दिनाँक 8 फरवरी 2018, स्थान - पावन यज्ञस्थली कैथा से, गढ़/गंगेव, रीवा मप्र।
(शिवानंद द्विवेदी, रीवा मप्र)
यज्ञस्थली कैथा में चल रहे श्रीशिवमहापुरण कथा में दिनाँक 8 फरवरी को रुद्र संहिता के युद्ध खंड की कथा प्रसंग की चर्चना हो रही है। इस बीच आचार्य श्री चंद्रमणि पयासी जी महाराज के मुखारबिंद से पापविनाशक कथा में बताया गया कि शिव स्वयंभू देवाधिदेव हैं। धर्म सत्य और तप की शक्ति सिद्ध करने के लिए भववान शिव को विभिन्न प्रकार से लीलाएं करनी पड़ती हैं। ईश्वर को कुछ करने की आवश्यकता नही है सब कुछ उसकी इक्षा मात्र से ही होता है, ईश्वर सभी मनुष्यों को उनके कर्मों के आधार पर फल देने वाला होता है। शास्त्रों में बताया गया है कि ईश्वर कर्म के आधार पर सृष्टि सृजन करते हैं और कर्म के आधार पर ही मोक्ष अथवा संसार चक्र में फसे रहने का निर्धारण होता है। ईश्वर सभी जीवों के प्रति समान है परंतु मानव को जो भी शुभ अशुभ फल भोगने पड़ते हैं वह उसके शुभ अशुभ कर्म के आधार पर निर्धारित होते हैं। इसलिए व्यक्ति को चाहिए कि बुरे कर्म का त्याग कर वह सात्विक कर्म में रत हो ताकि जन्म जन्मांतर से संचित हुए बुरे प्रारब्ध कर्मों से निवृत्ति मिले और जीवन के वास्तविक उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति हो सके।
क्या कर्म से पलायन कर मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है?-
इस पर शास्त्र कहते हैं कि मोक्ष प्राप्ति के दो मार्ग हैं एक प्रवृति एवं दूसरा निवृति मार्ग। जहां प्रवृत्ति मार्ग का तात्पर्य शुभ और सात्विक कर्मों को करते हुए उसे ईश्वर को समर्पित करते हुए अपने इष्ट की आराधना में लगे रहना वहीं निवृत्ति मार्ग का तात्पर्य संन्यास मार्ग से है अर्थात सर्वस्व त्याग कर मन क्रम और वचन पूर्वक इष्ट की आराधना करना जिसमे न तो कोई सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति की अभिलाषा शेष हो और न ही किसी सांसारिक वस्तु के खो जाने का दुख। शुख दुख, लाभ हानि, जय पराजय, मान अपमान, राग द्वेष सभी से परे जाकर सन्यासी की भांति जीवन यापन करने वाला ही निवृत्ति मार्गी कहलाता है। प्रवृति और निवृत्ति दोनो मार्गों से मुक्ति सम्भव है इस प्रकार शास्त्रों का कथन है।
शिवमहापुराण कथा में रुद्र संहिता का वर्णन और अंधक, शंखचूर्ण तुलसी आदि के कथा एवं युध्य खण्ड प्रसंग -
शिवमहापुराण कथा के रुद्र संहिता में युद्ध खण्ड की कथा प्रसंगों में दंभासुर का तप और संखचूर्ण नामक पुत्र की प्राप्ति, शंखचूर्ण तुलसी विवाह, शंखचूर्ण का वध और तुलसी द्वारा विष्णु को पथ्थर होने का श्राप, हिरण्याक्ष एवं हिरण्यकश्यप का वध, अंधक का पार्वती के पसीने से उतपत्ति, अंधक का देवताओं को परास्त करना, अंधक का वध, आदि कथा प्रसंग चल रहे हैं।
यह विशेष आयोजन महाशिवरात्रि की पावन बेला में अति प्राचीन श्रीहनुमान मंदिर प्रांगण कैथा में हो रहा है जिसके संरक्षक कलयुग के देवता पवनपुत्र श्री बजरंग बली जी हैं। कार्यक्रम का समापन 13 फरवरी महाशिवरात्रि के दिन हवन एवं विशाल भंडारे के साथ किया जाएगा।
महाशिवरात्रि महोत्सव में प्रतिदिन शायं 7 बजे से मध्यरात्रि तक भजन रामायण का कार्यक्रम रखा जाता है। श्री हनुमान मंदिर प्रांगण के सभी आयोजन सार्वजनिक रूप के होते हैं जिसमे सभी श्रद्धालुजनों एवं भक्तों को सादर आमंत्रित किया गया है।
संलग्न - श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में आयोजन संबधी कथा प्रवचन एवं भजन कार्यक्रम में उपस्थित भक्त श्रद्धालुओँ के छायाचित्र।
- शिवानंद द्विवेदी, संयोजक एवं प्रचारक श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति भारत।
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