Friday, 24 August 2018

कैथा में भागवत कथा का छठा दिवश - शुद्ध जीव का ब्रह्म के साथ विलाश ही रासलीला है


दिनांक 24 अगस्त 2018, स्थान - गढ़/गंगेव, रीवा मप्र

(कैथा श्रीहनुमान मंदिर से, शिवानन्द द्विवेदी)

   पावन पुनीत धर्मस्थली कैथा श्रीहनुमान मंदिर प्राँगण में पचास से अधिक वर्षों से श्रावण के पवित्र महीने में आयोजित होने वाली श्रीमद भगवद कथा का अविरल प्रवाह आचार्य श्री दिलीप जी के मुखारविंद से निरंतर चल था है. अमृतमयी मोक्षप्रदायक कथा का श्रवण कर समस्त उपस्थित भक्त श्रद्धालुगण अपने आपको धन्य महसूस कर रहे हैं. जैसे ही कार्यक्रम अपने चरम पर पहुंच रहा है भक्तों श्रद्धालुओं का तांता बढ़ता जा रहा है. कैथा के साथ साथ दूर दूर के ग्राम जैसे हिनौती, करहिया, भठवा, मदरी, अगडाल, पडुआ, लोटनी, कठमना, सेदहा, बड़ोखर, पनगड़ी, पताई, अतरैला, डाढ़, सर्रा, नेवरिया कटरा, कलवारी, गढ़, लाल गांव आदि ग्रामों से भक्त श्रद्धालुगण उपस्थित होकर कथा श्रवण कर रहे हैं.

   दसवें स्कंध अर्थात श्रीकृष्णलीला का चल रहा वर्णन

   आचार्य श्री दिलीप जी के मुखारविंद से इस समय दसवें स्कंध की कथा चल रही है जिंसमे श्रीकृष्ण लीला का वर्णन चल रहा है. श्रीकृष्ण जी की बाललीलाओं के वर्णन के साथ ही वृंदावन लीला, ब्रह्माजी का मोह और उसका नाश, इंद्रायज्ञ निवारण एवं गोवर्धन धारण, चीरहरण लीला, गोपियों के द्वारा दुर्वाशा को भोजन एवं उससे शिक्षा, रासलीला का प्रारम्भ एवं श्रीकृष्ण का काम विजय, श्रीकृष्ण का गोपियों को समझाना, गोपियों का पावन प्रेम, भगवान का अंतर्धान एवं गोपियों का विरह, गोपिका गीत, श्रीकृष्ण का प्रकट होकर गोपियों को सांत्वना देना एवं महात्म्य, कंस का अक्रूर प्रसंग, कंस मुक्ति आदि कथा प्रसंगों का वर्णन चल रहा है.  

 शुद्ध जीव का ब्रह्म के साथ विलाश ही रास है

    आचार्य जी ने बताया की रासलीला के तीन सिद्धांत हैं एक इसमे गोपियों के शरीर से कोई लेना देना नही है, दूसरा इसमे लौकिक काम वासना नही है एवं तीसरा यह साधारण स्त्री पुरुष का प्रेम न होकर जीव एवं ईश्वर का मिलन है.

    शुद्ध जीव का ब्रह्म के साथ विलाश ही रास है. शुद्ध जीव का अर्थ माया के आवरण से रहित जीव. ऐसे जीव का ही ब्रह्म से मिलन संभव है. श्री शुकदेव जी कहते हैं इस लीला का चिंतन करना है अनुकरण नही. पति के वियोग में छटपटाती हुई पत्नी की भांति ईश्वर के वियोग में जीव छटपटाता है, ऐसा बताना ही रासलीला का हेतु है. श्रीकृष्ण के विरह में जिसकी देह तप्त नही हुई उसे ईश्वर मिल नही सकते. उस आतुरता का यथार्थ वर्णन करने के लिए ही श्रृंगार रस का आश्रय लिया गया है. रास में आत्मा और परमात्मा का निर्विकार मिलन है न कि काम वासना. 

    आचार्य जी ने बताया की रासलीला कामलीला नही बल्कि काम पर विजय लीला है. श्रीकृष्ण के पास काम जा ही नही सकता और लौकिक का आभास होने पर भी यह क्रिया काम विकाररहित है. श्रीधर स्वामी ने इसे काम विजय लीला कहा है. 

