Wednesday, 28 March 2018

श्रीहनुमान प्रकटोत्सव पर विशेष – यज्ञस्थली कैथा मे विशेष आयोजन श्रीहनुमान और श्रीराम हैं अभिन्न, एकोब्रहमद्वितियोनास्ति

दिनांक 29 मार्च 2018, स्थान – पावन यज्ञस्थली कैथा से, गढ़ गंगेव रीवा मप्र

(कैथा, शिवननाद द्विवेदी, रीवा मप्र)

श्रीहनुमान प्रकटोत्सव पर विशेष – यज्ञस्थली कैथा मे विशेष आयोजन श्रीहनुमान और श्रीराम हैं अभिन्न,एकोब्रहमद्वितियोनास्ति

      श्रीहनुमान प्रकटोत्सव के अवसर पर पावन यज्ञस्थली कैथा स्थित अति प्राचीन श्रीहनुमान मंदिर प्रांगण मे दिनांक 30 से 31 मार्च तक ॐ नमः शिवाय के अखंड जाप एवं संकीर्तन का कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम 24 घंटे अनवरत चलेगा। इस बीच क्षेत्र मे भक्तों एवं श्रद्धालुओं से मंदिर प्रांगण मे पहुचने और कार्यक्रम मे सहभागिता की अपील की गई है।

श्रीहनुमान प्रकटोत्सव पर विशेष – हनुमान बिना रामराज्य की कल्पना है अधूरी,

हनुमान न होते तो श्रीराम के बिगड़े काम न होते

      तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस एवं बाल्मीकीकृत रामायण कालजयी इतिहास ग्रंथ हैं जिनमे भगवान श्रीराम के आदर्श चरित्र का सुंदर वर्णन मिलता है। अभी कुछ ही दिन पूर्व चैत्र नवरात्रि की रामनवमी को राम प्रकटोत्सव मनाया गया जिसमे भगवान श्रीराम के पावन चरित्र की चर्चना हुई, जगह जगह उत्सव मनाया गया और साथ ही श्रीराम कथा आदि कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इस बीच भगवान श्रीराम के सुंदर पावन चरित्र के अनुकरण कर भटकते हुये भारतीय एवं वैश्विक समाज को नई दिशा देने की बातें आयीं। सम्पूर्ण रामायण और श्रीराम चरित मानस ग्रंथ ही प्रभु श्रीराम और श्री हनुमान के महान कृत्यों से भरा पड़ा है। पर जब भी हम रामायण का पाठ करते हैं और तुलसीकृत श्रीरामचरित मानस की चौपाइयाँ और दोहे गाते हैं तो देखते हैं की श्रीराम के सभी महत्वपूर्ण कार्यों मे श्रीहनुमान का कितना सुंदर योगदान है। चाहे वह माता सीता की खोजकर रावण के अहंकार की प्रतीक लंका को धू धू करके जलाना रहा हो,चाहे रावण के राक्षसी समाज के मनोबल को चूर चूर करना रहा हो, चाहे लक्ष्मण के शक्ति बाण लगने पर हिमालय के दुर्गम क्षेत्र से संजीवनी बूटी सहित पहाड़ उखाड़कर लाना रहा हो, चाहे अहिरावण को मारकर पाताल लोक से राम-लक्षमन को कंधे मे बैठाकर लाना रहा हो। यह सभी दुर्गम कार्य थे जो किसी के बस के नहीं थे ऐसे मे श्रीहनुमान ही याद आए और उन्होने अपने प्रभु श्रीराम के प्रति सम्पूर्ण भक्ति और निष्ठा सेवाभाव से दुर्गम से दुर्गम कार्यों को हँसते हुये और जय श्रीराम कहकर पूरा किया। इसीलिए जब रावण ने छल पूर्वक सीतामाता को अपहरण कर लंका स्थित अशोक वाटिका के नीचे छोड़ दिया और श्रीहनुमान सैकड़ों योजन समुद्र लांघ कर जब लंका सीतामाता की खोज करने पहुचे और असंभव कार्य किए तो सीता जी प्रसन्न होकर श्रीहनुमान को अजर अमर होने और अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों का वरदान दिया। श्रीहनुमान को कलयुग का देवता बताया।

