिहास उठाकर देखा जाय तो सहज ही समझ में आ जायेगा की जो भी संस्कृतियाँ विलुप्तप्राय हुई हैं कहीं न कहीं ऐसे ही कुछ कारण रहे हैं. यद्यपि भारतीय संस्कृति के विषय में ऐसा पूर्ण विश्वास से कहा जा सकता है कि हमारी संस्कृति में जो अन्य संस्कृतियों को आत्मसात कर अपने आप में समाहित कर लेने की क्षमता है वह भारतीय संस्कृति को अन्य संस्कृतियों से अलग बनती है. परन्तु आज हमे अतिसय आत्मविश्वास में पड़ने के स्थान पर अपनी संस्कृति को समयानुरूप परिवर्धित कर इसे कैसे अधिक सार्थक बनाया जाए इस बात के चिंतन-मनन की आवश्यकता है. इसीलिए आज आवश्यकता है भारतीय शास्त्र-ग्रंथों के वैज्ञानिक-अध्यात्मिक विवेचना की न की उनके आख्यानों को अक्षरसः लेने की. क्योंकि निश्चित रूप से यदि भागवत महापुराण अथवा अन्य हिन्दू शास्त्रों की सभी बातें अक्षरसः ग्रहण की जाएँगी तो वह आज के इस वर्तमान परिवेश में सही नहीं बैठ पाएंगी और संभव है कि इस वर्तमान पीढ़ी में अपने संस्कृति और शास्त्रों के प्रति ज्यादा अविश्वास पैदा करें, इसीलिए आवश्यकता है इनके सही टीका की और विज्ञान संगत व्याख्या की.  

भागवत कथा प्रसंग में नौवें स्कंध का वर्णन हुआ और दसवां आज प्रारंभ होगा
पिछले दिनों की कथा प्रसंगों, जिसमे की समुद्र मंथन, देवासुर संग्राम, नारायण का वामन और मत्स्यावतार की चर्चना से सम्बंधित रही, से आगे बढ़ते हुए आते हैं नौवें स्कंध की कथा और भगवान् श्रीराम और परशुराम के अवतारों की कथा में. मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का अवतरण त्रेतायुग में बताया गया है. युगों में त्रेता युग द्वापर के पहले आता है इसीलिए भगवान के अवतारों में पहले मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का लीला प्रसंग आता है तत्पश्चात लीला पुरषोत्तम श्रीकृष्ण का अवतार द्वापर में आता है. जहाँ भगवान श्रीराम मर्यादा की प्रतिमूर्ति थे, वहीँ भगवान श्रीकृष्ण अपनी मानव लीलाओं के चलते लीला पुरषोत्तम कहलाये. भागवत महापुराण में अवतारों के क्रम को भलीभांति व्यवस्थित किया गया है. ऐसा माना जाता है कि काल-निर्धारण के क्रम में सबसे सात्विक और सत्यमार्ग की तरफ चलने की प्रेरणा देने वाला युग पहले आएगा और समय के साथ संस्कृतियों के पतन और अनाचार, अन्याय, अनैतिकता, झूठ-फरेब और मानव के नैतिक पतन की तरफ खींचने वाला कलिकाल या कलियुग अंत में आएगा. जैसे ही यह समय चक्र पूर्ण होगा, अन्याय, अत्याचार और अनैतिकता बढ़ने पर महाकाल रुपी वह परमेश्वर इस सृष्टि का संहार कर पुनः नवीन रचना करेंगे, ऐसा सिद्धांत हिन्दू-संस्कृति में माना जाता है. यह सिद्धांत काफी हद तक वैज्ञानिक भी है क्योंकि ऋग्वेद की नासदीय सूक्ति में सृष्टि की उत्पत्ति के पहले की क्या स्थिति थी इसका बहुत ही वैज्ञानिक विवरण आज से हजारों वर्ष पूर्व ही आ जाता है जब आज का तथाकथित विज्ञान पैदा भी नहीं हुआ था. आज का वर्तमान तथाकथित भौतिक/रासायनिक/जेनेटिक विज्ञान भी इस बात को मानता है की बिग-बैंग का जो सिद्धांत और ब्लैक-होल आदि का जो सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है वह काफी हद तक ऋग्वेद में वर्णित सृष्टि के उत्पत्ति के सिद्धांत से ही सम्बंधित है. 

