स्थान – कैथा, गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिन शनिवार, दिनांक: 13.08.2016,
कैथा में भागवत महापुराण
कथा का चौथा दिन – श्रीमद भागवत के पांचवें, छठे, और सातवें स्कंध का चल रहा वर्णन
विषय- कैथा में चल रही
भागवत कथा, आज महायज्ञ का चौथा दिवस. जड़ भरत और अजामिल के कथा प्रसंग, दधीचि ऋषि
की हड्डियों से बज्र का निर्माण और वृत्तासुर का वध प्रसंग मुख्य रहा.
(कैथा, रीवा) पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान
मंदिर प्रांगण में चल रही श्रीमद भागवत कथा के पांचवें, छठे, एवं सातवें स्कंध में
आज चौथे दिन दिनांक 13 अगस्त 2016 दिन शनिवार को आचार्य
श्री चंद्रमणि प्रसाद पयासी के मुखारबिंद से जड़ भरत और दधीचि ऋषि के कथा प्रसंगों
का वर्णन चल रहा है
श्रीमद भागवत महापुराण के पांचवें स्कंध को
भगवान् विष्णु की नाभि, छठे को वक्षस्थल और सातवें तथा आठवें को जंघा बताया गया
है.
पिछले तीन दिवस श्रीमद भागवत के प्रथम चार
स्कंधों का वर्णन संपन्न हुआ. जिसमे श्रीमद भागवत का महात्म वर्णन, भगवान् विष्णु
के चौबीस अवतारों की कथा, ब्रह्मा की उत्पत्ति, नारद के पूर्व जन्मों की कथा, राजा
परीक्षित की कथा, शौनकादि ऋषियों तथा सुकदेव जी के संवाद, सृष्टि क्रम का वर्णन,
बालक भक्त ध्रुव और प्रहलाद चरित्र सहित अन्य कई कथा प्रसंग सम्मिल्लित रहे.
पांचवें स्कंध की कथा का वर्णन -
दिनांक 12 एवं 13 अगस्त की कथा प्रसंगों में पांचवें स्कंध की कथा में प्रियव्रत, राजा
अग्रिघ्र, राजा नाभि, जड़ भरत, ऋषभ देव आदि चरित्रों का वर्णन हुआ. ध्यान देने
योग्य है कि यहाँ पर जड़ भरत एक अन्य राजा थे और शकुंतला तथा दुष्यंत के पुत्र नहीं
थे जिनके नाम से भारत वर्ष का नाम पड़ा. जड़ भरत की कथा इस लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण
है की श्रीमद भगवद गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए कहा है की “हे
अर्जुन जो व्यक्ति जिस भाव से मुझे पूजता है उसे मैं उसी भाव में मिलता हूँ” और यह
भी उल्लेख आया है की “हे अर्जुन शरीर त्याग के समय जिस व्यक्ति के मन में जो भाव
रहते हैं वह व्यक्ति उसी योनि/जन्म को प्राप्त होता है” इस सूक्ति/श्लोक का
सीधा-सीधा तात्पर्य है की यदि हम शरीर त्याग के समय भगवान् के भक्ति भाव में हैं
तो भगवान् की प्राप्ति होगी और यदि सांसारिक मोह-माया और घर-गृहस्थी सम्बन्धियों, संपत्ति-जायदाद
को मन में रखकर मृत्यु को प्राप्त करते हैं तो हम पुनः उसी योनि में प्रवेश करते
हैं और पुनः जन्म-मरण के चक्र में फंस जाते हैं. इस प्रकार जड़ भरत का कथानक भगवान्
श्री कृष्ण के उसी श्लोक की पुष्टि करता है.
