स्थान – कैथा, गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 11.08.2016
कैथा में भागवत महापुराण
कथा का द्वितीय दिवस – प्रथम एवं द्वितीय स्कन्द का चल रहा वर्णन
विषय- कैथा में श्रीमद
भागवत महापुराण कथा का दूसरा दिन. भक्तों एवं श्रधालुओं का आवागमन हुआ तेज. कार्यक्रम
प्रतिदिन शुबह 8 बजे से दोपहर 12:30 तक एवं सायं 3:00 बजे से 6:30 बजे तक. 16 अगस्त
दिन मंगलवार को होगा हवन एवं भंडारे के साथ सम्पूर्ण कार्यक्रम का समापन. कथा
प्रसंगों में भागवत के प्रथम एवं द्वितीय स्कन्द का वर्णन, भगवान् विष्णु जी के
चौबीस एवं नारद जी के अवतार का हो रहा वर्णन, भगवान् के विराट स्वरुप का वर्णन
(कैथा, रीवा) यज्ञों की पावन स्थली कैथा के श्री हनुमान मंदिर
प्रांगण में चल रही भागवत कथा के दूसरे दिवश आचार्य श्री चंद्रमणि प्रसाद पयासी जी
ने बताया की श्रीमद भागवत महापुराण हिन्दू पुराणों में अत्यंत लोकप्रिय ग्रन्थ है.
वैसे पुराणों में श्रीमद भगवद महापुराण का स्थान चौथा आता है परन्तु लोकप्रियता की
दृष्टि से यह सबसे अधिक लोकप्रिय ग्रन्थ है.
आज के कथा प्रसंगों में 12 स्कंधों 335 अध्यायों एवं
18 हज़ार श्लोकों वाले इस महान भागवत ग्रन्थ में भगवान् विष्णु के चौबीस अवतारों का
वर्णन चल रहा है. साथ ही नारद जी के भी कई जन्मों के प्रसंग का वर्णन आया.
प्रथम स्कन्द - श्रीमद
भागवत महापुराण के प्रथम दो दिवस प्रथम तथा द्वितीय स्कन्द का परायण एवं प्रवचन का
कार्य चल रहा है. प्रथम स्कन्द में कुल उन्नीस अध्याय आते हैं. इनमे शुकदेव जी के
द्वारा ईश्वर भक्ति एवं उससे प्राप्त ज्ञान एवं वैराग्य का वर्णन तथा उस वैराग्य
को कैसे यथावत बनाये रखा जाए अर्थात उस ईश्वरीय भाव में कैसे दृढ रहा जाये इसका
वर्णन आता है. इसी स्कंध में भगवान् के अनेक अवतारों का भी वर्णन, अश्वथामा द्वारा
पांडव वंश को नष्ट करने वाले कायर एवं निंदनीय कृत्य और साथ ही अपने स्वार्थ और
अहंकार की पुष्टि के लिए, बहुत ही विरले तथा मात्र धर्म की रक्षा के लिए उपयोग
होने वाले, “ब्रह्मास्त्र” (या आज की वैज्ञानिक भाषा में कहा जाये तो परमाणु बम)
के उपयोग सम्बन्धी कृत्य का वर्णन आता है. देवर्षि नारद जी के जन्मों का वृतांत,
महाराज परीक्षित के जीवन और मोक्ष का वर्णन, भीष्म पितामह का प्राणत्याग कर
स्वर्गलोक गमन, श्रीकृष्ण जी का द्वारिका गमन, विदुर के अत्यंत महत्वपूर्ण नीति उपदेशों
का वर्णन तथा साथ ही पांडवों का स्वर्ग हेतु हिमालय के लिए प्रस्थान का वर्णन आता
है.
