स्थान – कैथा, गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 10.08.2016
कैथा में भागवत महापुराण
कथा का प्रथम दिन –
बैठकी के साथ
कथा-प्रवचन की हुई शुरुआत
विषय- कैथा में श्रीमद
भगवद महापुराण कथा की बैठकी आज. नजदीकी एवं दूर दराज ग्राम के भक्तगण हुए शामिल.
(कैथा, रीवा) यज्ञों की पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री
हनुमान मंदिर प्रांगण में आज दिनांक 10 अगस्त दिन बुधवार को श्रीमद भगवद महापुराण
की बैठकी का औपचारिक कार्यक्रम हुआ. इस बीच ग्राम क्षेत्र एवं दूर दराज से आये श्रद्धालु
एवं भक्तगण सम्मिल्लित हुए. कार्यक्रम में बेदी निर्माण और पूजन अर्चन का
कार्यक्रम जमुई ग्राम के आचार्य श्री त्रिवेणी प्रसाद उपाध्याय जी के द्वारा
करवाया गया. भागवताचार्य एवं कथा प्रवक्ता श्री चंद्रमणि प्रसाद पयासी जी के साथ-साथ
आचार्य श्री त्रिवेणी प्रसाद उपाध्याय जी भी सम्पूर्ण कार्यक्रम में मंत्रोच्चारण
के साथ पूजन अर्चन में भागीदारी निभाएंगे.
ज्ञातव्य हो कि यज्ञों की पावन स्थली कैथा के अति
प्राचीन श्री हनुमान जी मंदिर प्रांगण में हिन्दू पंचांग के पवित्र श्रावण मास में
आयोजित होने वाली श्रीमद भागवत महापुराण एक सार्वजनिक धार्मिक आयोजन है जो जन
सहयोग से एवं राष्ट्रीय स्तर की एन.जी.ओ. श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति (भारत)
के तत्वावधान में संपन्न करवाई जाती है. मंदिर प्रांगण में समिति द्वारा आयोजित
होने वाले सभी कार्यक्रम लोकहित एवं जीव कल्याण की भावना एवं सर्व शुखाय सर्व
हिताय तथा वसुधैव कुटुम्बकम की भावना से किये जाते हैं. मंदिर प्रांगण में आयोजित
होने वाले सभी कार्यक्रमों के संरक्षक कलयुग के देवता, पवनपुत्र, अंजनी सुत श्री
बजरंगवली जी हैं.
प्रथम दिवश – श्रीमद भागवत कथा की बैठकी एवं
महात्म्य –
सच्चिदानंदरूपाय
विश्वोत्पत्यादिहेतवे|
तापत्रयविनाशाय
श्रीकृष्णाय वयं नमः ||१||
श्रीमद
भागवत के महात्म्य से इसकी सुरुआत होती
है. प्रथम अध्याय के प्रथम श्लोक में सत-चित-आनंद स्वरुप परम ब्रह्म परमेश्वर की
स्तुति की जाती है जिनके द्वारा इस चराचर जगत, स्थावर-जंगम सृष्टि की उत्पत्ति,
पालन एवं संहार आदि हो रहा है. वह ईश्वर त्रितापों (दैहिक, दैविक और भौतिक तापों)
अर्थात कष्टों को नष्ट करने वाला है. सत का तात्पर्य है नित्य एवं शाश्वत, चित का
अर्थ है शुद्ध चैतन्य स्वरुप और आनंद से परिपूर्ण है वह है अद्वैत परमात्मा. उसी
परम ब्रह्म परमेश्वर और उसकी शक्ति से यह सम्पूर्ण सृष्टि चलायमान है, इसकी उत्पति
होती है, और वही इसका यथोचित पालन करने वाला है, जीव के कर्म के अनुसार उसका फल
देने वाला है. और जब उसके द्वारा निर्मित इस सृष्टि में पाप अधर्म अनाचार की पराकाष्ठ
होने लगती है तो वही महाकाल का रूप धारण कर इसको विनष्ट करने वाला भी है. वही
परमात्मा हमे इस जीवन और मृत्यु के चक्र से मुक्ति भी प्रदान करने वाला है, और
मोक्ष की तरफ अग्रसर होने की प्रेरणा भी देने वाला है.
इस प्रकार प्रथम अध्याय के प्रथम श्लोक में उस
परम ब्रह्म परमेश्वर की स्तुति एवं नमन के साथ श्रीमद भागवत महापुराण कथा का
शुभारम्भ होता है.
श्रीमद भागवत के प्रथम अध्याय के द्वितीय श्लोक
में व्यास जी के पुत्र श्री शुकदेव जी को नमन किया जाता है जिनके मुखारबिंद से यह
श्रीमद भागवत कथा महापुराण सर्वप्रथम महाराज परीक्षित जी को सुनायी गयी थी. अगले
एवं तृतीय श्लोक में शौनकादि मुनिजन नैमिष आरण्य में एकत्र होते हैं और आसन पर
विराजमान श्री सूतजी को प्रणाम कर उनसे प्रश्न पूंछते हैं. इस प्रकार अगले श्लोकों
में भी शौनकादि ऋषिओं का सूत जी के साथ भागवत कथा पर प्रेम संवाद होता है.