श्रीहनुमान की जयंती नहीं बल्कि प्रकटोत्सव मनाया जाता है

      श्रीहनुमान की जयंती नहीं मनाई जाती क्योंकि जयंती उसकी मनाई जाती है जिसका जन्म हुआ और फिर मृत्यु हुई हो। परंतु श्रीहनुमान अजर अमर हैं कलयुग के देवता हैं। श्रीहनुमान का गर्भज जन्म नहीं हुआ है बल्कि श्रीहनुमान प्रकट हुये हैं,अवतार लिए हैं। अतः श्रीहनुमान की जयंती नहीं बल्कि प्रकटोत्सव मनाया जाना चाहिए। श्रीहनुमान अमर हैं भगवान शिव के 11 वें रुद्रावतार माने गए हैं। भगवान शिव के अंश हैं। जब रावण जैसे घोर असुर राक्षस के अधर्म अत्याचार अनाचार का साम्राज्य तीनों लोकों मे अत्यधिक बढ़ गया और इसकी अति हुई तो ब्रह्मा विष्णु महेश ने धरती माता के बोझ को उतारने के लिए और धर्म की  स्थापना के लिए अपना श्रीराम अवतार जो की मर्यादा पुरुषोत्तम है का अवतार ग्रहण किया। इस प्रकार इस प्रभु लीला मे सभी देवी देवताओं ने अपने अपने अंश को इस पृथ्वी पर अवतार लेकर भेजा। यहाँ तक की जिनहे बानर भालू समझा गया वह सब सामान्य बानर भालू न होकर सभी देवताओं के अवतार ही हैं। इस प्रकार श्रीहनुमान भगवान शिव के अवतार हैं जो प्रभु राम की लीलाओं मे सम्मिलित हुये। ऐसा नहीं है की श्रीहनुमान अथवा श्रीराम मे कोई भिन्नता है। दोनों अद्वैत हैं। एक है दूसरा नहीं – यही है अद्वैत वाद का सिद्धान्त। ईश्वर मात्र एक ही है। क्योंकि दो होते तो आधिपत्य की लड़ाई प्रारम्भ हो जाती और शृष्टि का संतुलन बिगड़ता। जिस प्रकार ईश्वर के तीनों स्वरूपों ब्रह्मा विष्णु महेश मे कोई अंतर नहीं है और तीनों एक ही हैं। परम ब्रह्म के तीन स्वरूप ब्रह्मा विष्णु महेश अर्थात शिव हैं। परम शक्ति को जब इस शृष्टि के निर्माण के माया के खेल को खेलना होता है तब वह सर्वज्ञ, सर्व अंतर्यामी, कालातीत, अवस्थातीत, कण कण मे व्याप्त, भूत भविष्य वर्तमान का ज्ञाता परम ब्रह्म परमेश्वर अपने तीनों स्वरूपों ब्रह्मा विष्णु महेश के रूप मे आता है। ब्रह्मा रचनात्मकता, विष्णु पालन करने, और महेश अर्थात महादेव शिव अत्याचार अनाचार बढ्ने पर संहार के प्रतीक हैं। इसी प्रकार दर्शन ग्रन्थों मे प्रकृति के तीनों गुणों सत्व रज और तम को भी ब्रह्मा विष्णु एवं महेश से जोड़ा गया है। सत्व प्रारम्भिक अवस्था है जब संतुलन स्थापित रहता है जब सब कुछ अच्छा ही अच्छा रहता है जब इस शृष्टि के निर्माण की बात होती है। रजोगुण शृष्टि निर्मित होकर चलाने मे प्रधान होता है क्योंकि शृष्टि के संचालन मे क्रियत्मकता अथवा एक्टिविटी की प्रधानता होती है। जब शृष्टि मे एक बार अत्याचार, अनाचार,अधर्म का प्रभाव अत्यधिक सीमा से अधिक बढ़ जाता है तब इस शृष्टि को संहार करने के लिए और इसे पुनः प्रारम्भिक अवस्था जो नासदीय सूक्ति मे वर्णित है मे बदलने के लिए तमोगुण की ही आवश्यकता होती है। क्योंकि सत्व और रजोगुण पूरी तरह से संहार नहीं कर सकता इसके लिए तम की आवश्यकता होती है। क्योंकि इसमे फिर बुद्धि को एकाग्र कर असंभव कार्य को करना होता है। मात्र कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं। जैसे केदारनाथ मे कठोर निर्णय लिया। यह नहीं देखा की कौन जीवित रहेगा और कौन मरेगा। सब को समूहिक रूप से मोक्ष प्रदान कर दिया। ऐसी क्या बात रही होगी की केदारनाथ स्वामी ने इतना तामसिक और संहारक स्वरूप दिखाया?कुछ न कुछ तो बात रही होगी। अब उसकी माया को वही जान सकता है। इस प्रकार यहाँ से भलीभाँति समझा जा सकता है ईश्वर के सभी स्वरूप समान और बराबर होते हैं उनके आवश्यकता और समयानुसार मात्र कार्य अलग अलग बंटे हुये रहते हैं। जैसे किसी व्यक्ति का उसके घर मे अलग नाम और बाहर के लोग अलग तरह से जानते है। जैसे एक व्यक्ति को उसके माँ बाप उसे बेटे के रूप मे जानते हैं पत्नी पति रूप मे, भाई भाई के रूप मे, दोस्त दोस्त के रूप मे, कर्मचारी अपने बॉस के रूप मे, और हर कोई अपने अपने नजरिए से देखते हैं वैसे ही भगवान एक ही है उसके अनंत नाम और अनंत रूप हैं। जो उसे जिस भाव से पूजता मानता है वह उसे उसी भाव मे मिल जाता है। श्रीकृष्ण ने श्रीमद भगवद गीता मे अर्जुन को यहाँ तक बता दिया की हेय अर्जुन इस शृष्टि मे सब कुछ मई ही हूँ। सबकी आत्मा मे सभी जीवों मे सम्पूर्ण ब्रह्मांड मे मै ही मै हूँ और मुझसे अलग कुछ नहीं है। यहाँ तक यह सम्पूर्ण शृष्टि मेरे अंश मात्र मे ही टिकी है।  

