Saturday, 13 August 2016

(रीवा, म.प्र.) कैथा में दिनांक 12 अगस्त को भागवत महापुराण कथा का तृतीय दिवस – बालक भक्त ध्रुव और प्रहलाद की अटल भक्ति और ईश्वर प्रेम



स्थान – कैथा, गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 12.08.2016 

कैथा में भागवत महापुराण कथा का तृतीय दिवस – बालक भक्त ध्रुव और प्रहलाद की अटल भक्ति और ईश्वर प्रेम 

विषय- कैथा में श्रीमद भागवत महापुराण कथा का तीसरा दिन. तृतीय एवं चतुर्थ स्कंध के वर्णन में भगवान् के कपिलमुनि के अवतार, प्रह्लाद और ध्रुव की अटल भक्ति का वर्णन

(कैथा, रीवा) यज्ञों की पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में चल रही श्रीमद भागवत भक्ति ज्ञान महायज्ञ के तीसरे दिन आज तृतीय एवं चतुर्थ स्कंध की कथा प्रसंगों का वर्णन चल रहा है.  आचार्य श्री चंद्रमणि प्रसाद पयासी के मुखारबिंद से प्रहलाद, ध्रुव और भगवान विष्णु के छठे अवतार कपिलमुनि के चरित्र का वर्णन किया जा रहा है
ज्ञानिओं एवं मुनिओं द्वारा श्रीमद भागवत महापुराण की कथा में स्कंधों का वर्णन करते हुए बताया जाता है कि इस महापुराण का प्रथम और द्वितीय स्कंध की भगवान् विष्णु के चरण (पाद) हैं, तृतीय और चतुर्थ स्कंध को भगवान् की जंघा बताया गया है, पंचम स्कंध भगवान् की नाभि, छठा वक्षस्थल, सप्तम और आठवा स्कंध प्रभु की बांह, नौवां स्कंध कंठ, दसवां मुख, ग्यारहवां ललाट, और बारहवां तथा अंतिम स्कंध मूर्धा बताया गया है. इस प्रकार समझा जा सकता है की प्रभु की प्राप्ति हेतु श्रीमद भागवत की शरण में जाना ही पड़ेगा. क्योंकि जिस प्रकार से श्रीमद भागवत महापुराण के प्रत्येक स्कंध और अध्याओं को भगवान् विष्णु के नख से शिख तक के प्रत्येक अंग से तुलना की गयी है उसी प्रकार जब भक्त पूर्णरूपेण श्रीमद भगवद कथा में नख से शिख तक डूब जाता है तो वह उसी प्रकार भगवानमय हो जाता है और भगवान् स्वयं उसके हो जाते हैं. श्रीमद भागवत आज कलयुग में मानव मुक्ति का अत्यंत महत्वपूर्ण और संभवतः एक मात्र साधन है. श्रीमद भागवत के सतत स्वाध्याय और चिंतन-मनन से जीव के पाप और संचित प्रारब्ध कर्म विलीन हो जाते हैं और जीव मोक्ष को प्राप्त करता है ऐसा श्रीमद भागवत कथा के प्रसगों में बारम्बार वर्णन आता है. चारों श्रुति ग्रन्थ वेद, 18 पुराणों में भक्ति, ज्ञान वैराग्य और त्याग समाहित होने से इस महान ग्रन्थ श्रीमद भागवत महापुराण का इतना अधिक महत्व है की आज सर्वसम्मति से इसे पंचम वेद माना गया है.  
श्रीमद भागवत महापुराण भक्ति ज्ञान महायज्ञ की कथा प्रसगों के पहले और दूसरे दिवस प्रथम और द्वितीय स्कंध के वर्णन के पश्चात तीसरे दिन आज दिनांक 12 अगस्त 2016 को तृतीय एवं चतुर्थ स्कंध का वर्णन चल रहा है.
तृतीय स्कंध की कथा प्रसंगों का वर्णन  - तृतीय स्कंध उद्धव और विदुर के भेंट से प्रारंभ होता है. उद्धव द्वारा श्रीकृष्ण जी के बाललीला चरित्रों का वर्णन, विदुर और मात्रेय ऋषि की भेंट, सृष्टि की उत्पत्ति और उसके क्रम का वर्णन, ब्रह्मा जी की उत्पत्ति, चारों युगों का काल विभाजन, सृष्टि-विस्तार का उल्लेख, वाराह अवतार के कथा प्रसंग, दिति द्वारा आग्रह पर और ऋषि कश्यप के साथ सहवास से उत्पन्न दो अमांगलिक राक्षस पुत्रों की कहानी, जय-विजय का ऋषि सनतकुमार द्वारा शापित होकर विष्णुलोक से पतित होकर दिति के गर्भ में हिरणाक्ष एवं हिरणकश्यपू के रूप में जन्म लेना, ववाराह अवतार द्वारा हिरणाक्ष और नृसिंह अवतार द्वारा हिरणकश्यपू का वध, कपिलमुनि के रूप में भगवान् विष्णु का छठा अवतार लेना और  सांख्यदर्शन की शिक्षा देना आदि कथा प्रसंग तृतीय स्कंध में आते हैं. इसी स्कंध में कपिल गीता का भी वर्णन आता है और भक्ति के गूढ़ रहस्यों का वर्णन भी आता है.
