दिनांक 24 अगस्त 2018, स्थान - गढ़/गंगेव, रीवा मप्र
(कैथा श्रीहनुमान मंदिर से, शिवानन्द द्विवेदी)
पावन पुनीत धर्मस्थली कैथा श्रीहनुमान मंदिर प्राँगण में पचास से अधिक वर्षों से श्रावण के पवित्र महीने में आयोजित होने वाली श्रीमद भगवद कथा का अविरल प्रवाह आचार्य श्री दिलीप जी के मुखारविंद से निरंतर चल था है. अमृतमयी मोक्षप्रदायक कथा का श्रवण कर समस्त उपस्थित भक्त श्रद्धालुगण अपने आपको धन्य महसूस कर रहे हैं. जैसे ही कार्यक्रम अपने चरम पर पहुंच रहा है भक्तों श्रद्धालुओं का तांता बढ़ता जा रहा है. कैथा के साथ साथ दूर दूर के ग्राम जैसे हिनौती, करहिया, भठवा, मदरी, अगडाल, पडुआ, लोटनी, कठमना, सेदहा, बड़ोखर, पनगड़ी, पताई, अतरैला, डाढ़, सर्रा, नेवरिया कटरा, कलवारी, गढ़, लाल गांव आदि ग्रामों से भक्त श्रद्धालुगण उपस्थित होकर कथा श्रवण कर रहे हैं.
दसवें स्कंध अर्थात श्रीकृष्णलीला का चल रहा वर्णन
आचार्य श्री दिलीप जी के मुखारविंद से इस समय दसवें स्कंध की कथा चल रही है जिंसमे श्रीकृष्ण लीला का वर्णन चल रहा है. श्रीकृष्ण जी की बाललीलाओं के वर्णन के साथ ही वृंदावन लीला, ब्रह्माजी का मोह और उसका नाश, इंद्रायज्ञ निवारण एवं गोवर्धन धारण, चीरहरण लीला, गोपियों के द्वारा दुर्वाशा को भोजन एवं उससे शिक्षा, रासलीला का प्रारम्भ एवं श्रीकृष्ण का काम विजय, श्रीकृष्ण का गोपियों को समझाना, गोपियों का पावन प्रेम, भगवान का अंतर्धान एवं गोपियों का विरह, गोपिका गीत, श्रीकृष्ण का प्रकट होकर गोपियों को सांत्वना देना एवं महात्म्य, कंस का अक्रूर प्रसंग, कंस मुक्ति आदि कथा प्रसंगों का वर्णन चल रहा है.
शुद्ध जीव का ब्रह्म के साथ विलाश ही रास है
आचार्य जी ने बताया की रासलीला के तीन सिद्धांत हैं एक इसमे गोपियों के शरीर से कोई लेना देना नही है, दूसरा इसमे लौकिक काम वासना नही है एवं तीसरा यह साधारण स्त्री पुरुष का प्रेम न होकर जीव एवं ईश्वर का मिलन है.
शुद्ध जीव का ब्रह्म के साथ विलाश ही रास है. शुद्ध जीव का अर्थ माया के आवरण से रहित जीव. ऐसे जीव का ही ब्रह्म से मिलन संभव है. श्री शुकदेव जी कहते हैं इस लीला का चिंतन करना है अनुकरण नही. पति के वियोग में छटपटाती हुई पत्नी की भांति ईश्वर के वियोग में जीव छटपटाता है, ऐसा बताना ही रासलीला का हेतु है. श्रीकृष्ण के विरह में जिसकी देह तप्त नही हुई उसे ईश्वर मिल नही सकते. उस आतुरता का यथार्थ वर्णन करने के लिए ही श्रृंगार रस का आश्रय लिया गया है. रास में आत्मा और परमात्मा का निर्विकार मिलन है न कि काम वासना.
आचार्य जी ने बताया की रासलीला कामलीला नही बल्कि काम पर विजय लीला है. श्रीकृष्ण के पास काम जा ही नही सकता और लौकिक का आभास होने पर भी यह क्रिया काम विकाररहित है. श्रीधर स्वामी ने इसे काम विजय लीला कहा है.
