Friday, 24 February 2017

(Rewa, MP) कैथा में गो भागवत का आठवां दिन – हवन, भंडारे, शिव पूजन के साथ हुआ कार्यक्रम का विसर्जन – गोसेवा एवं गोरक्षा से जीते जी धरती पर प्राप्त करें स्वर्ग


दिनांक – 24/02/2017, महाशिवरात्रि
 स्थान –  (रीवा, मप्र)


कैथा में गो भागवत का आठवां दिन – हवन, भंडारे, शिव पूजन के साथ हुआ कार्यक्रम का विसर्जन – गोसेवा एवं गोरक्षा से जीते जी धरती पर प्राप्त करें स्वर्ग  

(गढ़/गंगेव/कांकर, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर आयोजित आठ दिवशीय साप्ताहिक श्रीमद गोभागवत कथा का समापन दिनांक 24 फरवरी 2017 को हवन एवं विशाल भंडारे के साथ हुआ. कार्यक्रम में बड़ी संख्या में क्षेत्रीय श्रद्धालु एवं शिवभक्त उपस्थित हुए.  
कार्यक्रम के आठवें दिन 24 फरवरी महाशिवरात्रि को दोपहर 12 बजे तक प्रवचन कार्य पूर्ण हुआ और साथ ही उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्य श्री चंद्रमणि पयासी जी ने गौरक्षा हेतु तत्पर रहने और गौसेवा हेतु प्रेरित किया. आज भारतीय समाज में गो और ब्रह्मण का पतित होकर इस प्रकार गिरना भारतीय समाज की दुर्दशा को दर्शाता है. आज प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य बनता है की वह अपने देश और उसकी संस्कृति के प्रति प्रतिबद्ध होवे और भारतीय संस्कृति की पहचान गौमाता की गौरवमयी इतिहास जिसमे कामधेनु एवं नंदिनी जैसी समुद्र मंथन से प्राप्त गौओं की महिमा और विशेषता का वर्णन हुआ है उसे भारत भूमि पर वापस लौटाएं. आचार्य श्री ने आगे कहा की सभी घरों में गौपालन को बढ़ावा देना चाहिए और सुबह उठकर सर्वप्रथम माता-पिता और गौमाता की परिक्रमा करके उन्हें नमन करना चाहिए और तब जाकर सभी कार्यों का सुभारम्भ करना चाहिए. यही हमारी श्रीराम और श्रीकृष्ण की धरती में शिखाया गया है एवं उसका अपने चरित्र में उतारना अति आवश्यक हो गया है. आचार्य जी ने कहा की गायों की महिमा के वर्णन से तो सम्पूर्ण हिन्दू धर्मग्रन्थ ही भरे पड़े हैं पर अब तक गो उपनिषद् और महिमा ग्रंथों के अतिरिक्त कोई गोमहापुराण जैसे ग्रन्थ नहीं बने हैं. आज गायों के विलोप होने और उनकी अवहेलना की जो स्थिति निर्मित हुई है उससे यह तय है की गो भागवत कथा जैसे कार्यक्रम भारतीय संस्कृति में और अधिक बढ़ेंगे परन्तु पुराण ग्रंथों के वाचन और श्रवण मात्र से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है इसे अपने चरित्र में उतारना और उसी के अनुसार गोसेवा और गोरक्षा करते हुए जीवन यापन करना और तब व्यक्ति के मरने के बाद फिर वैतरणी नामक किम्वदंती वाली नदी पार कर स्वर्ग जाने की मसक्कत नहीं करनी पड़ेगी और जीते जी ही हर एक भारतीय गोसेवा-गोरक्षा से वैतरणी पार कर धरती में ही स्वर्ग प्राप्त कर सकेगा.   

!!! सादर धन्यवाद !!!

संलग्न – प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा की कुछ तस्वीरें. धर्मार्थ समिति कैथा का लोगो.
             