   श्रीकृष्ण जी कोई सामान्य देव नही बल्कि साक्षात परमात्मा हैं. उन्होंने अपनी लीलाओं से समस्त देवों का पराभव किया जिसे देखकर कामदेव को लगा की श्रीकृष्ण को हराकर वह श्रेष्ठ बन सकते हैं. परंतु हुआ उसका उल्टा. श्रीकृष्णजी ने काम को कहा की क्या तुम्हे याद नही भगवान शिव ने किस तरह तुन्हें भस्मीभूत किया था. काम बोले वह तो समाधिस्थ थे और मैंने गलती की थी, समाधिस्थ शिव को व्यवधान उत्पन्न नही करना था इसलिए मैं हारा. श्रीकृष्ण ने आगे कहा की क्या तुम रामावतार भी भूल गए. कामदेव ने जबाब दिया श्रीराम ने तो एक पत्नी का व्रत लिया था और वह मर्यादा पुरुषोत्तम थे, उन्होंने तो स्वप्न जागृत किसी अवस्था मे मर्यादा का उल्लंघन नही किया. अतः उनको भी नही जीता जा सकता था लेकिन आप तो काम में ही लिपटे हुए हैं. सुंदर गोपियों के बीच में रहते हैं. गोपियों का चीरहरण करते हैं. माखन चोरी किये. अतः आप को तो मैं जीत ही लूंगा. कामदेव बोले चलिए आप शरदपूर्णिमा की रात को गोपियों के साथ रासलीला करिए और मैं उसी समय कामबाण चलाता हूँ. यदि आप उसके पांस में आ गए तो मैं जीता और यदि नही आये तो आपको मैं श्रेष्ठ परमात्मा मानकर आपका शरणागत हो जाऊंगा. 

   इस प्रकार शरदपूर्णिमा की रात को भगवान लीलापुरुषोत्तम रासलीला करते हैं और काम हार जाते हैं क्योंकि श्रीकृष्ण तो कामरहित परमात्मा हैं वह तो साक्षात ब्रह्म हैं, काम के बाण का कोई प्रभाव नही हुआ और कामदेव का अहंकार टूट जाता है, काम हार जाता है. इस प्रकार यह व्याख्यान उन सांसारिक लोगों  का भ्रम दूर करने के लिए है जो श्रीकृष्ण के रासलीला को कामलीला समझते हैं यह उनको समझाने के लिए है की श्रीकृष्ण परमब्रह्म परमेश्वर लीलापुरुषोत्तम हैं और प्रभु की रासलीला लौकिक न होकर पारलौकिक अलौकिक है. रास में काम का नामोनिशान नही है. रास पूर्णरूपेण कामरहित है. 

   श्रीधर स्वामी कहते हैं की रासलीला के पांच अध्याय पँचप्राणों के सूचक प्रतीक हैं. पँचप्राणों का ईश्वर के साथ रमण ही रास है. रासपंचाध्यायी काम विजय के लिए है न की काम उत्पन्न करने के लिए. सांसारिक मॉनव जिसकी बुद्धि काम क्रोध मोह लोभ अज्ञान के अंधकार और काम के बादल से ढकी हुई है वह प्रभु श्रीकृष्ण की रासलीला का गलत तात्पर्य निकालता है वह त्रुटिपूर्ण है और उसकी वास्तविक आध्यत्मिक गहराईयों से अलग है. रासलीला शाब्दिक और लौकिक न होकर पारलौकिक अलौकिक और आध्यात्मिक है. जो योध्या शस्त्र से घायल नही हो सकता वह कामरूपी अस्त्र से मार खाता है. अतः जो काम पर विजय प्राप्त कर लिया वह काल पर विजय प्राप्त कर लिया.

कार्यक्रम में प्रतिदिन हो रही संध्या भजन

   श्रीमद्भागवत कथा उपरांत प्रतिदिन सायंकाल को संध्या भजन कीर्तन और रामायण पाठ हो रहा है। इस बीच अब तक उपस्थित कलाकारों में मदरी से अम्बिका पटेल, नामदेव एवं उनकी संगत ने सुंदर भजन प्रस्तुतियां दी हैं। 

    कैथा और करहिया से कलाकारों में सिद्धमुनि द्विवेदी, संपति पटेल, लल्लू सिंह, रमेश सिंह, दिनेश लोनिया, बृजभान केवट आदि ने सुंदर रामायण भजन की प्रस्तुतियां दी हैं। इस बीच 24 अगस्त की सायंकालीन भजन संध्या में कैथा करहिया ग्राम के कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे।

