Wednesday, 17 August 2016

(रीवा, म.प्र.) Dated 17-08-2016: कैथा की पावन भूमि में भारी बारिश के मध्य संपन्न हुआ भागवत महापुराण कथा में हवन और भंडारे का कार्यक्रम. चौथी-दहकंदो की परंपरा के साथ हुआ विषर्जन.


स्थान – कैथा, गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 17.08.2016, दिन बुधवार,
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कैथा की पावन भूमि में भारी बारिश के मध्य संपन्न हुआ भागवत महापुराण कथा में हवन और भंडारे का कार्यक्रम. चौथी-दहकंदो की परंपरा के साथ हुआ विषर्जन.  
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विषय - कैथा की पावन भूमि में भारी बारिश के मध्य संपन्न हुआ भागवत महापुराण कथा में हवन और भंडारे का कार्यक्रम. प्रतिकूल प्राकृतिक दशाओं के मध्य हजारों की संख्या में चढ़ोत्तरी चढाने और भंडारे का प्रसाद ग्रहण करने पंहुचे भक्त-श्रद्धालु. नवरात्रि के पावन अवसर पर आयोजित होने वाले दुगोत्सव के कार्यक्रम की रूपरेखा तय.
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 (कैथा, रीवा) यज्ञों की पावन भूमि कैथा में स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व से हिन्दू-पंचांग के पवित्र श्रवण मास में आयोजित होने वाले जीव-कल्याणार्थ श्रीमद भागवत महापुराण भक्ति ज्ञान महायज्ञ कल दिनांक 16 अगस्त 2016 को हवन और भंडारे के साथ संपन्न हुआ, और आज दिनांक 17 अगस्त को सुबह दस बजे तक सम्पूर्ण कार्यक्रम का विसर्जन चौथी-दहकंदो की क्षेत्रीय परंपरा अनुसार कर दिया गया. इस बीच कल 16 अगस्त दोपहर लगभग 12 बजे से लेकर देर रात्रि तक बिलकुल ही कोई बारिस नहीं हुई. इस बीच लोगों की मान्यता है की श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में जब कभी भी भंडारे का कार्यक्रम होता है तो कैथा के आसपास भंडारे के समय बारिस नहीं होती है. निश्चित रूप से कल मौसम ने जिस तरह भक्त-श्रद्धालुओं का साथ दिया इससे ऐसी मान्यता को बल मिलता है और भक्तों का भगवान् के प्रति विश्वास प्रबल होत्ता है.

इस बीच भारी संख्या में आसपास और दूर दराज से लोग भंडारे का प्रसाद लेनें और चढ़ोत्तरी चढाने के लिए एकत्रित हुए. चढ़ोत्तरी का तात्पर्य होता है किसी भी धार्मिक कार्यक्रम में अपना यथा संभव योगदान देना. सार्वजनिक कार्यक्रमों में यह योगदान दो तरह का होता है. एक तो कार्यक्रम के सफल संचालन हेतु भक्त-श्रद्धालु अपना मनसा-कर्मणा-वाचा सहयोग देते हैं और दूसरा प्राचीन भारतीय परम्परा अनुसार भागवताचार्य या गुरु-महाराज जी के लिए दक्षिणा के तौर पर प्रत्येक प्रसाद ग्रहण करने वाला व्यक्ति एक रुपये से लेकर अधिकतम जिसकी जितनी ईक्षा हो उतना दान-दक्षिणा देता है और अपना नाम चढ़ोत्तरी रजिस्टर में दर्ज करवाता है. प्राचीन भारतीय परंपरा अनुसार यह चढ़ोत्तरी पूर्णतया गुरु जी महाराज का मेहनताना होता है और उन्हीको दिया जाना चाहिए ऐसी मान्यता है.