 चतुर्थ स्कंध की कथा - चतुर्थ स्कंध के कथा प्रसंगों में बालक ध्रुव की भक्ति की कथा का विशेष महत्व है. इसमें बताया गया है की यदि भक्ति सच्ची है तो उम्र का कोई बंधन नहीं होता. आगे “पुरंजनोपख्यान” का वर्णन आता है जिसमे इन्द्रियों की प्रबलता की चर्चना की गयी है. “पुरंजनोपाख्यान” में वर्णन आता है की राजा पुरंजन एक कन्या के प्रेम में पड़कर उससे भोग-विलास की मनसा से नौ द्वार वाले नगर में प्रवेश परता है और यवनों और गन्धर्वों के द्वारा मारा जाता है.
यहाँ पर ज्ञानिओं ने इसे विभिन्न उपमाओं/रूपको के माध्यम से वखान किया है. श्री नारद मुनि ने वर्णन करते हुए कहा है की राजा पुरंजन यह जीव है जो इस नौ द्वारों वाले शरीर में अपनी युवावस्था में विचरण करता है और काल-कन्या रुपी वृद्धावस्था की चपेट में आकर मारा जाता है. नौ द्वार वाला यह शरीर दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र, एक मुख, एक गुदा, एक लिंग है. अज्ञान और अविद्या की यह कन्या रुपी माया जीवरुपी उस राजा पुरंजन को अपने वशीभूत किये हुए है. पुरंजन रुपी जीव अपनी यौवन अवस्था के आनंद में अपना कीमती मानव शरीर अज्ञानता से उत्पन्न भोग-विलाश में नष्ट कर रहा होता है. अंत में जब काल जीव के समक्ष यवन और गन्धर्व रूप में आता है तो जीव को परास्त होना पड़ता है और मृत्यु को प्राप्त होता है. यही “पुरंजनोपाख्यान” का सन्देश है. “पुरंजनोपाख्यान” से मानव को यही शिक्षा लेनी चाहिए की अपना अमूल्य मानव तन लौकिक इन्द्रियों के भोग-विलाश और अज्ञानता में न नष्ट करे और भगवत-भक्ति और ज्ञान-वैराग्य का मार्ग ग्रहण कर मानव जीवन को सफल बनाकर मोक्ष की तरफ अग्रसर होवे अन्यथा स्थिति कुछ “पुरंजनोपाख्यान” जैसी होगी और अंत में मात्र पछतावा और हाँथ मलना ही शेष बचेगा जब वृद्धावस्था में शक्ति क्षीण होने के बाद मानव तन रोग, ज्वर और आधि-व्याधि से नष्ट हो जाता है और सम्बन्धी परिजन अंत में श्मशानघाट जाकर मृतक शरीर को आग को समर्पित कर देते है.     
कपिलमुनि रूप में भगवान विष्णु के छठे अवतार का वृतांत और सांख्य दर्शन –
श्रीमद भागवत महापुराण के तृतीय स्कंध में भगवान् विष्णु के छठे अवतार के रूप में कपिलमुनि का वृत्तान्त आता है. कपिलमुनि की माता का नाम देवहुति तथा पिता कर्दम ऋषि थे. देवहुति को ब्रह्मा की पुत्री बताया गया है. ऐसे माना जाता है की कपिलमुनि ने बाल्यावस्था में ही सांख्यदर्शन का ज्ञान प्राप्त कर सर्वप्रथम इसे अपनी माता देवहुति को दिया था. कपिलमुनि ने बाल्यावस्था में ही आगे अपनी माता को सृष्टि व प्रकृति के चौबीस तत्वों का ज्ञान प्रदान किया था. ऐसी भी मान्यता है की कपिलमुनि ने संख्यादर्शन का जो ज्ञान अपनी माता देवहुति को प्रदान किया था आगे श्री कृष्ण जी ने वही ज्ञान कुछ श्लोकों के माध्यम से अर्जुन को श्रीमद भगवद गीता में भी दिया है.
कपिलमुनि का श्रीमद भगवद गीता में वर्णन कुछ इस प्रकार भी आता है –