ईश्वरीय अवतार परशुराम का चरित्र और अन्यायी क्षत्रियों का पतन – यहाँ पर एक विशेष सिद्धांत जिसे संस्कार का सिद्धांत कहते हैं पर प्रकाश डाला जाएगा. राजा गाधि-दम्पति के  सत्यवती नामक पुत्री का जन्म होता है. सत्यवती का विवाह ऋचिक ऋषि से होता है. सत्यवती और उसकी माता को पुत्र प्राप्ति की ईक्षा प्रबल होती है. इस पर ऋचिक ऋषि क्रमशः ब्राह्मण और क्षत्रिय संतान हेतु दो “चारु” अभिमंत्रित कर दोनों पत्नी-सास को अलग-अलग धारण के लिए देते हैं. परतु स्नान के वक्त यह “अभिमंत्रित चारु” सत्यवती द्वारा बदल लिया जाता है ऐसा बताया गया है. नियति अनुसार सत्यवती-ऋचिक के क्षत्रिय पुत्र जमदग्नि और गाधि-दम्पति को ब्राह्मण पुत्र विश्वामित्र का जन्म होता है. कालांतर में जमदग्नि के परशुराम अवतरित हुए. विश्वामित्र-वसिष्ठ विवाद के परिणामस्वरुप विश्वामित्र राजर्षि और राजर्षि से ब्रह्मर्षि हुए. यहाँ पर ध्यान देने योग्य है की यद्यपि विश्वामित्र छत्रिय कुल में जन्म लेते हैं परन्तु उनके गुण ब्राह्मण अर्थात त्याग-तपश्या वाले होते हैं क्योंकि ऋचिक ऋषि द्वारा जो “अभिमंत्रित चारु” सत्यवती की माता को अभिमंत्रित करके दिया गया था वह ब्राहमण अर्थात सात्विक-तप  गुणधर्म का था. इसी प्रकार परशुराम सात्विक-तपश्वी ब्राहमण कुल में जन्म लेने के बाद भी छत्रिय गुणधर्म अर्थात योध्या-रक्षा वाले उत्पन्न हुए क्योंकि उनके वंसज में पिता जमदग्नि स्वयं भी सत्यवती के द्वारा छत्रिय गुणधर्म वाले “अभिमंत्रित चारु” के कारण उत्पन्न हुए थे. इस प्रकार संस्कार-गुण-धर्म की वैज्ञानिकता यहाँ पर दृढ होती है. ऐसा माना जाता है की तदोपरांत कार्तवीर्य अर्जुन नामक क्षत्रिय राजा के पुत्रों के द्वारा जमदग्नि का वध करने के कारण बदला लेने और अन्यायी-अत्याचारी क्षत्रियों को सबक सिखाने के लिए इक्कीस बार परशुराम ने पृथ्वी से अत्याचारी क्षत्रिय राजाओं का सफाया किया. परशुराम को भगवान् विष्णु के चौबीस अवतारों में से एक महत्वपूर्ण अवतार माना जाता है. ऐसी भी मान्यता है की परशुराम का नाम उन्हें भगवान शिव से प्राप्त वरदान स्वरुप फरसे (या परशु) के कारण पड़ा.

भारतीय संस्कृति के वैदिक काल में वर्ण विभाजन और वर्ण धर्म – वर्ण क्रम का विभाजन सनातन है ऐसा श्रीमद भगवद गीता में श्री कृष्ण जी के द्वारा भी बताया गया है. भारतीय संस्कृति में वैदिक काल से ही वर्ण-धर्म परंपरा चली आ रही है. परन्तु यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि वैदिक काल की वर्ण-व्यवस्था आज के वर्ण-व्यवस्था जैसी नहीं थी. वैदिक काल की वर्ण व्यवस्था में व्यक्ति के “गुण-कर्म-स्वभाव” तीनों के आधार पर बनाई गयी थी न की व्यक्ति के जन्म और जाति के आधार पर जैसी की आजकल वर्तमान परिवेश में चल रही है. स्वयं ऋग्वेद में व्याख्या आती है की सृष्टि की उत्पत्ति में उस परमपुरुष अर्थात परमेश्वर के पाद (जंघा और उसके नीचे के भाग) से शूद्र (शूद्र का तात्पर्य मजदूर और लेबर समुदाय से है), उदर भाग से वैश्य (वैश्य का तात्पर्य खेती-किसानी और व्यापार करने वाले समुदाय से है), छाती-भुजाओं से कक्षत्रिय (क्षत्रिय का तात्पर्य सुरक्षा व्यवस्था, शासन-प्रशासन का कार्य देखने वाले समुदाय से है) और शिर से ब्राह्मण (ब्राहमण का तात्पर्य ज्ञान, शिक्षा, अद्ययन-अध्यापन के कार्य में रूचि रखने वाले और रत रहने वाले बौद्धिक समुदाय से है) का अवतरण हुआ. वेदों उपनिषदों में ऐसा भी व्याख्यान आता है की हर मानव जन्म के समय बाल्यावस्था में शूद्र होता है, और मात्र अपने भविष्य