Monday, 15 August 2016

(रीवा, म.प्र.) दिनांक 15 अगस्त को पावन स्थली कैथा में भागवत कथा का छठा दिन – मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और परशुराम के चरित्र का हो रहा वर्णन. हवन भंडारे के साथ महायज्ञ का समापन कल दिनाक 16 अगस्त 2016 को



स्थान – कैथा, गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 15.08.2016, दिन सोमवार,

पावन स्थली कैथा में भागवत कथा का छठा दिन – मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और परशुराम के चरित्र का हो रहा वर्णन. हवन भंडारे के साथ महायज्ञ का समापन कल दिनाक 16 अगस्त 2016 को.

विषय- प्रतिकूल प्राकृतिक दशाओं के वावजूद कैथा की पावन भूमि के श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में चल रही भागवत कथा का आज छठा दिन, आज दिनांक 15 अगस्त को नौवें और दसवें स्कंध की कथा का हो रहा वर्णन. भगवान् श्रीराम के आदर्श अनुकरणीय पावन चरित्र और परशुराम के तेजस्वी चरित्र का हो रहा वर्णन. हवन और भंडारे के साथ कल 16 अगस्त दिन मंगलवार को सम्पूर्ण होगा कार्यक्रम. आचार्य श्री चंद्रमणि प्रसाद पयासी द्वारा स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायों के साथ प्रारंभ हुआ छठे दिन के परायण का कार्य.

(कैथा, रीवा) सम्पूर्ण भागवत महापुराण की कथा भगवान् नारायण के चौबीस अवतारों और उनकी लीलाओं पर केन्द्रित है. श्रीमद भागवत महापुराण आज भटकी हुई मानवता के लिए एकमात्र सहारा और वरदान है. इस संसार सागर रुपी घोर अन्धकार से पार लगाने का एकमात्र प्रकाश रुपी पुंज है. भागवत कथा में मानव जीवन के प्रवंधन के सभी गुर मौजूद हैं. भागवत कथा के रूपकों को समझाने के लिए इसके ज्ञानपरक व्याख्या और टीका की आवश्यकता है. व्यक्ति के मानव धर्म, पति धर्म, स्त्री धर्म, सभी प्रकार के धर्मों के मर्यादित होने की वैज्ञानिक व्याख्या है श्रीमद भागवत महापुराण. आदर्शों के बिना कोई भी संस्कृति जीवित नहीं रह सकती विलुप्त संस्कृतियाँ इसका जीवंत उदाहरण है. और भारत वर्ष की सस्कृति में आदर्शों की कोई कमी भी नहीं है. मात्र आवश्यकता है उन आदर्शों के बौद्धिक अनुकरण की तरफ अग्रसर होने की. आज का समाज भौतिक सुख-सुविधा और विलासिता को ही अपना आदर्श मानता है. बिना त्याग के मानव जीवन परिष्कृत नहीं किया जा सकता. तप आदि का जो वर्णन हमारे शास्त्र-ग्रंथों में बारम्बार आता है उसका तात्पर्य ही है की जीवन में भले ही उतने अधिक कठिन और सैकड़ों-हजारों वर्षों के ऋषि मुनियों जैसे तप न हो पायें पर तप-त्याग बिना प्राप्त वरदान और सुख भी बेमानी होता है क्योंकि उसके उपभोग में वह आनंद की प्राप्ति नहीं होती है. तप-त्याग अर्थात कठिन परिश्रम से प्राप्त सुख (चाहे भौतिक हो अथवा अध्यात्मिक) उसका ज्यादा महत्व बन जाता है. नैतिक शास्त्रों में परिश्रम से प्राप्त धन की तीन गतियों का वर्णन आता है – दान, भोग और नाश. जो धन दान अथवा भोग नहीं किया जाता उसकी तीसरी गति अर्थात नाश बताई गयी है. आज विश्व भर की विभिन्न आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं में भी इसकी पुष्टि मिलती है की जो बजट उस देश विशेष के विकास के लिए नियत समय के लिए पास होता है यदि उसका उपभोग अर्थात उपयोग उस कार्य विशेष के लिए न हो तो वह लैप्स हो जाता है. अर्थात ज्यादा समय तक पड़ा हुआ धन जिसका न तो दान किया जाय और न उपभोग वह मात्र मिटटी अथवा पत्थर के सामान है उसका कोई उपयोग नहीं होता.   