अक्षत्थ: अश्रृत्थ: सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारद:।
गन्धर्वाणां चित्ररथ: सिद्धानां कपिलो मुनि:॥
अर्थात इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण जी अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं की - “हे अर्जुन सुन! समस्त वृक्षों में सबसे उत्तम वृक्ष पीपल मैं ही हूँ, देव ऋषिओं में नारद मैं हूँ, और सिद्धों में कपिलमुनि मैं ही हूँ. अर्थात इन सबको तू मेरा ही स्वरुप जान.”
कपिलमुनि ने बताया कि मानव और देवताओं के शरीर सामान होते हैं परन्तु ज्ञान ऐसा तत्त्व है जो मानव को देवताओं से भी श्रेष्ठ बनाता है. भक्ति, योग, यज्ञ, दान, तीर्थ और व्रत आदि को सभी धर्मों से श्रेष्ठ समझना चाहिए. सांसारिक तृष्णा के त्याग से ही भक्ति योग की प्राप्ति संभव है. भक्ति और ज्ञान मात्र ईश्वर की ही कृपा से प्राप्त हो सकते हैं. कपिलमुनि का सांख्यदर्शन सनातन भारतीय संस्कृति के छह दर्शन ग्रंथों में अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रन्थ है. इस ग्रन्थ में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और निष्क्रिय ऊर्जा की अवधारणा को स्पष्ट किया गया है. आधुनिक काल के ऋषि मुनिओं में स्वामी विवेकानंद ने संख्यदर्शन के माध्यम से उस समय के वैज्ञानिक सिद्धांतों को अध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़कर तथ्यपरक व्याख्या कर आज के वर्त्तमान समय में भी भारतीय संस्कृति के सिद्धांतों को अत्यंत वैज्ञानिक और तथ्यपूर्ण सिद्ध किया है. भागवत और अन्य शास्त्र ग्रंथो में यह भी आख्यान आता है की कपिलमुनि के द्वारा ही उपाय बताने पर राजा अन्शुमान, दिलीप, और भागीरथ ने हज़ारों वर्ष कठिन तप कर राजा सगर के पुत्रों के उद्धार हेतु गंगाजी का पृथ्वी पर अवतरण करवाया. 
 राक्षसराज हिरन्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद का कथा प्रसंग प्रहलाद हिरन्यकश्यप एवं कयाधू का पुत्र था. वैसे तो प्रहलाद एक राक्षस पुत्र था परन्तु यह एक विचारणीय प्रश्न है की प्रहलाद कैसे धर्मात्मा हुआ? प्रहलाद को ऐसे कौन से संस्कार बचपन में या की उसके पूर्वजन्म के मिले जिससे वह अपने पिता और कुल के अन्य राक्षसों की तरह घोर अन्यायी अत्याचारी न होकर कैसे एक धर्मात्मा और भगवान् के प्रति प्रेम भाव रखने वाला पैदा हुआ?
भागवत महापुराण में ऐसा आख्यान आता है की संस्कार का अपना एक विशेष महत्व है. यह बात हमारे चरों वेदों में भी कही गयी है. इसीलिए भारतीय संस्कृति के सोलह संस्कारों का आज भी हिन्दू सनातन संस्कृति में उतना ही महत्व बना हुआ है. इन संस्कारों के माध्यम से बाल्यावस्था और यहाँ तक की गर्भधारण से ही व्यक्तित्व विकाश प्रारंभ होता है. इसीलिए आज वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी देखा जाए तो यह बात बताई जाती है की माता-पिता के सहवास से लेकर माता के गर्भधारण और उसके उपरांत माता को गर्भधारण किये हुए अच्छे धार्मिक, तनाव-मुक्त और शुभ वातावरण में रखा जाना चाहिए, माता को अच्छे और पौष्टिक तत्वों का आहार  दिया जाना चाहिए जिससे अच्छे हिष्ट-पुष्ट और बल-बुद्धिशाली प्रतिभावान संतान का जन्म होवे. भारतीय संस्कृति के सोलह संस्कारों और उनका अनुप्रयोग एक तथ्यपरक तर्कसंगत और वैज्ञानिक प्रक्रिया है.