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Wednesday, 22 February 2017

(Rewa, MP) गोवंश सुरक्षा का आज सीधा सरोकार धरती पर मानवता की सुरक्षा से है - आचार्य श्री



दिनांक - 23/02/2017, स्थान - गढ़/गंगेव रीवा मप्र,

   (गढ़/गंगेव, रीवा मप्र - शिवानन्द द्विवेदी) पावन यज्ञ स्थली कैथा में दिनांक 17 से 24 फरवरी महाशिवरात्रि तक चलने वाले गो भागवत कथा में आचार्य श्री चंद्रमणि पयासी जी महाराज ने सातवें दिन की कथा प्रसंगों और अपने प्रवचन में आगे बताया की गौ-हत्या और गौ-वंशों के अपमान में संलिप्त समाज और लोगों से असहयोग करना अनिवार्य है. गौमांस भक्षण और गौवध में रत समाज और व्यक्तियों से खान-पान से लेकर रोटी-बेटी तक का सभी सम्बन्ध विक्षेद कर देना चाहिए. यदि हमारे घरों में मोटर-वाहन कम हैं तो कोई फर्क न पड़े पर अपने-अपने घरों में सामर्थ्य के अनुसार गौपालन अवश्य करना चाहिए. भैंस के स्थान पर भारतीय नस्ल की गौपालन को बढ़ावा देना चाहिए और गाय का ही पवित्र पौष्टिक दूध और दुग्ध उत्पाद का सेवन करना चाहिए. आचार्य ने आगे बताया की महिषी अर्थात भैंस राक्षसी प्रवित्ति से सम्बंधित है इसीलिए माँ दुर्गा ने अवतार लेकर महिषासुर का वध किया था. आज मानव समाज में महिषी अर्थात भैंस के दूध-घी और अन्य उत्पाद खाने-पीने से ही व्यक्ति की बुद्धि पथ भ्रष्ट हो तमाशिक होती जा रही है जिससे गौवंशों का अपमान बढ़ता जा रहा है और गौपालन को बढ़ावा नहीं मिल पा रहा है. आज आवश्यकता है भारतीय संस्कृति के अनुरूप पुनः गौपालन को बढ़ावा देकर भारतीय संस्कृति में समस्त जीवों की आत्मा और जीव जगत की माता मानी जाने वाली गौमाता के शरण में जाकर अपने समस्त कर्मों को पुनः सात्विक दृष्टि प्रदान करने की. सत्य, न्याय, धर्म, अहिंसा, परोपकार के मार्ग पर चलकर समस्त जीव जगत में एक ही परमेश्वर के दर्शन करने की जो की भारतीय धर्म-दर्शन की वास्तविक पहचान है.  

   इस प्रकार आचार्य जी ने आगे बताया की पुराने बूढ़े हो चुके बैलों और गोवंशों को कसाइयों के हाँथ कभी न बेचें. उन सरकारों का चयन अपने मताधिकार में करें जो गोरक्षा के प्रति वचनबद्ध हो और जीवों के प्रति अनैतिक और अधार्मिक हिंसा को बढ़ावा न देती हो साथ ही हिंसा बंद करने और शांति स्थापित करने में मदद करने वाली हो. सभी देशवाशियों को गोशाला बनाने में यथा संभव योगदान देना चाहिए और सरकारों पर भी दबाब बनाना चाहिए जिससे सार्वजनिक गौशालाओं और गोरक्षा को बढ़ावा मिले. 

    इस प्रकार धार्मिक अध्यात्मिक स्तर के अतिरिक्त भी सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर उतरते हुए आचार्य जी ने गोरक्षार्थ प्रत्येक देशवासी को अपने हर यथा संभव प्रयास करते रहने की बात कही. आचार्य जी ने आगे बताया की गौ हत्या बंद करने और गौवंश प्रताड़ना बंद करने को लेकर सामूहिक शांति पूर्वक धरना प्रदर्शन, सामूहिक हस्ताक्षर अभियान आदि निरंतर चलाये जाने चाहिए. गौवंश और गोरक्षा हेतु सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, अध्यात्मिक हर स्तर से निरंतर प्रयास जारी रहने चाहिए. आचार्य जी ने आगे बताया की भारतीय संस्कृति और हम सभी भारतीयों की पहचान ही गोमाता है और यदि हम गोरक्षा की दिशा में आगे नहीं बढे और तन-मन-धन अर्थात मनसा-कर्मणा-वाचा से प्रयास नहीं किया तो हमारी संस्कृति के साथ साथ हमारा स्वयं का विलोप हो जायेगा. आज गोरक्षा का सरोकार सीधे मानवता और पर्यावरण सुरक्षा से हो चुका है इस बात को विज्ञान भी उसी दृढ़ता और प्रूफ के साथ कह रहा है. गौवंश न होने से जमीन की उर्वरा शक्ति क्षीण होगी, अकाल, अति वृष्टि, सूखा आदि महामारी की स्थिति निर्मित होगी. श्रृष्टि के तापमान में हो रहे निरंतर बदलाव से स्थितियां इतनी भयानक हो सकती हैं जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. इसलिए स्वार्थी मानव के लिए गोरक्षा के अतिरिक्त भी स्वयं की जान बचाने के लिए भी गोवंश रक्षा और शाकाहार पर आधारित हो जाना ही एकमात्र समाधान बचा है.
     दिनांक 24 फरवरी को महाशिवरात्रि के दिन पूरे आठ दिवशीय कार्यक्रम का समापन हवन, रुद्राभिषेक, एवं विशाल भंडारे के साथ किया जायेगा इस बीच सभी श्रद्धालुओं और धर्मावलम्बी महानुभाओं को सादर आमंत्रित किया जाता है. 