   अब यदि श्रीहनुमान के पावन चरित्र पर आते हैं तो पाते हैं श्रीहनुमान जी के बिना राम का काज अधूरा है। क्या कवि के पास श्रीहनुमान का कोई विकल्प है? नहीं, बिलकुल नहीं। यदि हनुमान का विकल्प होता तो जरूर उस विकल्प की बात होती परंतु राम के सभी महत्वपूर्ण और असंभव कार्यों मे हनुमान ही हैं, उनके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं। अतः यह स्पष्ट है की यदि श्रीहनुमान नहीं होते तो राम के काज पूरे नहीं होते। हनुमान और राम एक दूसरे से अलग नहीं हैं इसीलिए जब एक बार बात आई तो श्रीहनुमान ने अपना सीना चीरा तो उसमे सीताराम ही दिखे। भले ही दैहिक दृष्टि से श्रीहनुमान अलग और श्रीराम अलग दिखें लेकिन सूक्ष्म रूप मे आत्मिक रूप मे दोनों एक ही हैं। राम मे हनुमान समाहित हैं और हनुमान मे तो राम समाहित ही हैं। अतः हनुमान और राम एक दूसरे के पूरक हैं। अद्वैत हैं। अलग नहीं हैं।

      आज के इस कलयुग के समय मे सबसे बड़ी आवश्यकता है भगवान श्रीराम और श्रीहनुमान के पावन चरित्र के अनुकरण की और उस दृष्टि से देखा जाय तो भारतीय और वैश्विक समाज पीछे जा रहा है।

जय श्रीराम

संलग्न – कैथा श्रीहनुमान मंदिर प्रांगण मे आयोजित कार्यक्रमों की तस्वीरे।

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  शिवानंद द्विवेदी, संयोजक एवं प्रचारक, श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति भारत रीवा मप्र।

मोबाइल – 7869992139, 9589152587,

कैथा मे श्रीहनुमान मंदिर एवं देवी मंदिर मे निकाला गया परंपरागत जवारे का जुलूश, सिरे आई देवी ने दूर किया भक्तों के दुख कष्टों को, बांटा भभूत और बीरा