  हवन भंडारा 25 अगस्त दिन शनिवार को

   दिनांक 18 अगस्त दिन शनिवार से कलश यात्रा के साथ प्रारम्भ हुआ श्रीमद भागवत महायज्ञ दिनांक 25 अगस्त दिन शनिवार को ही सहस्त्रनाम हवन एवं भंडारे के साथ सम्पन्न होगा. भंडारे में समस्त ग्राम-क्षेत्र वासियों का सहयोग रहता है. जीव कल्याणार्थ एवं विश्वशांति के लिए आयोजित श्रीमद भागवत महायज्ञ के हवन एवं भंडारे के कार्यक्रम में सभी भक्त श्रद्धालुओं को सादर आमंत्रित किया जाता है.

संलग्न - कार्यक्रम की संलग्न फ़ोटो यहां पर संलग्न हैं.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा, मप्र, मोबाइल 9589152587, 7869992139,

Thursday, 23 August 2018

कैथा में भागवत कथा का पांचवां दिवश - संसार का सम्पूर्ण विस्मरण और परमात्मा का सतत स्मरण ही मुक्ति है

दिनाँक 23 अगस्त 2018, स्थान - गढ़/गंगेव, रीवा मप्र 

  (कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी) 

   यज्ञों की पावन स्थली कैथा के श्रीहनुमान मंदिर प्राँगण में दिनांक 23 अगस्त दिन बृहस्पतिवार को श्रीमद भागवत का पांचवा दिन रहा. इस बीच आचार्य श्री दिलीप जी महाराज के मुखारविंद से अमृतमयी मोक्षप्रप्रदायनी भागवत कथा का परायण एवं प्रवचन कार्य सतत चल रहा है. 

     चौथे दिन की कथा के बाद पांचवें दिन की कथा में सातवें, आठवें, नौवें एवं दसवें स्कंध की मूल कथा प्रसंगों का वर्णन हुआ. दसवें स्कंध की कथा के साथ ही श्रीकृष्ण जी का जन्म एवं उनकी बाल लीलाओं का समावेश हुआ. उपस्थित भक्त श्रद्धालुओं ने दिनांक 22 अगस्त बुधवार की कथा में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाया. वहीं दिनांक 23 अगस्त की कथा श्रीकृष्ण जी की बाल लीलाओं पर केंद्रित रही. पिछले दिनों भगवान के दशावतारों में से भगवान श्रीराम के भी अवतार की चर्चना हुई जिंसमे आचार्य जी ने श्रीराम सहित चारों भाइयों की कथा की व्याख्या करते हुए कथा की आध्यात्मिक गहराईयों की चर्चना भी की.

   दसवें स्कंध की चल रही कथा

      दसवें स्कंध की कथा प्रेमरस प्रदायिनी श्रीकृष्ण कथा की महत्वा के साथ प्रारम्भ हुई जिंसमे वसुदेव देवकी विवाह, आकाशवाणी तथा कंस द्वारा देवकी के छः संतानों की हत्या, भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य, गोकुल में भगवान का जन्मोत्सव, भगवान शिवशंकर का अवधूत वेश में बालकृष्ण का दर्शन, पूतना उद्धार, तृणावर्त उद्धार, नामकरण संस्कार एवं बाललीला, मिट्टी खाने के बहाने यशोदाजी को श्रीकृष्ण द्वारा अपने मुख में ब्रह्मांड दर्शन, कृष्णलीला से साहसिक समाधि, मैया यशोदा का स्नेहपुरित वात्सल्य, श्रीकृष्ण का मूसल से बंधा जाना, यमलार्जुन उद्धार आदि कथा प्रसंगों का वर्णन हुआ. 

प्रेमरस प्रदायनी मोक्षप्रदायनी है श्रीकृष्ण कथा 

   श्रीमद भागवत कथा सात दिनों में मुक्ति दिलाने वाली है. आचार्य जी ने बताया की ब्राह्मण पुत्र के श्राप के बाद महाराज परीक्षित को सात दिवश के भीतर तक्षक नामक नाग के काटने से मृत्यु होना बताया गया. सात दिन में मृत्यु होने का तात्पर्य का वर्णन करते हुए आचार्य जी ने बताया की सभी को इन सात दिनों के भीतर ही शरीर छोड़ना होता है क्योंकि सप्ताह में मात्र सात दिन ही होते हैं आठवां नही.