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण का पावन और अनुकरणीय चरित्र-
भागवत कथा में श्री नारायण के चौबीस अवतारों में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम और लीला पुरषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण का चरित्र उल्लेखनीय और अत्यंत अनुकरणीय है. भगवान श्रीराम का अवतरण दिन के 12 बजे हुआ बताया गया है और श्रीकृष्ण का अवतरण रात्रि 12 बजे होना बताया गया है. भगवान श्रीराम का चरित्र अत्यंत शांत और सीधा-सरल है जबकि भगवान् श्रीकृष्ण का चरित्र रहस्यमय और अत्यंत गूढ़ है. भगवान् श्रीकृष्ण अर्धरात्रि में अवतरित हुए जबकि भगवान श्री राम मध्यान दिन में. श्रीराम, भगवान् शिव और श्रीकृष्ण भारतीय संस्कृति के आधार स्तम्भ हैं. आज सम्पूर्ण हिन्दू-सनातन संस्कृति में प्रत्येक माता-पिता अपने बालक-बालिकाओं का नामकरण इन्ही महान पुरुष और नारी शक्तिओं (सीता, राधा, पार्वती, शक्ति आदि के विभिन्न नाम) के आधार पर करते हैं. नाम मात्र का स्मरण आते ही उस नाम विशेष में छिपे गुण और शक्तियों का ध्यान सहज ही आ जाता है. वैसे आज वर्तमान आधुनिक परंपरा में भारतीय संस्कृति की यह भी विशेषता समाप्त होती प्रतीत हो रही है. आज के बच्चों का नामकरण उनके माता-पिता पश्चिमी सभ्यता के नामों के आधार पर रखना ज्यादा पसंद करते है जो कि हमारे संस्कृति का दुर्भाग्य है. ऐसे में होगा यह कि एक दिन व्यक्ति अपने आदर्शों को भी पूर्णतया भूल जायेगा. वैसे भी हमारे महान भगवत-स्वरुप पुरुष पहले आदर्श कम और हमारे संस्कृति के वास्तविक चरित्र ज्यादा थे. आज श्रीराम और श्रीकृष्ण वास्तविक चरित्र न होकर आदर्श बताये जा रहे हैं. आने वाले कल में यह भी संभव है कि इन महान चरित्रों को पूर्णतया काल्पनिक चरित्र बताकर एलियन अथवा दुसरे ग्रहों से आया हुआ बताया जाए. ऐसी परिस्थिति मात्र पश्चिमी संस्कृति के अन्धानुकरण और भारतीय संस्कृति और अपने प्रति हीनभावना से उत्पन्न हुई है. यदि इतिहास उठाकर देखा जाय तो सहज ही समझ में आ जायेगा की जो भी संस्कृतियाँ विलुप्तप्राय हुई हैं कहीं न कहीं ऐसे ही कुछ कारण रहे हैं. यद्यपि भारतीय संस्कृति के विषय में ऐसा पूर्ण विश्वास से कहा जा सकता है कि हमारी संस्कृति में जो अन्य संस्कृतियों को आत्मसात कर अपने आप में समाहित कर लेने की क्षमता है वह भारतीय संस्कृति को अन्य संस्कृतियों से अलग बनती है. परन्तु आज हमे अतिसय आत्मविश्वास में पड़ने के स्थान पर अपनी संस्कृति को समयानुरूप परिवर्धित कर इसे कैसे अधिक सार्थक बनाया जाए इस बात के चिंतन-मनन की आवश्यकता है. इसीलिए आज आवश्यकता है भारतीय शास्त्र-ग्रंथों के वैज्ञानिक-अध्यात्मिक विवेचना की न की उनके आख्यानों को अक्षरसः लेने की. क्योंकि निश्चित रूप से यदि भागवत महापुराण अथवा अन्य हिन्दू शास्त्रों की सभी बातें अक्षरसः ग्रहण की जाएँगी तो वह आज के इस वर्तमान परिवेश में सही नहीं बैठ पाएंगी और संभव है कि इस वर्तमान पीढ़ी में अपने संस्कृति और शास्त्रों के प्रति ज्यादा अविश्वास पैदा करें, इसीलिए आवश्यकता है इनके सही टीका की और विज्ञान संगत व्याख्या की.  