के कर्मों के अनुरूप ही वह द्विज बनता है. द्विज का तात्पर्य है जिसका की दूसरा जन्म हुआ हो. यह जन्म कैसा होता है? निश्चित तौर पर वैज्ञानिक और भौतिक दृष्टि से प्रत्येक जीव का जन्म मात्र एक बार ही होता है. परन्तु यहाँ दूसरे जन्म का तात्पर्य है ज्ञान प्राप्त करने से और मोक्ष की दिशा में अग्रसर होने से है. जब कोई मानव जन्म लेता है तो वह पूर्णतया अज्ञानी होता है और बाल्यावस्था में पांच वर्ष तक मात्र उसके पूर्व जन्मों के संचित कर्म ही उसके साथ रहते हैं. परन्तु वह जन्म लेने के बाद कैसे संस्कार प्राप्त करता है, किस परिवेश में पलता-बढ़ता है, कैसी शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करता है उसके अनुरूप जाकर वह व्यापारी, योध्या, अथवा ज्ञानी बनता है. इसी को दूसरा जन्म अर्थात द्विज कहा गया है. सामान्यतया आजकल पोंगा-पंडित की भाषा में द्विज का तात्पर्य मात्र “जनेऊ संस्कार” और “गुरु मन्त्र” लेने तक ही सीमित कर दिया गया है जो उचित व्याख्या नहीं है. इस प्रकार की अधूरी व्याख्या से धर्म और शास्त्रों के प्रति भ्रम और विशंगति पैदा होती है.
 वर्ण व्यवस्था के विषय में तथाकथित मनुवादी परंपरा का विरोध करने वाले तथाकथित बुद्धिमान व्यक्ति ऐसा आक्षेप लगाते हैं कि वेदों में चार वर्णों की जो व्याख्या की गयी है उसमे शूद्र को पुरुष के पैरों और जांघ के नीचे से उत्पन्न होना बताया गया है और यह ब्राह्मणवादी पंडितों द्वारा निम्न जातिवर्ग के समुदाय को अपमानित करने की साजिश है. परन्तु यह सही धारणा नहीं है. वास्तव में वह “परम पुरुष” कोई सामान्य “पुरुष” नहीं वह “परम पुरुष” अर्थात स्वयं परमेश्वर ही है जिसके शरीर के विभिन्न भागों से चारों-वर्णों को उत्पन्न होना बताया गया है. ऐसे नास्तिक आलोचकों को यह नहीं भूलना चाहिए की बड़े से बड़े महान से महानतम तत्वज्ञानी, ब्रह्मर्षि ऋष-मुनि भी जिन “परम पुरुष” के चरण कमलों अर्थात श्रीराम और श्रीकृष्ण के चरण कमलों में अपना ध्यान लगाये रहते हैं तो क्या इसमें यह मान लिया जाय कि कोई ब्राह्मण या ब्रह्मर्षि तत्वज्ञानी क्यों उस “पुरुष” के चरणों में ध्यान लगाये जहाँ से शूद्रों की उत्पत्ति बताई गयी है. तात्पर्य यह है की यह समझाने हेतु एक रूपक मात्र है. यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक ही शक्ति “परम ब्रहम” की शक्तियों से संचालित है. देव-दानव, जीव-जंतु, चराचर, स्थावर-जंगम सब वहीँ उसी से उत्पन्न हुए हैं कहीं अन्यत्र से नहीं. और वर्ण-व्यवस्था की व्याख्या के पीछे का उदेश्य मात्र यह समझाना है की कर्म-गुण-स्वभाव तीनों के अनुरूप ही व्यक्ति मजदूर, योध्या या पंडित बनेगा. आज यदि कोई प्रधानमत्री या राष्ट्रपति यह सोचे की उसकी संतान या सम्बन्धी उसी की तरह क्यों प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं बन पाए अथवा कैसे वैज्ञानिक-प्रोफेसर की संतान वैज्ञानिक और प्रोफेसर नहीं बन पाए तो यह पत्थर में शिर फोड़ने जैसा है. आज जेनेटिक विज्ञान भी भलीभांति यह सिद्ध कर चुका है की जिस व्यक्ति में जैसे जींस रहते हैं वह वैसा ही बनता है. कुल मिलाकर अपने पूर्व-जन्म के प्रारब्ध कर्मों और अपनी किस्मत को दोष देना ज्यादा उत्तम रहेगा. इसमें वर्ण व्यवस्था बनाने वालों का कोई दोष नहीं है. यदि वैदिक काल में वर्ण-व्यवस्था नहीं होती तो सभी एक सामान होने के लिए लड़-मर जाते, चोरी-डकैती करते, और अनैतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती इस बात को वर्तमान काल में महात्मा गाँधी भी स्वीकारते हैं.