दिनांक 28 मार्च 2018, स्थान - गढ़/गंगेव, रीवा मप्र 

(कैथा, शिवानंद द्विवेदी)

     यज्ञों की पावन स्थली कैथा मे परंपरागत रूप से प्रति वर्ष चैत्र नवरात्रि के समय निकाला जाने वाला जवारे का जुलूश निकाला गया जिसमे मुख्य रूप से कैथा मे रह रहे हरिजन आदिवाशी समूहों ने अपना नौ दिन का व्रत तोड़ते हुये जवारे का विसर्जन देवी मंदिर कैथा मे किया। समान्यतया हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक चैत्र नवरात्रि मे प्रारम्भ से ही जवारे की बोवनी की जाती है जो नवें दिन तक बड़े हो जाते हैं जिनको किसी पास ही स्थित धर्मस्थल और मूलरूप से किसी देवी मंदिर मे ले जाकर विसर्जित किया जाता है। इस जुलूश मे छोटे बड़े महिलाएं पुरुष सभी सम्मिलित होते हैं और जुलूश का पूरा आनंद लेते हैं। 


   परंपरानुसार जुलूश मे देवी साधक के सिरे मे देवी सवार होने की प्रथा होती है। जिससे वह व्यक्ति विभिन्न मुद्राओं मे नृत्य करता हुआ दूसरे भक्त श्रद्धालुओं को राख़ की भभूत भी देता है जिसमे यह मान्यता है की जो भी व्यक्ति उस भभूत को लेता है उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। ग्रामों की मान्यताओं के अनुसार जिसके सिरे मे देवी सवार होती हैं उस देवी भक्त से अन्य पीड़ित लोग बीरा भी ग्रहण करते हैं जिसका तात्पर्य होता है की कुछ विशेष अभिमंत्रित शक्तियों के रूप मे राख़ भरकर किसी छोटी डिबिया मे दिया जाता है जो पीड़ित व्यक्ति पूरे सालभर धारण करता है। एक साल पूरा होने के बाद ऐसी मान्यता होती है पीड़ित व्यक्ति पुनः जाकर बीरा लेता है जिससे उसे आगे भी कोई आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक समस्याएँ न हों। 

विश्वास से बड़ा कुछ नहीं - गरीबों द्वारा इन लुटेरों डाक्टरों के पीछे लाखों खर्च करने से तो बेहतर ही है मात्र चुटकी भर विश्वास की भभूत  

       सही मायने मे यदि देखा जाए तो अँग्रेजी मे एक शब्द है फेथ हीलिंग का, जिसका तात्पर्य होता है किसी भी दृश्य अथवा अदृश्य शक्ति मे पूर्ण विश्वास का होना। जैसे लगभग सभी धर्मों संप्रदायों के लोग किसी न किसी शक्ति पर विश्वास रखते हैं चाहे वह अल्लाह पर हो अथवा जीसस क्राइस्ट पर ठीक इसी प्रकार हिन्दू मतावलंबियों मे भी भक्त लोग ईश्वर के किसी स्वरूप देवी देवताओं और ईश्वर पर विश्वास रखते हैं। और आज यह बात वैज्ञानिक तौर से भी सिद्ध हो चुकी है की विश्वास से बढ़कर कुछ नहीं है। वह चाहे ईश्वर पर हो अथवा अपने ऊपर, जो भी महत्वपूर्ण कार्य होते हैं वह विश्वास से ही संभव हैं। बिना विश्वास के कुछ संभव नहीं है। यहाँ तक की श्रीमद भगवद गीता मे भगवान श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को ज्ञान देते हुये बताया की हे अर्जुन मै जो भी कहता हूँ उस पर तू पूर्ण विश्वास और श्रद्धा रख चूंकि जो संसयात्मा है वह नष्ट हो जाता है अर्थात शंसय करने वाला व्यक्ति कभी भी अपने लक्ष्य को प्राप्त नही कर सकता अतः तू जो भी कर उसमे संशय मत कर। 


