दिनाँक 9 फरवरी 2018, स्थान - पावन यज्ञस्थली कैथा से, गढ़/गंगेव रीवा मप्र।
(शिवानंद द्विवेदी, रीवा मप्र)
पावन यज्ञस्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में दिनांक 31 जनवरी से प्रारम्भ हुआ महाशिवरात्रि महोत्सव दिनांक 9 फरवरी को भी निरंतर चल रहा है। इस बीच आचार्य श्री चंद्रमणि पयासी जी महाराज ने शिव लीला के विभिन्न कथा प्रसंगों पर प्रकाश डाला।
श्रीशिवमहापुरण अंतर्गत विध्येश्वर और रुद्र संहिता के कथा प्रसंगों के बाद शतरुद्र संहिता पर प्रवचन चल रहा है जिसमे शौनक मुनि द्वारा सूतजी से सद्योजात वामदेव आदि के अवतारों की कथा सुनने की जिज्ञासा होना, अर्धनारीश्वर की उत्पत्ति और भवानी का दक्ष के घर मे जन्म, पहले द्वापर युग मे श्वेत मुनि के रूप में शिव का अवतार और उनके शिष्यों के वर्णन, दसवें द्वापर से अट्ठाइस द्वापर तक शिवजी के विभिन्न अवतारों का वर्णन, शिलादिमुनि द्वारा शिव की घोर तपश्या और नंदी का उनके पुत्र रूप में जन्म और शिव द्वारा नंदी कद विवाह उपरांत गणपत्य पद प्रदान करना, दधीचि के तप से प्रसन्न होकर शिव द्वारा वारदान और पिप्पलाद मुनि के रूप में शिव का अवतार, महानंदा वेश्या के तप से प्रसन्न होकर शिव का वैश्यनाथ के रूप में अवतार, कालभैरव द्वारा ब्रह्मा का अभिमान नष्ट करना, वीरभद्र द्वारा नृसिंह का अभिमान नष्ट करना आदि पौराणिक कथा प्रसंगों का वर्णन चल रहा है।
लोककल्याण के निमित्त विषपान करने के कारण शिव कहलाये नीलकंठ भगवान -
शिव त्याग और कल्याण का दूसरा नाम है।
पौराणिक कथा प्रसंगों के अनुसार समुद्र मंथन में 14 रत्न प्राप्त हुए, तेरह रत्नों को तो देव और असुरों ने आपस मद बांट लिया लेकिन मंथन से प्राप्त हलाहल विष के कारण सम्पूर्ण सृष्टि विनाश के कगार पर खड़ी थी तब ब्रह्मा विष्णु को इस सृस्टि को चलाने का संकट उत्पन्न हो जाता है ऐसे में अब प्रश्न था कि इस हलाहल को कौन धारण कर सकता था। ऐसे में सभी देवता असुर गण भागकर शिव के समक्ष उपस्थित हुए और शिव ने जब देखा कि अभी तो सृस्टि का प्रारंभिक चरण है और यदि प्रारम्भ में ही इसका नास हो गया तो पुनः संकट उत्पन्न होगा ऐसे में शिवजी ने जगत कल्याण के लिए हलाहल विष को स्वयं ही धारण कर लिया। तभी से शिवजी का नाम भी नीलकंठ पड़ा क्योंकि भयंकर विष को गले मे धारण करने के बाद शिवजी का कंठ नीला पड़ गया था।
हलाहल विष का जिस प्रकार भगवान शिव ने लोक कल्याण के लिए विषपान कर लिया उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को सदैव परहित का भाव रखना चाहिए और स्वयं की शुख सुविधा कामनाओं का त्याग कर भीषण से भीषण कष्ट सहते हुए जन कल्याण के भाव से मानवता की रक्षा से कार्य करना चाहिए।
पापविनाशक मोक्षप्रदायक श्री शिव महापुरण कथा का श्रवण पान करने के लिए सभी भक्त श्रधालुओं को सादर आमंत्रित किया गया है। महायज्ञ का समापन हवन एवं विशाल भंडारे के साथ दिनांक 13 फरवरी महाशिवरात्रि के दिन किया जाएगा।
संलग्न - सातवें दिन श्रीशिवमहापुरण कार्यक्रम की कुछ तस्वीरें।
- शिवानंद द्विवेदी, संयोजक एवं प्रचारक श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति भारत।
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