जड़ भरत का प्रसंग कुछ ऐसे है की भरत एक अत्यंत
धर्मात्मा व्यक्ति थे. वह ईश्वर की भक्ति भाव और तपस्या में लगे रहते थे. इसी
उद्येश्य की पूर्ति के लिए अरण्य में कुश की कुटिया बनाकर तपस्या किया करते थे. एक
बार उसी वन में एक सिंह आया. उसी समय वहां पर सरोवर में जल ग्रहण करने एक गर्भवती
हिरणी भी आई. सिंह ने स्वभाव अनुसार तेज गर्जना की. जैसे ही गर्जना की ध्वनि हिरणी
के कानों में पड़ी, भय के मारे हिरणी का गर्भ वहीँ उसी स्थल पर गिर गया और वह
मृत्यु को प्राप्त कर गयी. यह वाकया तपस्या में बैठे जड़ भरत देख रहे थे. जड़ भरत ने
अपने तपोबल से कमंडल से जल लेकर सिंह पर छोंड दिया और सिंह वहीँ पर मुक्त हो गया.
परन्तु हिरणी का बच्चा वहीँ पर पड़ा हुआ तड़प रहा था. यह देख कर संत ह्रदय में दया
का भाव उत्पन्न हुआ, और सब कुछ त्याग कर आरण्य में तपश्या करने निकले जड़ भरत ने उस
छोटे हिरणी के बच्चे को गोद ले लिया और अपने साथ रखकर पालन पोषण करने लगे. इस
प्रकार देखें की कैसे जड़ भरत जो सब कुछ त्याग कर तपश्या करने आये थे और सात्विक
कर्म में ही पड़कर, एक असहाय की सहायता हेतु ही सही परन्तु अंततः उस हिरणी के बच्चे
के मोह में पड़ गए. यह मोह यद्यपि सात्विक कर्म दया-भाव से उत्पन्न हुआ परन्तु जड़
भरत को उनके त्याग-तपश्या के मार्ग से अंततः विचलित कर दिया. कहाँ जड़ भरत सब कुछ
त्याग कर तपश्या करने निकले थे और कहाँ वह एक पशु के मोह में पड़कर भक्ति भाव त्याग
तपश्या त्याग कर मृग का पालन पोषण करने लगे.
यह सब काफी समय तक चलता रहा और एक दिन बड़े होने
के बाद मृग वहीँ पर सरोवर में जल पीने आये हिरणों के झुण्ड के साथ पलायन कर गया.
जड़ भरत उस हिरण के बच्चे में इतने आसक्त हो गए थे की उसके बिछड़ने के दुःख में
व्यथित हो गए और इसी दुःख को लेकर अपना प्राण त्याग दिया. चूंकि मृत्यु के समय जड़
भरत के मन में पूर्णरूपेण मृग का भाव समाहित हो चुका था इस कारण अगले जन्म में
उन्हें मृग की ही योनि मिली. मृग योनि में जड़ भरत गंडक नदी के किनारे रहने लगे. वह
ज्ञानी थे और उनको पूर्ण एहसास था की पूर्व जन्म में वह जड़ भरत थे और कैसे मृग के
मोह में पड़कर उन्हें मृग योनी प्राप्त हुई है. अब वह सब जानते हुए इस योनी से
मुक्त होकर पुनः भगवत भक्ति में लीन होकर मुक्ति प्राप्त करना चाहते थे.