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Tuesday, 21 February 2017

(Rewa, MP) कैथा में गो भागवत का छठा दिन – ईश्वरः स गवां मध्ये अर्थात गौओं के मध्य में ईश्वर की स्थिति होती है (महाभारत, अनु. 77/29)


Date: 22/02/2017, Place - Rewa (MP)

कैथा में गो भागवत का छठा दिन – ईश्वरः स गवां मध्ये अर्थात गौओं के मध्य में ईश्वर की स्थिति होती है (महाभारत, अनु. 77/29)

(गढ़/गंगेव/कांकर, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) पावन धर्मस्थली कैथा में श्रीमद गो भागवत कथा का पवित्र एवं पुण्य कार्यक्रम निरंतर अविरल प्रवाहित हो रहा हिया. इस बीच क्षेत्र से बहुतायत में श्रद्धालुगण आचार्य श्री चंद्रमणि पयासी जी के मुखारविंद से गो भागवत कथा का रसास्वादन करने के लिए एकत्रित हुए.
ज्ञातव्य है की गो भागवत कथा का यह कार्यक्रम यज्ञों की पावन स्थली कैथा के श्री हनुमान मंदिर प्रागण में दिनांक 17 फरवरी से प्रारंभ होकर दिनांक 24 फरवरी महाशिवरात्रि तक चलता रहेगा. कार्यक्रम का समापन हवन, रुद्राभिषेक, एवं भंडारे के साथ दिनांक 24 फरवरी महाशिवरात्रि के दिन किया जायेगा.

इस्लाम एवं क्रिश्चियनिटी में गोवध निषेध का वर्णन

आज जो इस्लाम के नाम पर भी गोवंश वध और गोमांश भक्षण की परंपरा पूरे विश्व में चल रही है इससे मुस्लिम धर्म ग्रंथों के कुछ उद्धरण देना यहाँ पर आवश्यक हो जाता है जहाँ गौ और जीवों को कष्ट न पहुचाने की निरंतर बात आती है. देखें गाय के दूध के विषय में कितना बढ़िया आख्यान आया है. 1) “गौ का दूध और घी तुम्हारी तंदुरस्ती के लिए बहुत जरूरी है. उसका गोस्त नुकसानदेह और बीमारी पैदा करता है जबकि उसका दूध भी दवा है” – हज़रत मुहम्मद (नासिहाते हादौ). 2) गाय का दूध बदन की खूबसूरती और तंदुरुस्ती बढ़ाने का बड़ा जरिया है. हज़रत मुहम्मद (बेगम हज़रत आयशा से). 3)  अच्छी तरह पलीं हुई 90 गायें 16 वर्षों में न शिर्फ़ 450 गायें और पैदा करती हैं बल्कि उनसे हजारों रुपये का दूध और खाद भी मिलता है. गाय दौलत की रानी है. हज़रत मुहम्मद (मौला फारुखी द्वारा संकलित, बरकत और सरकत में).
इस प्रकार बड़े ही आसानी से देखा जा सकता है की भले ही आज इस्लाम में भी गोमांश भक्षण की परंपरा बढ़ रही है परन्तु स्वयं हज़रत मुहम्मद साहब ने गायों के गुणों और महिमा का वर्णन किया है और उनकी प्रसंसा की है. भला जो गौओं की प्रसंसा कर रहे हैं उनकी हत्या की बात कैसे कर सकते हैं. आज दुर्भाग्य बस पाश्चात्य संस्कृति और विदेशी आसुरी संस्कृतियों के प्रभाव से पूरे विश्व में गायों और अन्य जीवों का निरंतर अपमान होता आ रहा है इन बेजुवान जीवों को ईश्वर के अंश न समझ कर उन्हें खाद्य और उपभोग की वस्तु समझा जा रहा है. जहाँ तक प्रश्न ईशाई धर्म का है स्वयं ईशा मसीह ही शांति के दूत के रूप अपने आपको धरती पर ईश्वर पुत्र बताते हैं तो भला जो शांति का दूत है वह जीवों की हत्या और उनके मांस भक्षण की बातें कैसे कर सकता है.