आइये अब आते हैं प्रहलाद के कथा प्रसंग में. प्रहलाद यद्यपि एक अत्यंत दुष्ट, अत्याचारी और ईश्वर विरोधी राक्षसराज हिरन्यकश्यप का पुत्र था परन्तु प्रहलाद की माता कयाधू एक धर्मात्मा और ईश्वर में आस्था रखने वाली थी. ऐसा बताया गया है की प्रहलाद की माता कयाधू प्रह्लाद जब गर्भ में था तब प्रतिदिन सत्संग करने ऋषिओं-मुनियों की शरण में जाया करती थी. इस प्रकार प्रह्लाद गर्भ में ही माता द्वारा सुना गया भगवत-सत्संग सीधे ग्रहण कर लेता था. तात्पर्य यह है की माता पक्ष के धार्मिक और आस्थावान होने से पितृ पक्ष का प्रभाव उतना राक्षसी और व्यापक नहीं बन पाया और इसीलिए राक्षस कुल में जन्म लेने के बाद भी प्रहलाद धर्मात्मा और ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम रखने वाला पैदा हुआ. 
आगे के कथा प्रसंग में आता है कि किस प्रकार हिरन्यकश्यप ने प्रहलाद को ईश्वर पर आस्था त्यागने और स्वयं हिरन्यकश्यप को ही ईश्वर और शक्तिशाली मानने के लिए बहुत वाध्य करने के उपरांत और यहाँ तक की पहाड़ से धकेलने, होलिका के साथ दहन करवाने आदि असफल प्रयाशों के वावजूद भी भक्त प्रहलाद अपने विश्वास में अडिग रहा. अंत में जब स्वयं हिरन्यकश्यप हाँथ में खडग लेकर खम्भे के पास खड़े होकर जब प्रह्लाद को मृत्यु के घाट उतारने के लिए यह कहता है की बताओ तुम्हारा भगवान् कहाँ–कहाँ है. क्या तुम्हारा विष्णु इस खम्भे में ही है? तब प्रहलाद का जबाब रहता है की हाँ वह तो कण कण में व्याप्त है अतः वह इस खम्भे में ही है. तब हिरन्यकश्यप जैसे ही अपनी तलवार से भक्त प्रहलाद को मारने के लिए प्रयाश करता है वैसे ही भगवान का नृसिंह अवतार प्रकट होता है और हिरन्यकश्यप को मुक्त करते हैं. नृसिंह का तात्पर्य है आधा नर और आधा सिंह का रूप. चूंकि हिरन्यकश्यप को वरदान था की वह नर, देव, दानव, गन्धर्व किसी के हाथ नहीं मरेगा और न दिन में न रात में, न घर के अन्दर और न ही घर के बाहर. अतः प्रभु को आतताई राक्षस को मारने के लिए नृसिंह का अवतार लेना पड़ा.
प्रह्लाद-हिरन्यकश्यप की कथा आज बच्चा बच्चा जनता है. हर एक बालक को भारतीय नैतिक शिक्षा की पुस्तकों, कॉमिक्स की किताबों, कार्टून शो, और टीवी शो में आज यह दिखाया जाता है. ध्रुव और प्रहलाद पर बहुत पहले भी काफी कुछ लिखा गया है. परन्तु इसके सारतत्व पर जाना चाहिए और उनके “अटूट अनन्य विश्वास” और “संस्कार” के सिद्धांत को समझना चाहिए की कैसे प्रह्लाद पैदा हुए और कैसे उनमे इतनी अनन्य अटूट-भक्ति और ईश्वर-प्रेम जागृत हो पाया. और किस प्रकार यदि व्यक्ति में अटूट आस्था और अपने तथा ईश्वर के प्रति विश्वास हो तो असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं. 
बालक ध्रुव की अटूट भक्ति और भगवत-कृपा की प्राप्तिश्रीमद भागवत महापुराण के चौथे स्कंध में मनु-सतरूपा के पुत्र राजा उत्तानपाद और सुनीति से उत्पन्न बालक ध्रुव की कथा का उल्लेख आया. उत्तानपाद के दो भार्या थीं सुनीति और सुरुचि. सुनीति के पुत्र ध्रुव और सुरुचि के पुत्र उत्तम उत्पन्न हुए. राजा उत्तानपाद का सुरुचि के प्रति ज्यादा आसक्ति थी जिसके कारण वह चाहते हुए भी ध्रुव को उतना पस्नेह-प्रेम नहीं दे पाते थे जितना कि उत्तम को. इस प्रकार एक आख्यान में यह आता है की राजा उत्तानपाद ध्रुव को अपनी गोद में लेकर बैठे थे तभी ध्रुव की