वर्ण व्यवस्था सामाजिक व्यवस्था को चलाने के लिए बनाई गयी एक अत्यंत वैज्ञानिक व्यवस्था है जैसा की आज भी बनाया जा रहा है. यहाँ तक की श्रीकृष्ण के माध्यम से अर्जुन को समझाते  हुए बताया गया है की “हे अर्जुन! काल के प्रारंभ में मैंने ही गुण-कर्म-स्वभाव के अनुरूप वर्ण व्यवस्था का निर्माण इस संसार चक्र को चलाने हेतु किया है”. ध्यान दें की श्री कृष्ण यहाँ कह रहे हैं कि वर्ण-व्यवस्था “गुण-कर्म और व्यक्ति के स्वभाव” के अनुसार बनाई गयी है न की जाति के आधार पर जैसा की सत्ता की लोलुपता वाले तथाकथित नेता आज इसको बना दिए हैं. किसी भी संस्कृति के शास्त्र-ग्रन्थ उनके उद्भव के समय की व्यवस्था बयां करते हैं. मानाकि आज समय परिवर्तित हो गया है परन्तु जो लोग वर्ण-व्यवस्था को मनुवादी बता रहे हैं क्या उनके पास आज के सांस्कृतिक-आतंकवाद का कोई जबाब है? क्या ऐसे आलोचक यह बता सकते हैं कि आज जो सम्पूर्ण विश्व में पूंजीवादी व्यवस्था अपने चरम पर है और जिसके पास धन-बल हैं रूपया-पैसा है उसे सभी सुख-सुविधा मिलती है और जिसके पास धन नहीं है वह शूद्रों से भी बदतर जीवन जीने के लिए मजबूर है? इन सबका क्या तोड़ है? हम भी ऐसे आलोचकों से पूंछना चाहते है- आज जो नक्सलवाद, मजदूर-मालिक, धनी-गरीब में संघर्ष हो रहा है उसका क्या समाधान आज की सरकारों और ऐसे आलोचकों के पास है?         
   वास्तविकता तो यही है की जो भी सामाजिक व्यवस्थाएं बनती हैं वह अपने समय की यथोचित व्यवस्था ही होती हैं परन्तु व्यवस्था बनने के उपरांत उनके दुरुपयोग की प्रथा आदि काल से चलती आ रही है. प्रत्येक समाज के कुछ स्वार्थी तत्त्व व्यवस्थाओं को आधार बनाकर अपनी रोटी सेंकने लगते हैं. और वही वर्ण-व्यवस्था के साथ भी हुआ. श्रीमद भगवद गीता और वेदों में वर्णित वर्ण व्यवस्था में कोई कमी नहीं थी मात्र कमी थी उसके सही क्रियान्वयन में.

श्रीमद भागवत कार्यक्रम में विशेष सहयोगीगण - इस सार्वजनिक कार्यक्रम के विशेष सहयोगियों में कैथा ग्राम से श्री भैयालाल द्विवेदी, बी.एस.एफ सेवानिवृत निरीक्षक बुद्धसेन पटेल, समिति सदस्य वृजभान केवट, विशेषर प्रसाद केवट, दसरथ केवट, नन्दलाल केवट, गोकुल केवट, सेवानिवृत शिक्षक भैयालाल पाण्डेय, सेवानिवृत आर्मी कैप्टन रामाधार पाण्डेय, सोरहवा निवासी हरिबंस पटेल, अरुणेन्द्र पटेल, राम नरेश पटेल, आदित्य पटेल, हिनौती से अखिलेश उपाध्याय, अश्वनी द्विवेदी, जमुई से आचार्य पंडित श्री त्रिवेणी प्रसाद उपाध्याय, दुवगमा से महेंद्र त्रिपाठी, अमिलिया से मतिगेंद पटेल, और  समिति के उपाध्यक्ष सिद्धमुनि प्रसाद द्विवेदी मुख्य सहयोगियों में से थे.    
यज्ञों की पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में दिनांक 9 अगस्त से 16 अगस्त तक  आयोजित होने वाली पापविनाशक अमृतमयी श्रीमद भगवद कथा का श्रवणपान करने के लिए आप सभी सादर आमंत्रित हैं.
|||धन्यवाद|||
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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता, एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा  (म.प्र.) पिन ४८६११७

मोबाइल नंबर – 07869992139