पिछले एक सप्ताह से हो रही भीषण बारिस के कारण जितनी संख्या में शद्धालुओं के उपस्थिति की संभावना थी उतनी नहीं हो पाई परन्तु फिर भी प्रतिकूल प्राकृतिक दशाओं को देखते हुए हजारों की संख्या में श्रद्धालुगण उपस्थित हुए और भंडारे का प्रसाद ग्रहण किये. ऐसा पहले भी देखा गया है की श्री हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा में होने वाले सभी सार्वजनिक-धार्मिक कार्यक्रमों में चाहे जैसी भी प्राकृतिक-परिस्थिति हो श्रद्धालुओं का काफी जमावड़ा लगता है. यद्यपि इस बार धर्मार्थ समिति की कार्यकारिणी ने मौसम के रुतबे को देखते हुए सब्जी-पूड़ी-मिष्ठान की परंपरा से थोड़ा हटकर मात्र पूड़ी-हलुआ (साथ में पंजीरी) का भंडारा रखा. चूंकि भारी बारिस के मध्य श्रद्धालुओं को बैठाकर प्रसाद वितरण संभव न हो पाने के कारण और भारी बारिस की वजह से ज्यादा व्यापक व्यवस्था न बन पाने के कारण मात्र पूड़ी-हलुआ (और साथ में पंजीरी) का प्रसाद वितरण ज्यादा उचित समझा गया.
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आज दिनांक 17 अगस्त दिन बुधवार को मत्रोच्चरण के साथ पारंपरिक विसर्जन हुआ संपन्न – इस बीच आज भी क्षेत्रीय मौसम खुला रहा और कैथा-हिनौती-गढ़ क्षेत्र में बिलकुल भी बारिस नहीं हुई. प्रातः से ही भक्त-श्रद्धालु श्री हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा में एकत्रित हुए और ग्रामीण अंचलों में परंपरागत रूप से चौथी-दहकंदो की परंपरा अनुसार आचार्य जी के मंत्रोच्चारण के साथ विसर्जन का कार्यक्रम संपन्न हुआ. गौर करने की बात है की जब भी कोई भी साप्ताहिक अथवा उससे अधिक समय का धार्मिक कार्यक्रम जैसे – श्रीमद भागवत कथा, बाल्मीकि कथा, श्रीशिव-महापुराण कथा, दुर्गोत्सव आदि कार्यक्रम कराया जाता है तो कार्यक्रम की शुरुआत में व्यास-गादी के नीचे के भू-स्थल पर ज्वारा बोया जाता है. ऐसी मान्यता है की यह ज्वारा कार्यक्रम के अंत तक बड़े होकर रंग में पीले पड़ जाते हैं. जो ज्वारे पीले होते हैं उनको उखाड़कर खाया भी जाता है जिसका अधिक पुण्यलाभ प्राप्त होता है. ऐसी भी मान्यता है की जितने अधिक ज्वारे पीले होते हैं यज्ञ का फल उतना ही अधिक प्राप्त होता है. अंत में इस ज्वारे को भक्त-श्रद्धालुगण उखाड़ कर पास स्थित जलाशय के जल में प्रवाहित कर देते हैं. साथ ही पूजा से बचा हुआ सब निर्माल्य और अन्य उपयोग में लाये गयी पूजा सामग्री आदि को भी जल में जाकर प्रवाहित कर दिया जाता है. एक बात और भी गौर करने वाली है की आज के वर्तमान मेडिकल शोध में यह बात सिद्ध हो चुकी है की ज्वारे का रस कैंसर-एड्स जैसी बीमारियों के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. ज्वारे का जूस और रस नियमित पीने से शरीर की रोग-प्रतिरोधक शक्ति में विकास होता है और लाइलाज बीमारियों को ठीक करने में मदद मिलती है. यह हुआ भारतीय-धर्म परंपरा में ज्वारे बोने और और उसके खाने का सिद्धांत, निश्चित रूप से इससे हमारे धार्मिक कार्यक्रमों में उपयोग किये जाने वाले अवयवों की प्रमाणिकता और वैज्ञानिकता को बल मिलता है. अर्थात हिन्दू-धर्म सस्कृति में उपयोग होने वाले रूपकों का निश्चित रूप से एक न एक वैज्ञानिक सिद्धांत है.

इस बीच उपस्थित भक्त-श्रद्धालुगण चौथी खेलने की परंपरा का भी निर्वहन करते हैं. इस चौथी-दहकंदो की परंपरा में लोग सब बैर-भाव भूलकर एक दूसरे के ऊपर रंग-मिटटी आदि फेंकते हैं और एक-दूसरे को सफल कार्यक्रम की बंधाई देते हैं. वास्तव में यही हमारी भारतीय सस्कृति का सन्देश भी है अर्थात “वसुधैव कुटुम्बकम” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” के भाव में दृढ होकर सभी मानव और जीवों में एक ही परम शक्ति को देखना यही है भारतीय संस्कृति का सन्देश.  
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श्रीमद भागवत कथा धर्मार्थ समिति का अगला आयोजन दुर्गोत्सव का होगा- इस बीच शारदेय नवरात्रि के पावन अवसर पर प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले दुर्गोत्सव के कार्यक्रम की भी चर्चना कार्यकारिणी द्वारा हुई जिसमे दुर्गोत्सव के कार्यक्रम भी रूपरेखा अभी से तैयार करने पर विचार किया गया. इस सन्दर्भ में जल्द ही एक बैठक बुलाकर धर्मार्थ समिति के युवा-प्रकोष्ठ के द्वारा आयोजित होने वाले इस विशेष दुर्गोत्सव के कार्यक्रम की तैयारिओं पर विचार-विमर्श किया जायेगा.
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श्रीमद भागवत कार्यक्रम में विशेष सहयोगीगण - इस सार्वजनिक कार्यक्रम के विशेष सहयोगियों में कैथा ग्राम से श्री भैयालाल द्विवेदी, बी.एस.एफ सेवानिवृत निरीक्षक बुद्धसेन पटेल, समिति सदस्य वृजभान केवट, विशेषर प्रसाद केवट, दसरथ केवट, नन्दलाल केवट, गोकुल केवट, सेवानिवृत शिक्षक भैयालाल पाण्डेय, सेवानिवृत आर्मी कैप्टन रामाधार पाण्डेय, शैलेन्द्र पटेल, अम्बिका प्रसाद मिश्रा, बडोखर से मुनेन्द्र सिंह परिहार, सोरहवा निवासी हरिबंस पटेल, अरुणेन्द्र पटेल, राम नरेश पटेल, आदित्य पटेल, हिनौती से अखिलेश उपाध्याय, शिक्षक उमाकांत चतुर्वेदी, शिक्षक सोमधर द्विवेदी, जमुई से आचार्य पंडित श्री त्रिवेणी प्रसाद उपाध्याय, दुवगमा से महेंद्र त्रिपाठी, अमिलिया से मतिगेंद पटेल, और सिद्धमुनि प्रसाद द्विवेदी मुख्य सहयोगियों में से थे.

 
|||धन्यवाद|||
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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता, एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा  (म.प्र.) पिन ४८६११७
मोबाइल नंबर – 07869992139


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