श्रीकृष्ण जी कोई सामान्य देव नही बल्कि साक्षात परमात्मा हैं. उन्होंने अपनी लीलाओं से समस्त देवों का पराभव किया जिसे देखकर कामदेव को लगा की श्रीकृष्ण को हराकर वह श्रेष्ठ बन सकते हैं. परंतु हुआ उसका उल्टा. श्रीकृष्णजी ने काम को कहा की क्या तुम्हे याद नही भगवान शिव ने किस तरह तुन्हें भस्मीभूत किया था. काम बोले वह तो समाधिस्थ थे और मैंने गलती की थी, समाधिस्थ शिव को व्यवधान उत्पन्न नही करना था इसलिए मैं हारा. श्रीकृष्ण ने आगे कहा की क्या तुम रामावतार भी भूल गए. कामदेव ने जबाब दिया श्रीराम ने तो एक पत्नी का व्रत लिया था और वह मर्यादा पुरुषोत्तम थे, उन्होंने तो स्वप्न जागृत किसी अवस्था मे मर्यादा का उल्लंघन नही किया. अतः उनको भी नही जीता जा सकता था लेकिन आप तो काम में ही लिपटे हुए हैं. सुंदर गोपियों के बीच में रहते हैं. गोपियों का चीरहरण करते हैं. माखन चोरी किये. अतः आप को तो मैं जीत ही लूंगा. कामदेव बोले चलिए आप शरदपूर्णिमा की रात को गोपियों के साथ रासलीला करिए और मैं उसी समय कामबाण चलाता हूँ. यदि आप उसके पांस में आ गए तो मैं जीता और यदि नही आये तो आपको मैं श्रेष्ठ परमात्मा मानकर आपका शरणागत हो जाऊंगा.
इस प्रकार शरदपूर्णिमा की रात को भगवान लीलापुरुषोत्तम रासलीला करते हैं और काम हार जाते हैं क्योंकि श्रीकृष्ण तो कामरहित परमात्मा हैं वह तो साक्षात ब्रह्म हैं, काम के बाण का कोई प्रभाव नही हुआ और कामदेव का अहंकार टूट जाता है, काम हार जाता है. इस प्रकार यह व्याख्यान उन सांसारिक लोगों का भ्रम दूर करने के लिए है जो श्रीकृष्ण के रासलीला को कामलीला समझते हैं यह उनको समझाने के लिए है की श्रीकृष्ण परमब्रह्म परमेश्वर लीलापुरुषोत्तम हैं और प्रभु की रासलीला लौकिक न होकर पारलौकिक अलौकिक है. रास में काम का नामोनिशान नही है. रास पूर्णरूपेण कामरहित है.
श्रीधर स्वामी कहते हैं की रासलीला के पांच अध्याय पँचप्राणों के सूचक प्रतीक हैं. पँचप्राणों का ईश्वर के साथ रमण ही रास है. रासपंचाध्यायी काम विजय के लिए है न की काम उत्पन्न करने के लिए. सांसारिक मॉनव जिसकी बुद्धि काम क्रोध मोह लोभ अज्ञान के अंधकार और काम के बादल से ढकी हुई है वह प्रभु श्रीकृष्ण की रासलीला का गलत तात्पर्य निकालता है वह त्रुटिपूर्ण है और उसकी वास्तविक आध्यत्मिक गहराईयों से अलग है. रासलीला शाब्दिक और लौकिक न होकर पारलौकिक अलौकिक और आध्यात्मिक है. जो योध्या शस्त्र से घायल नही हो सकता वह कामरूपी अस्त्र से मार खाता है. अतः जो काम पर विजय प्राप्त कर लिया वह काल पर विजय प्राप्त कर लिया.
कार्यक्रम में प्रतिदिन हो रही संध्या भजन
श्रीमद्भागवत कथा उपरांत प्रतिदिन सायंकाल को संध्या भजन कीर्तन और रामायण पाठ हो रहा है। इस बीच अब तक उपस्थित कलाकारों में मदरी से अम्बिका पटेल, नामदेव एवं उनकी संगत ने सुंदर भजन प्रस्तुतियां दी हैं।
कैथा और करहिया से कलाकारों में सिद्धमुनि द्विवेदी, संपति पटेल, लल्लू सिंह, रमेश सिंह, दिनेश लोनिया, बृजभान केवट आदि ने सुंदर रामायण भजन की प्रस्तुतियां दी हैं। इस बीच 24 अगस्त की सायंकालीन भजन संध्या में कैथा करहिया ग्राम के कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे।
हवन भंडारा 25 अगस्त दिन शनिवार को
दिनांक 18 अगस्त दिन शनिवार से कलश यात्रा के साथ प्रारम्भ हुआ श्रीमद भागवत महायज्ञ दिनांक 25 अगस्त दिन शनिवार को ही सहस्त्रनाम हवन एवं भंडारे के साथ सम्पन्न होगा. भंडारे में समस्त ग्राम-क्षेत्र वासियों का सहयोग रहता है. जीव कल्याणार्थ एवं विश्वशांति के लिए आयोजित श्रीमद भागवत महायज्ञ के हवन एवं भंडारे के कार्यक्रम में सभी भक्त श्रद्धालुओं को सादर आमंत्रित किया जाता है.
संलग्न - कार्यक्रम की संलग्न फ़ोटो यहां पर संलग्न हैं.
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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,
ज़िला रीवा, मप्र, मोबाइल 9589152587, 7869992139,