यहाँ पर पुनः श्रीमद भगवद गीता का एक अत्यंत
महत्वपूर्ण श्लोक है – इसमें अर्जुन योग-तप के कर्म से भटके हुए साधक के विषय में
जानना चाहते हैं और श्री कृष्ण जी से प्रश्न पूंछते हैं कि “हे केशव! आपने योग,
भक्ति, तप ज्ञान की तो महिमा का वखान किया है परन्तु मेरे मन में एक प्रश्न है जो
मात्र आप ही इसका समाधान कर सकते हैं - कहीं ऐसा तो नहीं है कि योग-तप से भटके हुए
ऋषि महात्मा की दशा उस वायु के तेज़ प्रवाह से भटके हुए बादल की तरह तो नहीं जो उसे
आसमान से छिन्न-भिन्न कर देती है. कहीं योग-साधना में रत आपके भटके भक्त की दशा
उसी छिन्न-भिन्न हुए बादल की तरह तो नहीं होगी”. इस पर श्री कृष्ण का कथन रहता है
की “हे कौन्तेय! न ही इस लोक में और न ही परलोक में, मेरे भक्त का कुछ भी बुरा
नहीं हो सकता. मेरा भक्त अपने इस जन्म के संचित शुभ कर्मों के अनुसार अगले जन्म
में किसी योगी, तपस्वी, संत, महात्मा और उच्च कुल के समुदाय में जन्म लेता है और
अपने पूर्व जन्मो के अच्छे संचित कर्म संस्कारों के प्रभाव से पुनः मोक्ष प्राप्ति
की दिशा में आगे बढ़ता है और वह उसे अंततः प्राप्त करता है”. तात्पर्य यह हुआ की,
हमारे संचित कर्म बैंक बैलेंस की तरह हैं. यदि उनसे व्याज नहीं मिलता तो भी वह
सुरक्षित तो रहते ही हैं. जैसे कर्म करेंगे वैसे ही अगले जन्म मिलेंगे और हमारे
पूर्व संचित कर्म मिलकर हमे पुनः उसी मार्ग पर कर्म करने की दृश्य-अदृश्य प्रेरणा
देंगे. और यही इस जड़ भरत का भी आख्यान है. इस आख्यान के माध्यम से हिन्दू-सनातन
धर्म के पुनर्जन्म और कर्मफल के अवश्यम्भावी सिद्धांत को प्रबलता मिलती है.
अंत में मृग योनि से जड़ भरत को मुक्ति मिलती है
और वह पुनः ब्राह्मण कुल में जन्म लिया. उत्तम ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के कारण
शिक्षा दीक्षा लेकर भगवत भजन में लीन रहने वाले जड़ भरत को एक बार कुछ भील पकड़ कर
देवी के समक्ष बलि देने ले जाते है परन्तु जब देवी यह परिदृश्य देखती है तो स्वयं
खडग हाथ में लेकर भील राजा की ही बलि दे देती है क्योंकि जड़ भरत एक धर्मात्मा
ब्राह्मण थे और उनकी बलि धर्म के पूर्णतया विरुद्ध थी. तत्पश्चात एक बार एक अन्य
राजा की पालकी ले जाने के लिए जड़ भरत को हृष्ट पुष्ट होने के कारण बुलाया जाता है
और जैसे ही उनके पैरों के तले कोई एक छोटी चींटी भी आये वह तुरंत उचक जाते और यह
वाकया देखकर पालकी पर बैठा राजा चकित होकर पूंछता है की आप हृष्ट-पुष्ट हैं फिर भी
पालकी लेकर उचक क्यों जाते हैं. इस पर शांत स्वभाव और तत्वज्ञानी धर्मात्मा पंडित
जड़ भरत ने राजा को अपने पूर्व जन्मों का पूरा वृत्तान्त बता देते हैं. यह सब जानकर
राजा उनसे दीक्षा लेकर उनको अपना गुरु बनाते हैं और कुछ समय बीत जाने के बाद ब्राह्मण
कुल में अपना अंतिम जन्म लेने वाले जड़ भरत मुक्ति और भगवान् को प्राप्त होते हैं.
पंचम स्कंध में ही आगे पुरंजनोपख्यान की तरह रूपक
द्वारा संसार सागर से प्राणियों को कैसे पार मिलता है और क्या-क्या भोगना पड़ता है,
रौरव आदि नरकों के माध्यम से रूपक द्वारा समझाया गया है. इसी स्कंध में गंगावतरण
की कथा भी आती है.