      आधुनिक मुस्लिम शासकों ने गोहत्या और गोवध पर प्रतिबन्ध लगाया

ऐसा भी नहीं की इस्लाम में गोहत्या और गोवध का जिक्र मात्र हज़रत मोहम्मद साहब के द्वारा ही कहा गया. इसका पालन बाद के इस्लामिक शासन काल में हुआ. भारतीय संस्कृति की जड़ और गहराई को देखते हुए कई मुस्लिम शासकों ने गौहत्या और गोवध पर प्रतिबन्ध लगाया था इसका गवाह पूरा इतिहास है. मुग़ल बादशाह बहादुरशाह के विशेष पीर मौलवी कुतुबुद्दीन साहब ने फतवा दिया था की हदीस में कहा है की जाबेहउलबकर (गाय की हत्या करने वाला) कभी नहीं बक्शा जाना चाहिए. ब्रिटिश काल में नवाब रावनपुर, नवाब मंगरौल, नवाब दुजाना, नबाव गुडगाँव, नवाब मुर्शिदावाद  आदि मुस्लिम शासकों ने गौहत्या पर प्रतिबन्ध लगाया था ऐसा इतिहास में आता है. लखनऊ के छः उल्मायें सुन्नत ने गोहत्या बंदी का फतवा दिया था. इमाम जाफर साहब ने इरशाद फ़रमाया था “गाय का दूध दावा है इसके मख्खन में तंदुरुस्ती है और मांस में बीमारी है”. आगे आया है की “मुसलमान को गाय नहीं मरना चाहिए. ऐसा करना हदीस के खिलाफ है (मौलाना हयात साहब खानखाना हाली समद साहब)”. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रसिद्द सेनानी हकीम अजमलखां का कहना है “न तो कुरआन और न ही अरब की प्रथा ही गाय की क़ुरबानी की इज़ाज़त देती है”
      इस प्रकार देखा जा सकता है इतिहास और अन्य धर्म प्रचारकों के वक्तव्य से यह भलीभांति स्पष्ट हो जाता है की भले ही गायों के प्रति निर्दयता और उनके मांस भक्षण की राक्षसी और आसुरी परंपरा बढ़ गयी हो परन्तु किसी भी धर्म ग्रन्थ और किसी भी सम्प्रदाय में गौहत्या होना नहीं बताया गया हेयर और निश्चित तौर पर उपरोक्त कथानकों से तो यहाँ तक स्पष्ट हो चुका है की इस्लाम भी गौहत्या और जीव हत्या की भर्त्सना करता है. जहाँ तक प्रश्न भारतीय संस्कृति में पले बढे और उपजे धर्म-सम्प्रदायों जैसे हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख, आदि का है तो निश्चित रूप इन सभी में तो गौ की महिमा का इतना वखान आया है ही सम्पूर्ण धर्म शास्त्र ही इनके महिमा से भरे पड़े है.
      अतः आज आवश्यकता है भारतीय संस्कृति को पुनः समझाने की. अहिंसा के सिद्धांत को समझकर उसे पालन करने की, अपने चरित्र में स्थापित करने की.

!!! सादर धन्यवाद !!!