    तो यदि ग्राम क्षेत्र के गरीब मजदूर और कम पढे लिखे लोग ईश्वर के देवी रूप मे विश्वास करते हैं और बीरा भभूत लेकर साल भर अथवा जीवन भर प्रसन्न रह सकते हैं तो निश्चित रूप से माफिया बन चुके और लुटेरे उन डाक्टरों से तो बेहतर ही है जिनके पीछे लाखों करोड़ों खर्च कर देने के बाद भी किसी दैहिक अथवा मानसिक बीमारी का पुख्ता इलाज हो पाये यह बिलकुल ही स्पष्ट नहीं है। भभूत बीरा तो यमदूत बन चुके ऐसे डाक्टरों से ज्यादा ही बेहतर और शुखद है। 

जवारा विसर्जन प्राचीन ग्रामीण परंपरा -

    ग्राम क्षेत्रों मे जावरा बोवनी और फिर पूरे जुलूश के साथ उसका विसर्जन एक प्राचीन ग्रामीण परंपरा है जिसे कई लोग तो श्र्द्धा के रूप मे लेते हैं और कई लोग इसे लेकर आनंदित भी होते हैं क्योंकि जिस व्यक्ति के सिरे मे देवी सवार होती हैं वह विभिन्न प्रकार से मनोरंजन करते हुये जुलूश देखने के लिए इकठ्ठा हुये अन्य भक्तों का मनोरंजन भी करते हैं। देवी विभिन्न मुद्राओं मे खप्पर तलवार लेकर नृत्य करती हैं। जिस व्यक्ति के सिरे मे देवी आती हैं वह काली माता का मुकुट अथवा मुखौटा भी लगाता है जिससे हांथ मे खप्पर और तलवार लेकर नृत्य करते समय ऐसा प्रतीत होता है मानों साक्षात कालिका धरती पर अवतरित हुई हैं और तांडव नृत्य करने वाली हैं।  

 संलग्न - कैथा श्रीहनुमान मंदिर मे आए हुये जवारे का दृश्य जिसमे कैथा ग्राम के हरिजन भाइयों बहनों ने देवीमंदिर कैथा मे जाकर जवारे का विसर्जन किया। 

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शिवानंद द्विवेदी, सामाजिक मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र। 


मोब - 0786999213909589152587 (whatsapp)


Sunday, 25 March 2018

श्रीराम नवमी पर कैथा श्रीहनुमान मंदिर मे आयोजित हुआ कन्याभोज, भगत एवं भंडारे का कार्यक्रम

दिनांक 25 मार्च रामनवमी 2018, स्थान – पावन यज्ञस्थली कैथा स्थित श्रीहनुमान मंदिर प्रांगण से, रीवा मप्र

(कैथा, शिवानंद द्विवेदी, रीवा मप्र)

  श्रीराम नवमी के पावन उपलक्ष्य पर 25 मार्च को पावन यज्ञस्थली कैथा स्थित अति प्राचीन श्रीहनुमान मंदिर प्रांगण मे कन्याभोज, संगीतमय भगत, एवं सूक्ष्म भंडारे का आयोजन किया गया। इस बीच कैथा और आसपास के ग्राम क्षेत्र के श्रद्धालुगण उपस्थित होकर भगत और भंडारे मे सम्मिलित हुये।

   बता दें की पावन भूमि कैथा कई मायनों मे महत्वपूर्ण है जहां पर विभिन्न प्रकार के आयोजन होते रहते हैं। अभी पिछले दिनों 18 मार्च से 24 मार्च तक चैत्र नवरात्रि के शुभवसर पर कैथा स्थित प्राचीन श्रीमद शारदा देवी मंदिर प्रांगण मे परंपरागत रूप से आयोजित होने वाली श्रीमद भगवद कथा का आयोजन हुआ जिसका समापन हवन एवं भंडारे के साथ दिनांक 24 मार्च को सम्पन्न हुआ।