  मृत्युशैया पर बैठे व्यक्ति का क्या कर्तव्य होना चाहिए - परीक्षित जी का प्रश्न

    श्री शुकदेव जी के समक्ष उपस्थित होकर महाराज परीक्षित ने जो जनहितैसी प्रश्न किया उसकी गहराईयां समझाते हुए आचार्य जी ने बताया की हड़बड़ाहट और भय में व्यथित न होकर धैर्य सामर्थ्य का परिचय देते हुए और अपने राजा के कर्तव्य का पालन करते हुए महाराज परीक्षित ने अपने व्यक्तिगत उद्धार की नही बल्कि जनहित में यह प्रश्न रखा की मृत्युशैया पर विराजमान अर्थात ऐसा व्यक्ति जिसकी मृत्यु होना निकट है जिसका की उसे पूर्णरूपेण पता चल जाए, ऐसे व्यक्ति को कौन से कार्य करने चाहिए. इस प्रकार श्री शुकदेव जी ने मोक्षप्रदायक भागवत सप्ताह कथा कही।

मुक्ति मन को मिलती है आत्मा को नही, क्योंकि आत्मा तो नित्य मुक्त है

   आचार्य जी ने वैदिक वाक्यों का बखान करते हुए आगे बताया की आत्मा अजर, अमर, शास्वत, सनातन, सच्चिदानंद स्वरूप परम ब्रह्म का परम अंस है अतः वह नित्य आनंदमयी, नित्य सत्य, एवं नित्य मुक्त है. कालजयी ग्रंथ एवं ब्रह्मविद्या उपनिषद श्रीमद भगवद गीता में स्पष्ट रूप से श्रीकृष्ण ने ही अर्जुन को शिक्षा देते हुए बताया की हे अर्जुन इस धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में उपस्थित होकर नपुंसकता मत दिखाओ क्योंकि आर्यों के लिए तो यह बिल्कुल ही शोभा नही देता क्योंकि जिस शरीर के मोह में तुम फंसे हुए हो वह तो पैदा लेते ही मर जाता है क्योंकि जिसका जन्म है उसकी मृत्यु सुनिश्चित है. अतः मृत की चिंता करना छोड़ दो. आत्मा को न तो हवा उड़ा सकती, न पानी भिंगो सकता, न अग्नि जला सकती है क्योंकि वह तो हमारा अर्थात परम तत्व का अंस है. 

    आत्मा की मुक्ति का तो प्रश्न ही नही, मुक्ति तो मन को मिलती है क्योंकि जिस समय यह मन इस भव बंधन से मुक्त होता है उसी समय मुक्ति मिल जाती है. दर्शनशास्त्रियों ने भी इसकी व्याख्या करते हुए बताया है की मन ही है जो व्यक्ति के बंधन और मुक्ति का कारण है अतः अपनी दशों इंद्रियों को साधो और जब इंद्रियां सध जाएं तो मन को साधो क्योंकि यह मन ही समस्त पाप का कारण है. काम, वासना, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और द्वैतभाव में बंधा हुआ यह मन जीव को इस सन्सार सागर में घुमाता रहता है. जीव को मुक्त नही होने देता अतः मन को पहले मुक्त करना चाहिए. माया से मुक्त मन ही ईश्वर प्राणिधान की दिशा में अग्रसर हो सकता है.

  आचार्य आदि शंकर के अद्वैतवाद में ईश्वर और जीव एक है

   दर्शन पर जाते हुए आचार्य श्री दिलीप पयासी जी महाराज ने आगे बताया की हमारे ऋषि मुनियों, दर्शनशास्त्रियों, और महात्माओं योगियों ने दार्शनिक स्तर पर हमारे वैदिक और उपनिषदिक सिद्धान्तों की बहुत ही बेहतरीन व्याख्या की है. हमारे छहों मुख्य दर्शन ग्रंन्थों में ईश्वर और आत्मा की ही प्रधानता रखी गई है और उसके आधार पर ही इस सृष्टि को समझने का प्रयाश किया गया है. 