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Monday, 20 February 2017

(Rewa, MP) कैथा में गो भागवत का पांचवां दिवश- संसार की श्रेष्ठतम पवित्र वस्तु है गौ


 दिनांक – 21/02/2017, स्थान –  (रीवा, मप्र)

 कैथा में गो भागवत का पांचवां दिवश- संसार की श्रेष्ठतम पवित्र वस्तु है गौ

(गढ़/गंगेव/कांकर, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) यज्ञों की पावन स्थली कैथा के श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में श्रीमद गौ भागवत कथा का पुण्य प्रवचन सतत अविरल प्रवाहित हो रहा है. आचार्य श्री चंद्रमणि पयासी जी महाराज के मुखारविन्द से गौ भागवत कथा का प्रवचन कार्य निरंतर दिनांक 24 फरवरी महाशिवरात्रि तक चलता रहेगा.
इस बीच पांचवें दिन के प्रवचन में आचार्य श्री ने गौमाता की महिमा का वखान करते हुए आगे बताया की प्रभु का अवतार ही इस श्रृष्टि में गौ और ब्राह्मण के रक्षार्थ हुआ है.
तुलसीकृत श्रीराम चरितमानस में कहा है

 “जब जब होई धरम के हानी | बढ़हिं असुर अधम अभिमानी|| करहिं अनीति जाई नहीं बरनी | सीदहिं विप्र धेनु सुर धरनी ||”

अर्थात जब-जब इस श्रृष्टि में धर्म की हानि अर्थात अधर्म का बढ़ावा होने लगता है, आसुरी प्रवृत्ति के राक्षसों का अभिमान अपने चरम पर बढ़ने लगता है और तमाम हाहाकार होने लगता है. श्री तुलसीदास जी कहते हैं की अनीति इतनी अधिक बढ़ जाती है जिसे वखान करना मुश्किल पड़ जाय. इस प्रकार विप्र, धेनु, देव, और धरती के रक्षार्थ प्रभु इनका दुःख क्लेश दूर करने अवतार लेते हैं.

गाय भारतीय धर्म-दर्शन एवं संस्कृति की प्रतीक

भारतीय संस्कृति में गाय वैदिक काल से ही धर्म और संस्कृति-सभ्यता की प्रतीक रही है. स्वयं वेद गाय को नमन करते हुए कहते हैं – “अघ्न्ये ते रूपये नमः|” अर्थात हे अवध्य गौ तेरे स्वरुप के लिए प्रणाम है (ऋग्वेद 1|154|6) के अनुसार जिस स्थल पर गाय सुखपूर्वक निवास करती है वहां की धूल तक पवित्र हो जाती है, वह स्थान तीर्थ बन जाता है.”
भगवान् श्रीकृष्ण जी ने तो यहाँ तक कामना की है की “गायें मेरे आगे हों, मेरे पीछे हों, गायें मेरे सब ओर हों और मैं गायों के मध्य वास करूं”
चक्रवर्ती सम्राट दिलीप ने तो गोरक्षार्थ अपना कांतिमय शरीर ही सिंह के समक्ष अर्पित कर दिया और कहा की क्षत से त्राण करने के कारण ही “क्षत्रिय” शब्द का प्रादुर्भाव हुआ, और यदि अपनी आँखों के समक्ष यदि शेर से मैं नंदिनी गौ की रक्षा नहीं कर सका तो “क्षत्र” शब्दार्थ के विपरीत आचरण के कारण जनमानस की निंदा का कारण बनूँगा इसलिए बेहतर यही है की इस निंदा से बचने वास्ते मैं अपने शरीर को ही क्यों न इस सिंह को अर्पित कर दूं और इसके एवज में यह सिंह नंदिनी गौ को छोंड़ देगा. इस प्रकार भारतीय संस्कृति में ऐसे पराक्रमी और धर्मनिष्ठ राजा हुए हैं जिन्होंने ने गौ और ब्राह्मण की रक्षार्थ अपना शरीर सर्वस्व अर्पित कर दिया. परन्तु आज दुर्भाग्य है की वही मानव अपनी सभ्यता संस्कृति को भूलकर गौमांश भक्षी हो गया है और गौ हत्या के घृणित कार्य में तत्पर हो चुका है.