श्रीराम नवमी पर विशेष – श्रीराम जी का आदर्श एवं पावन चरित्र है अनुकरणीय


      बाल्मीकीकृत रामायण ग्रंथ मे सर्वप्रथम भगवान श्रीराम जी के पावन चरित्र का वर्णन आता है। इसके पश्चात लगभग विश्व की समस्त भाषाओं मे रामायण का अनुवाद किया जा चुका है। तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस अवधी भाषा मे लिखा एक अत्यंत सुंदर ग्रंथ है जिसकी गणना इतिहास ग्रन्थों मे की जाती है। चूंकि संस्कृत की भाषा सभी के लिए उतनी सरल नहीं थी अतः इस बात को ध्यान मे रखते हुये कई लेखक और कवियों ने रामायण को लगभग सभी भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं मे अनुवाद किया है। तमिल,तेलगु, मराठी, कन्नड सहित सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रीय भाषाओं मे भी रामायण का अनुवाद कुछ विशेष जोड़ते हुये उपलब्ध है। यह बात भी सत्य है की रामायण के विभिन्न भाषाओं मे अनुवाद करते समय कवियों लेखकों ने मूल अर्थ मे भी परिवर्तन करने का भी प्रयास किया है परंतु यह उस क्षेत्र विशेष की रुचि आदि पर आधारित कहा जा सकता है। यद्यपि कई अनुवादों मे तो कुछ ज्यादा ही परिवर्तन कर दिया गया है जिसे काफी आलोचना का सामना भी करना पड़ा है।

  वहरहाल जो मूल रामायण ग्रंथ है उसमे भगवान श्रीराम को एक अत्यंत आदर्श और पावन चरित्र के रूप मे बताया गया है। भगवान श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं जिहोने कभी भी किसी भी विषम से विषम स्थिति मे मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं किया है। अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्यों का सुंदर निर्वहन किया, पिता की आज्ञा का पालन करते हुये सहर्ष 14 वर्ष का वनवास ग्रहण कर लिया जबकि यदि आज का कलयुगी पुत्र होता माता पिता को ही घर से खदेड़ देता, सौतेली माता कैकेई को अपनी सगी माता कौशल्या से अधिक मान्यता दिया, भाई लक्ष्मण सहित भरत एवं सत्रुघ्न के प्रति अपने बड़े भाई होने की पूरी ज़िम्मेदारी का निर्वहन किया। जिस प्रकार सीताजी श्रीराम के प्रति आदर्श पतिव्रत भाव को सदैव हृदय मे बसाये रखीं उसी प्रकार श्रीराम जी ने भी सीताजी के प्रति एक आदर्श पत्नी भाव को सदैव हृदय मे रखा। गुरु विश्वामित्र की आज्ञा का पालन करते हुये राक्षसों का संहार कर ऋषि मुनियों के निर्वाध यज्ञ और तपस्या का रास्ता साफ किया। यहाँ तक की उनकी पत्नी के चरित्र पर धोबियों द्वारा प्रश्न उठाने पर उन्होने अपनी आदर्श पत्नी को भी त्याग कर दिया। यद्यपि इस बात को लेकर आज का कलयुगी भ्रष्ट और नास्तिक मानव श्रीराम जी की भी आलोचना करते नहीं थकता। श्रीराम एक आदर्श पति, एक आदर्श भाई, एक आदर्श शिष्य, एक आदर्श पुत्र,और यहाँ तक की एक आदर्श शत्रु भी थे। आदर्श शत्रु इसलिए भी क्योंकि उन्होने शत्रुत्व की भी मर्यादा का भी उल्लंघन कभी नहीं किया। रावण जैसे घोर राक्षसों पर भी पीछे से छल पूर्वक कभी हमला नहीं किया। सम्पूर्ण रामायण ग्रंथ और श्रीरामचरितमानस इस बात का गवाह है की श्रीराम ने असुर रावण को भी सुधरने का खूब मौका दिया, श्रीहनुमान, अंगद को दूत रूप मे रावण के पास भेजा की शायद वह सुधर जाये और सीताजी को श्रीराम जी के पास वापस कर दे लेकिन श्रीराम की बात को न मानकर श्रीराम को छोटा समझ कर उसने अपने अहंकार की पराकाष्ठा कर दी जिसके कारण अंततः रावण को मृत्यु के घाट उतरना पड़ा। जहां श्रीराम का चरित्र पावन और पुनीत है वहीं रावण का चरित्र एक भयावह रक्षस का है जिसने अपने अहंकार अत्याचार के वसीभूत होकर धर्म की अवहेलना की और अधर्म का साम्राज्य स्थापित करने का प्रयाश किया। परंतु अंत मे जीत धर्म और सत्य के परिचायक भगवान श्रीराम की ही हुई वहीं अधर्म अत्याचार असत्य के परिचायक रावण को नष्ट होना पड़ा। रामायण आज भी मानवता प्रेमियों के लिए एक आदर्श ग्रंथ है जिसमे मानव को किस प्रकार का जीवन यापन करते हुये जीवन निर्वाह करते हुये मोक्ष की प्राप्ति की जाये इसका पूरा मार्गदर्शन मिलता है। भारतीयों और आर्यावर्त के लिए राम परम पूज्य आराध्य भगवान साक्षात ईश्वर के अवतार हैं जिनको आज भी प्रत्येक भारतीय अपने हृदय मे रखता है। हर माँ बाप चाहता है की उसे राम जैसा पुत्र मिले। हर स्त्री चाहती है की उसे राम जैसा आदर्श पति मिले, हर भाई चाहता है की उसे राम जैसा बड़ा भाई मिले, हर गुरु चाहता है की उसे श्रीराम जैसा शिष्य मिले। यहाँ तक की हर शत्रु भी चाहेगा की उसे श्रीराम जैसा उसका विपक्षी मिले जिनके हांथ से मृत्यु भी प्राप्त करने पर वह शत्रु भी मोक्ष को ही प्राप्त करे।