    आचार्य जी ने बताया की आज सम्पूर्ण संसार में सबसे अधिक चर्चित दर्शन सिद्धांत आचार्य आदि शंकर जी का है. गुरुदेव शंकर का जन्म दक्षिण भारत में हुआ था और उनकी शिक्षा दीक्षा नर्मदा नदी के तट पर हुई थी. आगे बनारस जाकर काशी नगरी में  भगवान शिव की नगरी में विश्वनाथ जी की कृपा से उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ जहां साक्षात भगवान शिव ही एक कसाई के रूप में आकर आचार्य शंकर की परीक्षा लिए और उन्हें अंतिम और आत्म ज्ञान प्रदान किया.

    आचार्य शंकर ने अपने अद्वैत सिद्धांत में बताया की ईश्वर और जीव एक ही हैं अलग नही हैं. यह अलग होने का भेद मात्र इस अज्ञान और माया के कारण ही दिखाई देता है. जब अज्ञान का आवरण मन मस्तिष्क से दूर हो जाता है तो मन को मुक्ति मिल जाती है. उन्होंने विभिन्न प्रकार से उपमाएं देते हुए बताया की रात के अंधेरे में रस्सी को देखकर सर्प होने का एहसास होने से अचानक मन में डर उत्पन्न होता है लेकिन प्रकाश करने पर रस्सी का आभास होने से सर्प का भय दूर हो जाता है, अतः यह संसार भी आभासी ही है जब अज्ञान का आवरण हट जाता है तब हम संसार में एकरूपता देखते हैं. इसी प्रकार जल का उदाहरण देते हुए बताया की जल का स्वभाव तो सीतलता है मगर जब हम अग्नि से जल को गरम करते हैं तो उसमे उष्णता आती है, यह उष्णता मात्र आभासी है. वह उष्णता मिटने में बाद जल पुनः अपने शीतलता के स्वरूप में आ जाता है. इसी प्रकार घटाकाश और व्यापक आकाश का उदाहरण देते हुए आचार्य जी ने बताया की खाली घड़े के अंदर भी एक आकाश होता है जिंसमे आभासी तौर पर ऐसा आभास होता है यह आकाश घड़े में समाहित होता है लेकिन जब घड़ा फोड़ दिया जाता है तो घड़े के अंदर का आकाश व्यापक आकाश में बदल जाता है, अतः यह भेद भी आभासी है. इसी प्रकार यह आत्मा जब इस शरीर योनि में होती है तो ऐसा लगता है की जीव बंधा हुआ है उस शरीर मात्र से, लेकिन जैसे में आत्मा शरीर को छोड़ मुक्त होती है वह उस सर्वव्यापक परमेश्वर से मिल जाती है और शरीर का आभास या भेद पूर्णतया मिट जाता है.

    आचार्य शंकर के सिद्धांत और उनके अनुयायी अन्य मतों का खंडन करते हुए बताते हुए कहते हैं की  यदि जीवात्मा को परमात्मा से अलग मान लिया जाएगा तो सर्वव्यापक परमात्मा खंडित हो जाएगा क्योंकि आत्मा यदि ईश्वर अंस है तो वह अंस उस ईश्वर से अलग नही हो सकता है. क्योंकि जब किसी अंशभाग को आप मूल से अलग करेंगे तो मूल खंडित हो जाएगा. अतः आचार्य शंकर के मतों के अनुसार जीव और ईश्वर एक ही हैं वह अलग नही हैं. मात्र अज्ञान के कारण भ्रम उत्पन्न है इसलिए मॉनव मन उसे अलग समझता है.

   द्वैतवाद के अनुसार जीव और ईश्वर अलग अलग हैं

   वहीं दार्शनिक स्तर पर रामानुजाचार्य, बल्लभाचार्य आदि द्वैतवाद सिद्धांत कहते हैं की जीव और ईश्वर अलग अलग ही हैं. यहां पर अपने अपने दार्शनिक मत देते हुए द्वैतवाद के दार्शनिक बताते हैं की देखिए समुद्र का उदाहरण लीजिये. जिस प्रकार यह समुद्र होता है उसमे पृथिवी का सम्पूर्ण जल समाहित होता है और उसी जल से वर्षा से लेकर सम्पूर्ण पृथ्वी में उसका प्रयोग होता है अतः परमात्मा उस समुद्र के समान ही है जिंसमे से अंस रूपी आत्मा अलग होते हुए भी मूल समुद्र के जल को प्रभावित नही कर पाती है. क्योंकि समुद्र से कुछ बूंदें निकाल भी दी जाएं तो भी समुद्र के मूल स्वभाव और उसके जल में कोई परिवर्तन नही होता है.