महर्षि दधीचि की कथा और जन कल्याण के लिए हड्डियों
का दान - भारतीय संस्कृति में ऐसे कई महान ऋषि-मुनि
पैदा हुए हैं जिन्होंने हसते हुए अपने सर्वश्व का दान मात्र मानव एवं जीव जगत के
कल्याण के लिए कर दिया. संत का तात्पर्य ही है की जीव कल्याण और परमार्थ के लिए
जीने वाला. ऐसा कैसे हुआ की ऐसे महान पुरुष मात्र भारतीय संस्कृति में ही ज्यादातर
जन्म लिए? कुछ तो है इस संस्कृति में जो भारत को अन्य संस्कृतियों से अलग करती है.
यह “वसुधैव कुटुम्बकम” और “सर्वे भवन्तु शुखिनः” पर आधारित संस्कृति है. विश्व की
अन्य संस्कृतियाँ यदि मानव को ही प्रधानता देती हैं तो भारत की सनातन संस्कृति एक ऐसी
संस्कृति है जो प्रत्येक चराचर में एक ही “एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति” का दर्शन
करती है. और यही इसकी खासियत भी है. क्योंकि जैसे ही मानव यह समझ पायेगा की इस
सृष्टि में उत्पन्न होने वाला प्रत्येक जीव उसी “एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म” की संतान
है तो वह सबको समभाव से देखना प्रारंभ कर देगा अर्थात योगी हो जायेगा क्योंकि
“समत्वं योग उच्चते” अर्थात समता का नाम ही योग है ऐसा श्रीमद भगद गीता में भगवान्
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया है. सभी जीवों में वह अपने आप को ही पायेगा.
महर्षि दधीचि की कहानी भी कुछ ऐसी ही त्याग
बलिदान और लोक कल्याण के उद्येश्य से अपने शरीर तक को दान में देने सम्बन्धी है.
श्रीमद भागवत महापुराण में दधीचि के अस्थिदान
प्रसंग की भूमिका कुछ ऐसे प्रारंभ होती है. यद्यपि देवराज इंद्र देवताओं का राजा
बताया गया है परन्तु यह सब मात्र रूपक हैं. इनके माध्यम से चरित्रों की व्याख्या
की गयी है न की इन सभी को वास्तविक में लेने की आवश्यकता है. देवराज इंद्र
भोग-विलास में डूबे एक ऐसे शासक की कहानी है जो अपनी इन्द्रियों के वश में रहता है
और अपने तुक्ष कृत्यों से हमेशा उपहास का पात्र बनता है. आज भी समाज में ऐसे शासक
और व्यक्ति मिल जाते हैं जो अपने मन और इन्द्रियों के वशीभूत होकर छोटे कार्य करते
हैं और बदनामी उठाते हैं. कुल मिलाकर एक शासक-प्रशासक में जो गुण होने चाहिए वैसा
देवराज इंद्र में नहीं थे.
ऐसे ही एक कथा-प्रसंग में इंद्र ने अपने गुरु
बृहस्पति को अपमानित करता है. अपमान न सहन कर पाने के कारण देवगुरु बृहस्पति
स्वर्गलोक से बहिर्गमन कर अदृश्य हो जाते हैं और इंद्र को चेतावनी दे जाते हैं
तुम्हे अपने गुरु के अपमान का फल चुकाना पड़ेगा. इंद्र अपने कृत्य पर शर्मिंदा होता
है और देवगुरु को बहुत तलाशने का प्रयास करता है परन्तु देवगुरु नहीं मिल पाते
हैं.