सौतेली माँ सुरुचि वहां पर उपस्थित हुई और ऐसा देख ईर्ष्यावश ध्रुव को उत्तानपाद की गोद से उठाकर कहा की तू मेरा पुत्र नहीं है जा पहले भगवान की तपश्या कर और मेरी कोख से जन्म लेगा तभी अपने पिता के प्रेम का अधिकारी बनेगा. क्योंकि यह मेरे पुत्र उत्तम का स्थान है और वही आगे राजगद्दी भी संभालेगा. इस प्रकार व्यथित होकर ध्रुव अपनी माता सुनीति के पास जाकर रोने लगा और कहा की उसके पिता उससे प्यार नहीं करते और सौतेली माँ भी अच्छा व्यवहार नहीं करती.
इस प्रकार सुनीति ने ध्रुव को भगवान विष्णु की तपस्चर्या करने के लिए प्रेरित करती है और कहती है की भगवान का प्रेम ही श्रेष्ठ है और वही सबके पिता हैं. ऐसा सुनकर बालमन ध्रुव घर से निकलकर आरण्य की तरफ प्रस्थान करता है. रास्ते में नारद मुनि मिलते है और सब वाकया समझते हैं और बालक ध्रुव को सलाह देते हैं की पांच साल की उम्र अभी तपस्या करने के लिए बहुत छोटी है और ध्रुव को माता के पास घर लौटने के लिए प्रेरित करते हैं. परन्तु बालमन और हठीला ध्रुव अपनी माता की बात पर अडिग रहता है. ध्रुव के हठीले और दृढ मन को समझकर श्री नारद मुनि बालक ध्रुव को “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” महामंत्र की दीक्षा देते हैं और मन ही मन भगवान् से उस भक्त बालक के सफलता की प्रार्थना करते है.
इस प्रकार थोड़े समय उपरांत भगवान् विष्णु बालक ध्रुव के समक्ष प्रकट होते हैं और उसे अटल आकाश में तारे की तरह चमकने का वरदान देते हैं. आज भी हम नानी-दादी के किस्से कहानियों में ध्रुव तारे का जो बखान सुनते हैं वह वही ध्रुव तारे का कथा प्रसंग है जो श्रीमद भागवत में आता है.
      भक्त बालक ध्रुव के कथा प्रसंग आज हर एक हिन्दू बालक-बालिकाओं को पढाया शिखाया जाता विश्वास है की कैसे मात्र पांच वर्ष का भक्त बालक ध्रुव अपने अटल और हठीले स्वभाव के कारण भगवत कृपा की प्राप्ति किया. ध्रुव और प्रहलाद के चरित्र आज सभी भारतीय बालक-बालिकाओं के अच्छे चरित्र निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण योगदान निभा रहे हैं. हमारी भारतीय संस्कृति बहुत ही व्यापक और समृद्ध है जिसका परिणाम है कि आज इस तथाकथित भूमंडलीकरण और पश्चिमी सभ्यताओं के प्रकोप में भी यह काफी हद तक जीवित है. भारतीय संस्कृति और संस्कारों को जीवित रखने और फलने-फूलने की जिम्मेदारी मात्र धर्म-प्रचारकों और गुरुओं-आचार्यों की ही नहीं बल्कि यह सबकी सामूहिक भागीदारी है. आज आवश्यकता है सबको इस पर चिंतन मनन की. बदलते परिवर्तनशील परिवेश में अपनी संस्कृति की सुरक्षा आज सबसे बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी है.       
यज्ञों की पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में दिनांक 9 अगस्त से 16 अगस्त तक  आयोजित होने वाली पापविनाशक अमृतमयी श्रीमद भगवद कथा का श्रवणपान करने के लिए आप सभी सादर आमंत्रित हैं.
|||धन्यवाद|||

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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता, एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा  (म.प्र.) पिन ४८६११७

मोबाइल नंबर – 07869992139 






















































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