कुल मिलाकर श्री शुकदेव जी महाराज ने श्रीमद
भागवत महापुराण की जो व्याख्या इस महानतम शास्त्र में की है वह इस घोर कलयुग में
मानव को जन्म-मृत्यु और कर्मफल के चक्र से मुक्ति प्रदान करने वाली है. यह कथामृत
सभी को नहीं प्राप्त हो पाता और बड़े ही सौभाग्य से और पूर्व जन्मों के संचित शुभ
कर्म फलों से ही मिल पाता है.
श्रीमद भागवत कथा हमारे अशुभ और प्रारब्ध कर्मो
को नष्ट कर भक्ति-ज्ञान एवं वैराग्य द्वारा मोक्ष प्रदान करने वाली है. श्रीमद
भागवत कथा का निरंतर श्रवण पान करने से ईश्वर के प्रति प्रेम और स्नेह प्रबल होता
है और फलस्वरूप भक्ति से ज्ञान और ज्ञान से वैराग्य उत्पन्न होता है. क्योंकि इस
सृष्टि के नश्वर होने और समस्त दृष्ट प्रकृति के नष्ट होने के भाव में स्थापित
होकर मृत्यु और संसार के भय से मुक्त हो जाना ही एक तरह का मोक्ष है. हम सबको किसी
न किसी से किसी न किसी रूप में भय व्याप्त है. वह भय चाहे मृत्यु का हो, अपने
परिजन को बिछड़ने का हो, भौतिक शुख सुविधाओं के हाँथ से निकलने का हो अथवा मान
सम्मान के नष्ट होने का हो. चाहे वह किसी भी प्रकार का भय हो, हर जीव जो इस सृष्टि
में जन्म लिया है उसे किसी न किसी प्रकार का दृश्य अथवा अदृश्य भय सता रहा है. वह
भय तभी विलुप्त हो पायेगा जब हमे ईश्वर का साक्षात्कार हो जाएगा. जिस दिन व्यक्ति
को पता चल जाएगा की वह उस अनंत परम ब्रह्म परमेश्वर की संतान है और वह गलती पूर्वक
जिस सरीर को स्वयं समझ रहा है वह सरीर न होकर एक सत-चित-आनंद स्वरुप आत्मा है और
वह आत्मा अद्वैत है अर्थात वह स्वयं परमात्म ही है. श्रीमद भागवत महापुराण के
माध्यम से बारम्बार यही बात का स्मरण करवाने का प्रयास श्री शुकदेव जी द्वारा किया
जाता है. क्योंकि मृत्यु तो परीक्षित जी की भी सात दिवस के अन्दर हुई थी और उसी
मुनिपुत्र के श्राप स्वरुप तक्षक नाग के डसने से ही हुई थी परन्तु जिस दिन महाराज
परीक्षित को श्राप मिला था वह दिवस कुछ और था और श्री शुकदेव जी के भागवत कथा के
श्रवणपान के बाद सातवें दिवस स्थिति कुछ और थी. श्राप वाले दिन महाराज परीक्षित यह
नहीं समझ पाए थे की वह वास्तव में एक राजा और व्यक्ति न होकर एक साश्वत आत्मा हैं.
उनके शाश्वत आत्मा अमर आत्मा होने का एहसास श्रीमद भागवत के ज्ञान के बाद हुआ तब
उनको मृत्यु का भय ही नहीं रहा. परीक्षित जी को पता चल गया की जो मरने वाला है वह
तो कभी जीवित ही नहीं था. अर्थात मरेगा मात्र यह सरीर और आत्मा तो शाश्वत अज़र अमर
है वह कभी नहीं मर सकती. और जैसे ही आत्मा की अमरता का एहसास श्री शुकदेव जी की
कथा के उपरान्त श्री परीक्षित जी को हुआ वह हँसते हँसते मोक्ष को प्राप्त कर गए.
वास्तव में यही है श्रीमद भगवद महापुराण का सार,
और यही है श्रीमद भगवद गीता का भी सार. और वस्तुतः यही है हमारे सम्पूर्ण सनातन
धर्म का भी सार. अर्थात सम्पूर्ण सृष्टि एक है और अभिन्न है. एक ही शक्ति से यह संचालित
है. प्रत्येक जन्म लेने वाले का नष्ट होना तय है. कर्म का फल अवश्यम्भावी है. कर्म
के अनुसार ही फल मिलता है. और मोक्ष ही हमे इस जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर उस
परम शाश्वत ब्रह्म से एकाकार करेगा. और उस मोक्ष की प्राप्ति ही मानव जीवन का
अंतिम उद्येश्य है.
यज्ञों की पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री
हनुमान मंदिर प्रांगण में दिनांक 9 अगस्त से 16 अगस्त तक आयोजित होने वाली
पापविनाशक अमृतमयी श्रीमद भगवद कथा का श्रवणपान करने के लिए आप सभी सादर आमंत्रित
हैं.
|||धन्यवाद|||
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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता, एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा
(म.प्र.) पिन ४८६११७
मोबाइल नंबर – 07869992139










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