द्वितीय स्कंध – श्रीमद भगवद कथा के प्रसंगों में आगे भगवान् विष्णु
के विराट स्वरुप का वर्णन आता है. श्रीमद भागवत महापुराण एक ऐसा कालजयी ग्रन्थ है
जिसमे चारों वेदों के गूढ़ रहस्य, उपनिषदों का तत्त्व ज्ञान, एवं श्रीमद भगवद गीता
भी स्वयं ही समाहित है. श्रीमद भगवद गीता के विश्वरूप दर्शन योग वाले अध्याय में
भगवान श्रीकृष्ण जी के द्वारा अर्जुन के विषाद और मोह वश उत्पन्न अज्ञान और संदेह
को नष्ट करने की दृष्टि से अपना विराट स्वरुप दिखाना पड़ा था तब जाकर अर्जुन को भगवान्
श्रीकृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण प्राप्त हुआ अन्यथा अर्जुन श्रीकृष्ण जी को अपना
मित्र और एक महान योध्या मात्र ही समझ रहे थे. श्रीमद भागवत महापुराण कथा में भी
दूसरे स्कंध में इसी भगवान् श्रीकृष्ण जी के विराट स्वरुप का वर्णन आता है. इसी
तारतम्य में इसी द्वितीय स्कंध में भगवान् श्रीकृष्ण जी के अर्जुन को दिए गए गीता
के उपदेश का भी वर्णन आता है. यह सब श्रीमद भागवत महापुराण ग्रन्थ के भीष्म पर्व
के अंतर्गत आता है. श्रीमद भगवद गीता पूर्णरूपेण श्रीमद भागवत महापुराण के इसी
भीष्म पर्व में विद्यमान है. बाद में ज्ञानिओं और मुनिओं ने श्रीमद भगवद गीता को
भागवत महापुराण से पृथक कर श्रीमद भगवद गीता काव्य ग्रन्थ का रूप प्रदान किया.
वैसे कुछ विद्वानों का यह भी मत है की प्रथमतः श्रीमद भगवद गीता का अभ्युदय हुआ और
तत्पश्चात श्रीमद भागवत महापुराण का. हम यहाँ पर मत-मतान्तर में नहीं उलझेंगे पर
जो भी हो एक बात भली भांति स्पष्ट है कि श्रीमद भगवद गीता तथा श्रीमद भागवत
महापुराण दोनों ही महानतम कालजयी ग्रन्थ हैं और दोनों का अपना अलग-अलग महत्व है.
जो भक्त और वैष्णव श्रद्धालु कथा प्रसगों और उपमाओं के आधार पर ईश्वर के प्रति भक्ति-ज्ञान-वैराग्य
जागृत करना चाहते हैं उनके लिए श्रीमद भागवत महापुराण एक अत्यंत सुन्दर और अमूल्य
धर्म ग्रन्थ है और जो भक्त और ज्ञानीगण सीधे तत्त्व और परमात्म ज्ञान ग्रहण कर
परमात्मज्ञान का रसास्वादन करना चाहते हैं करना चाहते हैं उनके लिए श्रीमद भगवद
गीता एक अत्यंत अमूल्य उपनिषद् ग्रन्थ है.
इसी दूसरे स्कंध में “श्री कृष्णार्पणमस्तु” के
भाव से कैसे अपनी भक्ति को दृढ बनाया जाये और कैसे उसी “श्री कृष्णार्पणमस्तु” भाव
में स्वयं को स्थित बनाये रखा जाए इसका वर्णन यहाँ पर आता है. आगे बताया गया है की
सभी जीवों में “आत्मस्वरूप” एक वही परम ब्रह्म परमेश्वर विराजमान है और वही सृष्टि
की उत्पत्ति के समय एक से अनेक होता है और इस दृश्य अदृश्य सृष्टि का
उत्पत्तिकर्ता है. अंत में प्रलयकाल में वही परम ब्रह्म परमेश्वर अनेक से एक हो
जाता है अर्थात सब कुछ उसी में समाहित हो जाता है. इसीलिए संस्कृत के एक श्लोक में
कहा गया है की “यथा पिंडे स ब्रह्मांडे, यथा ब्रह्मांडे सः पिंडे” अर्थात
जो इस पिंड (या शरीर) में है वही इस ब्रह्माण्ड में भी है और जो इस ब्रह्माण्ड में
है वही इस पिंड (शरीर) में भी है. यह सम्पूर्ण सृष्टि उसी “एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म”
की लीला का खेल है. आगे इसी स्कंध में सृष्टि उत्पत्ति का उल्लेख भी आता है.
यज्ञों
की पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में दिनांक 9 अगस्त
से 16 अगस्त तक आयोजित होने वाली पापविनाशक अमृतमयी श्रीमद भगवद कथा का श्रवणपान
करने के लिए आप सभी सादर आमंत्रित हैं.
|||धन्यवाद|||
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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता, एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा
(म.प्र.) पिन ४८६११७
मोबाइल नंबर – 07869992139











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