यह मौका देख असुर-दैत्य गुरु शुक्राचार्य दैत्यों
को मौके का फायदा लेकर स्वर्गलोक में आक्रमण कर इंद्र को सत्ताविहीन करने और
स्वर्गलोक को हन्थियाने के लिए प्रेरित करते हैं. दैत्यगण इंद्र को गुरु विहीन
पाकर अमरावती में आक्रमण कर मार-काट मचाकर इंद्र को इन्द्रासन छोंड़ने के लिए विवास
कर देते हैं. इंद्र भटकता हुआ जान बचाकर ब्रह्मा जी के पास पंहुचता है और उनसे
अपनी करनी और व्यथा दोनों बयां करता है. ब्रह्मा कहते हैं की इंद्र तुमने अपने
गुरु का अपमान किया है इसलिए तुम्हे इसका दंड तो भुगतना ही पड़ेगा. इंद्र के
बारम्बार प्रार्थना करने पर ब्रह्मा जी बताते हैं की इस समय मात्र एक ही ऋषि है जो
तुम्हे इस घोर संकट से उबार सकता है. महर्षि त्वष्टा का महाज्ञानी पुत्र विश्वरूप
को यदि तुम अपना पुरोहित बनाओगे और यज्ञ करवाओगे तो वह तुम्हे संकट से मुक्त
करेगे.
यह सुनकर इंद्र महर्षि त्वष्टा पुत्र विश्वरूप के
पास पंहुचता है और उनसे बारम्बार प्रार्थना करता है तब विश्वरूप इंद्र का पुरोहित
बनना स्वीकारते हैं. परन्तु विश्वरूप को जैसे ही पता चलता है की वह जिस राक्षस वंश
को समाप्त करने हेतु इंद्र का सहयोग दे रहे हैं वह मातृपक्ष से स्वयं भी राक्षस कुल
से ही जुड़े हुए हैं तब वह आहुतियों में देव-दानव दोनों को आवाहित करते हैं इस
प्रकार सम्पूर्ण यज्ञ का फल शून्य हो जाता है. यह जानकर इंद्र को क्रोध आता है और
तीन मुख वाले महर्षि पुत्र विश्वरूप के तीनों शिरों को काट देता है. इस प्रकार
इंद्र क्रोधवश ब्रह्म हत्या कर सबकी आलोचना का भागीदार बनता है. जैसे ही अपने
पुत्र के वध की सूचना महर्षि त्वष्टा को मिलती है वह क्रोध में आग बबूला होकर अपने
तपोबल से महायज्ञ कर वृत्तासुर नामक महाशक्तिशाली असुर-दैत्य को उत्पन्न कर उसे
आदेश देते हैं की जाकर इंद्र को मार इन्द्रासन पर कब्ज़ा कर ले.
वृत्तासुर ब्राह्मण शक्ति से उत्पन्न इंद्र की
ब्रह्म हत्या का परिणाम था इसलिए इंद्र की कोई शक्ति यहाँ तक की आग्नेयास्त्र,
बज्र आदि विफल हो गए. इंद्र के बज्र और धनुष को वृत्तासुर ने बच्चों का खिलौना
समझकर तोड़कर फेंक दिया. यह सब देख भयग्रस्त हो इंद्र युध्स्थल से पलायन कर सीधे
विष्णु जी के पास पंहुचा. श्री नारायण ने भी ब्रह्म हत्या के लिए इंद्र की अतिसय
अवहेलना की और कहा की वृत्तासुर से तुम्हारी रक्षा ब्रह्मा विष्णु शिव कोई त्रिदेव
नहीं कर सकते और मात्र एक ही व्यक्ति है इस सृष्टि में जो तुम्हे वृत्तासुर के
प्रकोप से बचा सकता है और वह हैं महर्षि दधीचि. महर्षि दधीचि से निवेदन करो की लोक
कल्याण के लिए यदि वह अपनी अस्थियों का दान देवें तब उनके अस्थियों से बना हुआ
बज्र ही वृत्तासुर को नष्ट कर सकता है अन्यत्र कोई रास्ता नहीं है.