श्रीराम सम्पूर्ण मानवता के लिए आदर्श हैं

   श्रीराम भारतीय समाज ही नहीं वरन सम्पूर्ण मानवता के लिए आदर्श हैं। यदि मानवता को बने रहना है तो श्रीराम के ही चरित्र और आदर्शों को अपनाना पड़ेगा नहीं तो जिस प्रकार वर्तमान समय चल रहा है ऐसे मे इस वैश्विक संस्कृति का विनष्ट होना लगभग तय है। क्योंकि आज मानव जाति मे कोई मर्यादा शेष नहीं रह गई है। सब कुछ इतना अधिक स्वछंद होता जा रहा है की सामाजिक और परवारिक मूल्य पूरी तरह से समाप्त होते जा रहे हैं। आज माता पिता की आज्ञा मानने की बात तो दूर की रह गई है आज मानव अपने माता पिता को वृद्धावस्था से पहले ही घर से बाहर का रास्ता दिखा देता है, आज ज़्यादातर शहरी शादियाँ ज्यादा समय टिक नहीं पा रही हैं। मेट्रो कल्चर मे आज तलाक लेना आम बात हो चुकी है। पश्चिमी सभ्यता का आज इतना आधिक्य हो चुका है कि भारतीय समाज खंड-विखंड होता जा रहा है। एक स्त्री द्वारा तलाक लेकर कई पतियों को बदलना और एक पुरुष का भी तलाक लेकर कई पत्नियों को बदलना भारतीय संस्कृति की पहचान नहीं है परंतु आज ऐसी स्थिति निर्मित हो रही है की यह सब फ़ैशन बनता जा रहा है। ऐसे मे आज श्रीराम जी का आदर्श और पावन चरित्र का अनुकरण ही विनष्ट होते सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों को नई जान दे सकते हैं और मिटती संस्कृति को बचा सकते हैं।

संलग्न – पावन यज्ञस्थली कैथा स्थित अति प्राचीन श्रीहनुमान मंदिर प्रांगण मे श्रीराम नवमी पर आयोजित भगत, कन्याभोज, एवं सूक्ष्म भंडारे का दृश्य

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    शिवानंद द्विवेदी, संयोजन एवं प्रचारक श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति भारत।7869992139    ज़िला रीवा मप्र।

Sunday, 18 March 2018

पावन यज्ञस्थली कैथा के अति प्राचीन श्री शारदा देवी मंदिर प्रांगण में चैत्र नवरात्रि में आयोजित हुई श्रीमद भागवत कथा