   इस प्रकार आचार्य जी ने सभी दार्शनिक सिद्धान्तों का निचोड़ लेते हुए बताया की हमारे हिन्दू धर्म दर्शन में सभी सिद्धान्तों को आजादी है जिसे जो सिद्धांत पसंद हो उसका अनुकरण कर सकता है दूसरे अन्य वैश्विक सम्प्रदायों की तरह हिन्दू वैदिक धर्म दर्शन में कोई पावंदी नही है. अपने गुण स्वभाव रुचि के अनुसार किसी भी सिद्धांत का पालन करते हुए धर्म के मार्ग पर चलते हुए, सत्य, शौच, अहिंसा, सत्कर्म का पालन करते हुए व्यक्ति ईश्वर के किसी विशेष स्वरूप में अधिष्ठ होकर अपने जीवन को आस्तिकता पूर्वक धन्य बना सकता है. 

   आचार्य जी ने बताया की कृष्णकथा की यही महिमा है की देहभान भुला देती है. अपना देहभान भूलने पर ही मानव आध्यात्मिक स्तर पर पहुंच सकता है. कृष्णकथा महिमामयी है. इस कथा में लीन मन जगत को भूल जाता है. संसार का सम्पूर्ण विस्मरण एवं परमात्मा का सतत स्मरण ही तो मुक्ति है. मनुष्य का मन किसी न किसी रस में फंसा हुआ होता है अतः सभी रसों को भूलकर मात्र कृष्णभक्ति के रस में डूब जाने पर ही कृष्ण की प्राप्ति हो सकती है. 

संलग्न - कृपया संलग्न कार्यक्रम की फ़ोटो देखने का कष्ट करें.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा, मप्र, मोबाइल 9589152587, 7869992139

Tuesday, 21 August 2018

कैथा में भागवत कथा का तीसरा दिन - सत्य एक ही है ज्ञानी उसे अलग अलग नाम से बखान करते हैं

दिनाँक 21 अगस्त 2018, स्थान - गढ़/गंगेव, रीवा मप्र 

(कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी)

  यज्ञों की पावन स्थली कैथा के प्राचीन श्रीहनुमान मंदिर प्राँगण में आचार्य श्री दिलीप जी महाराज के मुखारविंद से दिनाँक 18 अगस्त से प्रारम्भ हुई श्रीमद भगवद कथा अविरल प्रवाहित हो रही है. दिनांक 21 अगस्त दिन मंगलवार को कथा प्रवचन का तीसरा दिन रहा. इस बीच भागवत महापुराण के द्वितीय एवं तृतीय स्कंध का परायण एवं प्रवचन चल रहा है. कैथा, मिसिरा, सोरहवा, बड़ोखर, करहिया, डाढ़, हिनौती, अकलसी, अमिलिया, पडुआ सहित आसपास के कई ग्रामों के भक्त श्रद्धालुगण कार्यक्रम में पहुंच रहे हैं और भागवत कथा का रसपान कर रहे हैं. 

   भागवताचार्य श्री दिलीप पयासी जी महाराज ने बताया की भागवत कथा एक ऐसा फल है जिंसमे मात्र रस ही है गुठली नही इसीलिए भागवत कथा का रसपान करने के लिए कहा गया है. 

आचार्य ने बताया मंगलाचरण का महत्व

   आचार्य जी ने मंगलाचरण का महत्व बताते हुए कहा की सत्कर्म मार्ग में अनेक बिघ्न उत्पन्न होते हैं उन सभी विघ्नों के निवारण के लिए मंगलाचरण की आवश्यकता होती है. मंगलाचरण का तात्पर्य होता है जिसका आचरण मंगलमय हो. अतः कथा में बैठने के पहले, कोई भी शुभ कर्म करने के पहले मंगलाचरण करना चाहिए जिससे बिघ्न उत्पन्न न हों. बताया गया की शास्त्र कहते हैं की देवगण भी सत्कर्म में बिघ्न उत्पन्न करने का प्रयाश करते हैं. इन्द्रादि देवों ने विश्वामित्र आदि ऋषियों और महात्माओं के द्वारा किये गए यज्ञ, तप आदि में बिघ्न उत्पन्न करने के प्रयाश किये. देवों ने सोचा की यदि मॉनव तप यज्ञ करके शक्ति प्राप्त कर लेंगे और नारायण के समान हो जाएंगे तो उन देवों के लिए खतरा उत्पन्न होगा इसलिए भी देवता गण विक्षेप उत्पन्न करते हैं. अतः देवों की भी प्रार्थना करनी होती है की हे देवो! हमारे सत्कर्मों में विक्षेप उत्पन्न न करें. सूर्य हमारा कल्याण करें, वरुण देव हम पर कृपा करें आदि. काम का चिंतन न करें क्योंकि काम का चिंतन करने से मन में काम वासना आती है जिससे क्रोध उत्पन्न होता है और फिर बुद्धि तर्कसंगत निर्णय, कल्याणकारी निर्णय लेने में सक्षम नही होती. श्रीकृष्ण जी पूर्णब्रह्म हैं जिनमे काम लेश मात्र भी नही अतः उनका चिंतन करने से, ईश्वर का चिंतन करने से काम वासना नष्ट होकर निष्काम भक्ति प्राप्त होती है. 