भगवान्
नारायण की बात सुन इंद्र महर्षि दधीचि के आश्रम जाकर उनके चरण कमलों में गिरकर
सारी बात बताता है और लोक कल्याण के लिए जीवन यापन करने वाले महान मुनि दधीचि अपनी
अस्थियों को दान देने के लिए तत्पर हो जाते है परन्तु इसके पूर्व उनकी भारतवर्ष की
समस्त नदियों में स्नान करने की ईक्षा प्रबल होती है. यह जानकार की भारतवर्ष की
समस्त नदियों में स्नान करने के उपरांत अस्थियों का दान देने में तो बहुत अधिक समय
व्यतीत हो जायेगा. समस्त देवतागण अपनी शक्तियों से वहीँ दधीचि आश्रम के पास नैमिष
आरण्य में सभी नदियों को एकत्रित कर देते हैं और दधीचि मुनि स्नान कर अपने शरीर
में मिष्ठान का लेप करते हैं और उनकी वहीँ पर बंधी हुई कामधेनु गाय द्वारा चाट-चाट
कर जैसे ही उनकी त्वचा और मज्जा शरीर छोड़ देती हैं इंद्र आदि देवतागण उनकी रीढ़ की
हड्डी लेकर बज्र का निर्माण करते हैं और उसी बज्र के प्रहार से वृत्तासुर का वध
करते हैं ऐसा कथा प्रसंग आता है.
कुछ टीकाकारों की मान्यता है की दधीचि की
अस्थियों से तीन अस्त्रों का निर्माण हुआ था जिसमे की एक इंद्र का बज्र, दूसरा
भगवान् शिव का त्रिशूल और तीसरा अर्जुन का गांडीव धनुष था. यद्यपि इस पर भी
अलग-अलग टीकाकारों के अलग-अलग मत हैं.
दधीचि के अस्थिदान का सिद्धांत – महर्षि दधीचि भारतीय ऋषि-मुनि परंपरा के एक
ऐसे महानतम संत हैं जिहोने मानव कल्याण के लिए अपना सर्वश्व दान कर दिया. इंद्र ने
देवगुरु बृहस्पति का अपमान किया तत्पश्चात महर्षि त्वष्टा पुत्र विश्वरूप का भी वध
किया. इंद्र के कई अक्षम्य अपराध हैं फिर भी वह जब शरणागत हुआ तो उसे क्षमा कर ऋषियों
ने उसके उद्धार का मार्ग खोजा. विश्वरूप एक ब्राह्मण था ब्रह्म हत्या के वध के पाप
से इंद्र को कोई देव, दानव, ब्रह्म-विष्णु-महेश त्रिदेव नहीं बचा सकते थे. ऐसे
जघन्य अपराध से मात्र एक ब्राह्मण तपश्वी की शक्ति ही बचा सकती थी. फलस्वरूप ऐसा
विचार कर नारायण ने इंद्र को उसके मुक्ति का मार्ग दिखाया की मात्र महर्षि दधीचि
का तपोबल और निःस्वार्थ लोक कल्याणकारी कृत्य ही है इस सृष्टि में जो इंद्र को बचा
सकता है. इस प्रकार एक ब्राह्मण के तपोबल से वृत्तासुर नामक उत्पन्न मारक शक्ति से
दूसरे श्रेष्ठ ब्राह्मण महर्षि दधीचि की लोक-कल्याणकारी श्जक्ति ही रक्षा कर सकती
थी. शायद इंद्र के सम्पूर्ण युध्यों और इतिहास में मात्र वृत्तासुर दैत्य का ही एक
ऐसा उल्लेख है जब क्रोधित ब्राह्मण की शक्ति को सर्वत्यागी ब्राह्मण की शक्ति से
रोका गया है.
यज्ञों की पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री
हनुमान मंदिर प्रांगण में दिनांक 9 अगस्त से 16 अगस्त तक आयोजित होने वाली पापविनाशक अमृतमयी श्रीमद भगवद
कथा का श्रवणपान करने के लिए आप सभी सादर आमंत्रित हैं.
|||धन्यवाद|||
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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता, एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा
(म.प्र.) पिन ४८६११७
मोबाइल नंबर – 07869992139















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