महात्मा गाँधी और गोरक्षा के उनके प्रयास

आधुनिक काल में महात्मा गाँधी एक ऐसे महान व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने जीवहत्या और गौहत्या से व्यथित होकर अपना पूरा जीवन ही भारतीय संस्कृति के लिए समर्पित कर दिया. मेरी आत्मकथा अथवा सत्य के अनुप्रयोग (माय ऑटोबायोग्राफी ऑर एक्सपेरिमेंट विथ ट्रुथ) नामक पुस्तक में कई मर्तबा जिक्र आया है की किस तरह उन्होंने अपनी माता को शाकाहारी एवं भारतीय-हिन्दू संस्कृति पर आधारित जीवन जीने का जो वचन दिया था वह ब्रिटेन जैसे ठंडे मांसाहारी देश में रहते हुए भी पालन करने का पूरा प्रयास किया और सफल भी रहे. उन्होंने अपने मित्रों के साथ मिलकर ब्रिटेन में वेजीटेरियन सोसाइटी की स्थापना किया.
      महात्मा गाँधी ने तो गौहत्या और स्वराज्य पर अपने वक्तव्य देते हुए यहाँ तक स्पष्ट कहा की यदि स्वराज्य हमे देरी से मिले तो कोई फर्क नहीं पड़ता पर जहाँ तक प्रश्न है गौहत्या का तो भारतीय भूमि में सबसे पहले बंद होनी चाहिए. 1857 का स्वतंत्रता संग्राम ही भारतीय धर्मावलम्बी सिपाहियों द्वारा गाय की चर्वी लगी कारतूस प्रयोग न करने के कारण हुई. जो बाद में चलकर स्वराज्य आन्दोलन एवं स्वतंत्रता संग्राम का विस्तृत रूप ले लिया. अंग्रेजों अथवा भारतीय इतिहास में किसी शासन काल से भारतीय मन को शायद कोई इतनी विशेष व्यथा नहीं थी जितनी की गौ हत्या और गौमांस भक्षकों से. ईसाई धर्म गो हत्या को पुण्य नहीं बताता और गोरक्षा होना इस्लाम के भी विरुद्ध भी नहीं, और जहाँ तक प्रश्न है भारतीय संस्कृति में बढ़े पनपे धर्म-सम्प्रदायों जैसे हिन्दू, बौद्ध, जैन, पारसी, सिख, आदि का तो यह सभी धर्म-सम्प्रदाय गोरक्षा की मांग करते हैं. अतः जहाँ तक प्रश्न भारतीय मनोवृति का है तो निश्चित ही गोरक्षा का प्रश्न राष्ट्रीय एकता और सांप्रदायिक सौमनस्य संपादित करने का ठोस आधार है.


!!! सादर धन्यवाद !!!

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Sunday, 19 February 2017

(Rewa, MP) कैथा में गो भागवत का चौथा दिवश- मातरः सर्वभूतानांगावः अर्थात गाय समस्त प्राणियों की माता है


दिनांक – 20/02/2017
स्थान –  (रीवा, मप्र)


कैथा में गो भागवत का चौथा दिवश- मातरः सर्वभूतानांगावः
अर्थात गाय समस्त प्राणियों की माता है

(गढ़, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) दिनांक 17 फरवरी से गो भागवत कथा का जो पावन प्रवचन प्रारंभ हुआ वह सतत चल रहा है. दिनांक 20 फरवरी दिन सोमवार के प्रवचन में आचार्य श्री चंद्रमणि पयासी जी महाराज के मुखारविंद से अविरल प्रवाहित हो रहे प्रवचन में गाय को समस्त प्राणियों की माता बताया गया अर्थात मातरः सर्वभूतानांगावः यानि गाय समस्त प्राणियों की माता है. इसीलिए भारतीय संस्कृति में उत्पन्न हुए और पनपे सभी साधक जैसे शैव, वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य, जैन, बौद्ध, शिख, आदि सभी भारतीय धर्म-सम्प्रदायों में थोड़ी बहुत पूजा भिन्नता होते हुए भी उनके मूल में गोमाता के प्रति आदर भाव और सम्मान भरा हुआ है.