दिनांक 18 मार्च 2018, स्थान - पावन यज्ञस्थली कैथा से, रीवा मप्र।

(शिवानंद द्विवेदी, रीवा मप्र)

    हिन्दू पंचांग विक्रम संवत के नववर्ष आरंभ पर चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर पावन भूमि कैथा स्थित अति प्राचीन श्री शारदा देवी मंदिर प्राँगण में परम्परानुरूप आयोजित होने वाली श्रीमद भगवद कथा का आयोजन दिनांक 18 मार्च से किया जा रहा जो अगले 7 दिन तक चलेगा। कार्यक्रम का समापन हवन एवं विशाल भंडारे के साथ किया जाएगा।

      कार्यक्रम आयोजन समिति में कैथा से बृज बल्लभ पटेल, शिव शंकर शुक्ला, राम यतन शुक्ला, छोटेलाल शुक्ला, भूपेंद्र शुक्ला, अनिरुद्ध केवट, उपेंद्र शुक्ला, संतोष शुक्ला, संपूर्णानंद द्विवेदी, सिद्धमुनि द्विवेदी, भैयालाल द्विवेदी, बंस पती साकेत, बुद्धसेन पटेल एवं श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति भारत सहित कई भक्त श्रद्धालु गण हैं।

     कैथा की पावन भूमि पर आयोजित श्रीमद भगवद कथा का श्रवण पान करने कद लिए आप सभी को सादर आमंत्रित किया गया है।

  -शिवानंद द्विवेदी संयोजक एवं प्रचारक श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति भारत। 7869992139


Thursday, 1 March 2018

पूर्णिमा एवं होली के सुभावसर पर श्रीहनुमान मन्दिर कैथा की पावन भूमि पर चल रहा अखण्ड सीताराम नाम संकीर्तन का कार्यक्रम, चलेगा 2 मार्च तक, प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम का होगा समापन

दिनांक 1 मार्च 2018, स्थान - पावन यज्ञस्थली कैथा से, रीवा मप्र।

 (शिवानंद द्विवेदी, रीवा मप्र) 

          पावन यज्ञस्थली कैथा स्थित अति प्राचीन श्रीहनुमान मंदिर प्रांगण में प्रत्येक पूर्णिमा को आयोजित होने वाला अखण्ड कार्यक्रम की श्रृंखला में दिनांक 1 से 2 मार्च तक श्री सीताराम नाम संकीर्तन का आयोजन किया जा रहा है। श्री हनुमान मन्दिर प्राँगण कैथा में सभी आयोजन श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति भारत के तत्वावधान में होते हैं जो सार्वजनिक कार्यक्रम हैं एवं जीव कल्याणार्थ तथा विश्व शांति कद लिए आयोजित होते हैं।

     श्री सीताराम नाम संकीर्तन में विशेष सहयोगियों में संपूर्णानंद द्विवेदी, अनिरुद्ध केवट, दसरथ केवट, राजकुमार केवट, वैद्यनाथ केवट, रामबहोर केवट, हरिबंश पटेल, राम नरेश पटेल, अम्बिका पटेल, कुंजमणि तिवारी, कमलेश पांडेय, दिनेश लोनिया, संजय लोनिया सहित अन्य कई भक्त श्रद्धालुगण उपस्थित रहे जिन्होंने हारमोनियम, ढोलक, झांझ मजीरे में सहयोग प्रदान किया।

     कीर्तन का कार्यक्रम दिनांक 1 मार्च को शुबह 10 बजकर 15 मिनट पर प्रारम्भ हुआ जो अगले दिन 2 मार्च तक अनवरत चलता रहेगा। अखण्ड कीर्तन का विसर्जन 2 मार्च को 10 बजकर 15 मिनट के बाद ही किया जाएगा।

      पावन यज्ञस्थली कैथा के अति प्राचीन श्रीहनुमान मन्दिर प्राँगण में कीर्तन का आनंद लेने के लिए सभी को सादर आमंत्रित किया जाता है।

   संलग्न - कार्यक्रम स्थल की कुछ फोटोग्राफ।

  - शिवानंद द्विवेदी संयोजक एवं प्रचारक श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति भारत 7869992139