   आचार्य जी ने बताया की प्रभात, मध्यान्ह और रात में सोते समय मंगलाचरण करना चाहिए. व्यास जी ने बताया की ईश्वर के किसी एक स्वरूप का चिंतन मनन करना चाहिए जिससे मन उस स्वरूप में अवस्थित हो जाए जिससे ईश्वर के उस स्वरूप के प्राप्ति हमारी निष्ठा मजबूत हो. आचार्य जी ने बताया की ध्यान का अर्थ मानस दर्शन से है. राम कृष्ण अथवा शिव किसी भी एक स्वरूप का ध्यान करने से हमारे मन में उन्ही प्रभु के गुण आने लगते हैं और हमारा मन सत्कर्म में प्रवित्त होता है और समस्त मनोविकार नष्ट होकर मोक्ष की दिशा में अग्रसर होते हैं. मंगलाचरण करने से ब्रह्मांड की समस्त शक्तियां प्रसन्न होकर शुभ कार्य में सहयोग करती हैं. इसलिए सभी शुभ कर्मों के पहले और शांत मन से संध्या वंदन के पहले मंगलाचरण करना चाहिए.

एकं सद विप्रह बहुधा बदन्ति - एक ही सत्य को ज्ञानी लोग अलग अलग रूप में बखान करते हैं

  आचार्य जी ने वेद वाक्यों का वर्णन करते हुए बताया वेद का कथन है की एकं सद विप्रह

बहुधा बदन्ति अर्थात ईश्वर सत्य है और वह एक ही है. क्योंकि सत्य एक ही हो सकता है यदि वह सत्य नही है तो असत्य है परंतु सत्य दो नही हो सकते, अतः ईश्वर एक ही है. उसी सत्य को ज्ञानी लोग अलग अलग नाम से बखान करते हैं. जैसे आईना एक ही है जिसका गुणधर्म है उसके समक्ष जो भी वस्तु रखी जाती है वह उसी का प्रतिबिम्ब दिखाती है. ठीक इसी प्रकार ईश्वर एक ही है और जो भी व्यक्ति उसको जिस भाव से देखता है उसे उस सत्य रूपी ईश्वर में वही दिखता है. कोई उसे ईश्वर राम के रूप में मानता है कोई श्रीकृष्ण के रूप में तो कोई शिव तो कोई देवी स्वरूप में तो कोई अन्य स्वरूप में पर वह ईश्वर है एक ही. 

    आचार्य जी ने आगे बताया की दूसरे सम्प्रदायों के लोग हिन्दू वैदिक धर्म के बारे में भ्रांतियां पाल कर रखते हैं और कहते हैं हिन्दू धर्म में बहुत से देवी देवताओं की पूजा का विधान है परंतु ऐसा नही है. और इसी वेद वाक्य में सम्पूर्ण वैदिक धर्म का दर्शन समाहित है और हिन्दू धर्म की विशालता को स्पष्ट करता है. हिन्दू वैदिक धर्म इतना विशाल है की इसमे सभी कुछ समाहित है. वैदिक धर्म कोई सम्प्रदाय नही है बल्कि यह समग्र है. इसमे संपूर्णता है. 

संलग्न - कार्यक्रम की फ़ोटो संलग्न है. 