भारतीय संस्कृति में गाय को माता कहकर इसीलिए संबोधित किया गया है क्योंकि गाय सभी दिव्य गुणों की स्वामिनी है, खान है, और पृथ्वी पर साक्षात् देवी के समान है इसीलिए इसे कामधेनु भी अर्थात सभी धर्म विहित कामनाओं की पूर्ति करने वाली है ऐसा कहकर संबोधित किया गया है. सनातन धर्म ग्रंथों में कहा गया है की सर्वेदेवाःस्थितादेहेसर्वदेवमयीहिगौ: अर्थात गाय की देह में सभी देवी देवताओं का वास हुआ चित्रण किया गया है इसीलिए संस्कृत भाषा में इसे सर्वदेवमयीहि कहा गया है. संसार के अति प्राचीनतम ग्रंथों वेदों में गाय की महत्वा और विशेषता का वर्णन कई शूक्तियों में मिलता है. 
गो महिमा के वर्णन में आगे आया की इनके गोबर में साक्षात् लक्ष्मी, गोमूत्र में भवानी, चरणों के अग्रभाग में आकाश में विचरण करने वाले देवता, गोमाता के रंभाने की आवाज़ में प्रजापति और इनके थनों में समुद्र प्रतिष्ठित है. ऐसी मान्यता है की जो व्यक्ति प्रातः स्नान करके गो स्पर्श करता है, वह पापों से मुक्त हो जाता है. भविष्यपुराण, स्कन्दपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, महाभारत आदि ग्रंथों में गोमाता के अंग प्रत्यंग की विशेषताओं और देवी देवताओं की स्थिति का विस्तृत वर्णन आया है.

कामधेनु नंदिनी, गुरु वशिष्ठ एवं विश्वामित्र कथानक

इसी प्रवचन में आगे वसिष्ठ गुरु की कामधेनु नंदिनी का किस्सा चल रहा है जिसमे एक बार महोदया के राजा एवं गाधी पुत्र विश्वरथ जब युध्य क्षेत्र से लौट रहे थे तो गुरु वशिष्ठ जी के आश्रम रुकते हैं. गुरु वशिष्ठ जी की धर्मपत्नी ने बड़े ही आदर सत्कार के साथ विश्वरथ एवं उनकी थकी भूखी सेना का स्वागत किया. यह सब देख कर विश्वरथ आश्चर्य चकित होकर गुरु वशिष्ठ से पूंछते हैं की हमारी इतनी बड़ी सेना का सत्कार अकेले आपने कैसे कर लिया? आखिर आपके इस छोटे से आश्रम में इतनी बड़ी सेना के लिए व्यवस्था कैसे बन पाई. इस पर गुरु वशिष्ठ और उनकी धर्मपत्नी कामधेनु नंदिनी का पूरा किस्सा महोदया के राजा विश्वरथ को बता देते हैं. इस पर विश्वरथ मन में नंदिनी को प्राप्त करने की लालसा लिए वहां से चले जाते हैं. कुछ समय पश्चात जब देश में घोर अकाल पड़ता है तो अन्न दाने के लिए तरसती महोदया राज्य की जनता के लिए कहीं से कोई व्यवस्था न बन पाने से परेशान होकर राजा विश्वरथ अपने मंत्रियों को गुरु वशिस्ठ के आश्रम भेजकर कामधेनु नंदिनी को लाने के लिए भेजते हैं. इस पर गुरु वशिष्ठ मंत्रियों को आश्रम की गाय नंदिनी पर किसी व्यक्ति विशेष का अधिकार नहीं है  इस प्रकार बताकर वापस कर देते हैं. गुरु वशिष्ठ जी का कहना ठीक था की देश में घोर अकाल महोदया के राजा विश्वरथ की अति महत्वकांक्षी प्रवृत्ति और अनायास कुसमय युध्य छेड़ने से पड़ा है इसके लिए महोदय के राजा ही जिम्मेदार हैं. हिंसात्मक प्रवृत्ति से अधर्म प्रवृत्ति बढ़ने से अकाल सूखा की स्थिति निर्मित हुई है. यदि नंदिनी विश्वरथ को दे दी जाती है तो वह आश्रम की संपत्ति का अपमान होगा जिससे आश्रम में निवासरत हजारों छात्र और ऋषि-मुनि की व्यवस्था कैसे से हो पायेगी. क्योंकि नंदिनी कामधेनु गाय थी जो सभी धर्मविहित मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाली थी जिसके फलस्वरूप आश्रम में कभी कोई वस्तु की कमी नहीं पड़ती थी. आगे चलकर गुरु वशिष्ठ एवं राजा विश्वरथ में तकरार बढती है और विश्वरथ स्वयं तपोवल हासिल कर माता गायत्री के वरदान से विश्वरथ से महर्षि विश्वामित्र कहलाये. यह कहानी आगे चल रही थी.

!!! सादर धन्यवाद !!!

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