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र मोबाइल 9589152587, 7869992139

Sunday, 19 August 2018

कैथा में भागवत कथा का प्रथम दिन - बिना ईश्वर संसार अपूर्ण है

दिनांक 19 अगस्त 2018, स्थान गढ़/गंगेव, रीवा मप्र

(कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी)

  पावन यज्ञस्थली कैथा में श्रीमद भगवद महायज्ञ कलश यात्रा के साथ दिनांक 18 अगस्त को प्रारम्भ हुआ. दिनांक 19 अगस्त को बैठकी का कार्य पूरा हुआ और श्रीमद भगवद कथा का प्रथम स्कंध प्रारम्भ हुआ. विधिविधान से वेदीपुजन एवं नवग्रह पूजन आदि किया गया. वेदीपूजा नवग्रह पूजन आदि पूजन का कार्य आचार्य शिवशंकर शुक्ला के द्वारा कराया जा रहा है जिंसमे प्रतिदिन शुबह पूजन कार्य किया जाता है साथ ही सायंकाल में पूजा आरती आदि का कार्य भी उन्ही के द्वारा कराया जा रहा है.

आचार्य दिलीप जी के मुखारविंद से भागवत कथा प्रवचन

   आयोजित भागवत कथा में प्रवचन का कार्य आचार्य श्री दिलीप जी के मुखारविंद से हो रहा है. आचार्य जी ने बताया की श्रीमद भगवद कथा के नित्य श्रवण और पाठन से समस्त अधिभौतिक, आधिदैविक, एवं आध्यात्मिक ताप अर्थात कष्ट नष्ट होकर जीवात्मा मोक्ष की प्राप्ति करती है. भागवत कथा जीवन को धन्य बनाती है. उन्होंने बताया की परमात्मा श्रीकृष्ण परिपूर्ण सत, चित, एवं आनंद स्वरूप हैं. बिना ईश्वर के यह संसार अपूर्ण है, ईश्वर बिना यह जीव भी अपूर्ण है. श्रीकृष्ण परिपूर्ण ज्ञानी हैं. सबका विनाश हो रहा है फिर भी श्रीकृष्ण के आनंद का विनाश नही होता, कारण श्रीकृष्ण तो स्वयं ही आनंद स्वरूप हैं. सत नित्य है, चित ज्ञान है, चित-शक्ति अर्थात ज्ञान-शक्ति. मनुष्य अपने स्वरूप में स्थित नही है अतः इसे आनंद नही मिलता.  आचार्य जी ने आगे बताया की मनुष्य एकांत में अपने स्व-स्वरूप में स्थित नही रहता जबकि ईश्वर तो उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार सभी में एक सा बना रहता है. परमेश्वर की संहार लीला भी ठाकुरजी का स्वरूप है. अतः ईश्वर के स्वरूप में कोई परिवर्तन नही होता है. ईश्वर सभी में एक बना रहता है और सभी का आनंद लेता है जबकि जीव में यह संभव नही होता.जीव को यदि आनंदरूप होना है तो उसे सच्चिदानंद का ही आश्रय लेना पड़ेगा. यह जीव जबतक परिपूर्ण नही होता तब तक उसे शांति नही मिल सकती. अतः परमेश्वर की शरण लेने के बाद जीव को शांति मिल सकती है. 

  भागवत कथा का महात्म्य एवं प्रथम स्कंध का वर्णन

  इस बीच दिनांक 19 अगस्त को बैठकी के दिन भागवत महापुराण के द्वादस अर्थात 12 स्कन्धों में से प्रथम स्कंध का वर्णन चल रहा है जिंसमे भागवत का उद्देश्य एवं उसके महात्म्य के साथ अन्य कथा प्रसंगों का वर्णन चल रहा है. परमात्मा के तीन स्वरूप- सत, चित आनंद का वर्णन, परमात्मा का दर्शन एवं इसके प्रकार, कर्म, भक्ति एवं ज्ञान  मार्ग का वर्णन, धुंधकारी के प्रेतयोनि का वर्णन, गोकर्ण के आख्यान का वर्णन आदि कथा प्रसंगों का वर्णन किया जा रहा है. श्रीमद भगवद सप्ताह कथा की विधि का भी वर्णन किया गया.  

  इस बीच खराब मौसम एवं बारिश के वावजूद भी भक्त श्रद्धालुगण श्रीहनुमान मंदिर प्राँगण कैथा में पधार रहे हैं और अमृतमयी पापविनाशक भागवत कथा का आनंद ले रहे हैं.

संलग्न - संलग्न फ़ोटो में श्रीहनुमान मंदिर प्राँगण कैथा में कथा स्थल की फ़ोटो.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा, मप्र, मोबाइल 9589152587, 7869992139,