भागवत कथा प्रसंग में नौवें स्कंध का वर्णन हुआ और दसवां आज प्रारंभ होगा
पिछले दिनों की कथा प्रसंगों, जिसमे की समुद्र मंथन, देवासुर संग्राम, नारायण का वामन और मत्स्यावतार की चर्चना से सम्बंधित रही, से आगे बढ़ते हुए आते हैं नौवें स्कंध की कथा और भगवान् श्रीराम और परशुराम के अवतारों की कथा में. मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का अवतरण त्रेतायुग में बताया गया है. युगों में त्रेता युग द्वापर के पहले आता है इसीलिए भगवान के अवतारों में पहले मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का लीला प्रसंग आता है तत्पश्चात लीला पुरषोत्तम श्रीकृष्ण का अवतार द्वापर में आता है. जहाँ भगवान श्रीराम मर्यादा की प्रतिमूर्ति थे, वहीँ भगवान श्रीकृष्ण अपनी मानव लीलाओं के चलते लीला पुरषोत्तम कहलाये. भागवत महापुराण में अवतारों के क्रम को भलीभांति व्यवस्थित किया गया है. ऐसा माना जाता है कि काल-निर्धारण के क्रम में सबसे सात्विक और सत्यमार्ग की तरफ चलने की प्रेरणा देने वाला युग पहले आएगा और समय के साथ संस्कृतियों के पतन और अनाचार, अन्याय, अनैतिकता, झूठ-फरेब और मानव के नैतिक पतन की तरफ खींचने वाला कलिकाल या कलियुग अंत में आएगा. जैसे ही यह समय चक्र पूर्ण होगा, अन्याय, अत्याचार और अनैतिकता बढ़ने पर महाकाल रुपी वह परमेश्वर इस सृष्टि का संहार कर पुनः नवीन रचना करेंगे, ऐसा सिद्धांत हिन्दू-संस्कृति में माना जाता है. यह सिद्धांत काफी हद तक वैज्ञानिक भी है क्योंकि ऋग्वेद की नासदीय सूक्ति में सृष्टि की उत्पत्ति के पहले की क्या स्थिति थी इसका बहुत ही वैज्ञानिक विवरण आज से हजारों वर्ष पूर्व ही आ जाता है जब आज का तथाकथित विज्ञान पैदा भी नहीं हुआ था. आज का वर्तमान तथाकथित भौतिक/रासायनिक/जेनेटिक विज्ञान भी इस बात को मानता है की बिग-बैंग का जो सिद्धांत और ब्लैक-होल आदि का जो सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है वह काफी हद तक ऋग्वेद में वर्णित सृष्टि के उत्पत्ति के सिद्धांत से ही सम्बंधित है. 

ईश्वरीय अवतार परशुराम का चरित्र और अन्यायी क्षत्रियों का पतन – यहाँ पर एक विशेष सिद्धांत जिसे संस्कार का सिद्धांत कहते हैं पर प्रकाश डाला जाएगा. राजा गाधि-दम्पति के  सत्यवती नामक पुत्री का जन्म होता है. सत्यवती का विवाह ऋचिक ऋषि से होता है. सत्यवती और उसकी माता को पुत्र प्राप्ति की ईक्षा प्रबल होती है. इस पर ऋचिक ऋषि क्रमशः ब्राह्मण और क्षत्रिय संतान हेतु दो “चारु” अभिमंत्रित कर दोनों पत्नी-सास को अलग-अलग धारण के लिए देते हैं. परतु स्नान के वक्त यह “अभिमंत्रित चारु” सत्यवती द्वारा बदल लिया जाता है ऐसा बताया गया है. नियति अनुसार सत्यवती-ऋचिक के क्षत्रिय पुत्र जमदग्नि और गाधि-दम्पति को ब्राह्मण पुत्र विश्वामित्र का जन्म होता है. कालांतर में जमदग्नि के परशुराम अवतरित हुए. विश्वामित्र-वसिष्ठ विवाद के परिणामस्वरुप विश्वामित्र राजर्षि और राजर्षि से ब्रह्मर्षि हुए. यहाँ पर ध्यान देने योग्य है की यद्यपि विश्वामित्र छत्रिय कुल में जन्म लेते हैं परन्तु उनके गुण ब्राह्मण अर्थात त्याग-तपश्या वाले होते हैं क्योंकि ऋचिक ऋषि द्वारा जो “अभिमंत्रित चारु” सत्यवती की माता को अभिमंत्रित करके दिया गया था वह ब्राहमण अर्थात सात्विक-तप  गुणधर्म का था. इसी प्रकार परशुराम सात्विक-तपश्वी ब्राहमण कुल में जन्म लेने के बाद भी छत्रिय गुणधर्म अर्थात योध्या-रक्षा वाले उत्पन्न हुए क्योंकि उनके वंसज में पिता जमदग्नि स्वयं भी सत्यवती के द्वारा छत्रिय गुणधर्म वाले “अभिमंत्रित चारु” के कारण उत्पन्न हुए थे. इस प्रकार संस्कार-गुण-धर्म की वैज्ञानिकता यहाँ पर दृढ होती है. ऐसा माना जाता है की तदोपरांत कार्तवीर्य अर्जुन नामक क्षत्रिय राजा के पुत्रों के द्वारा जमदग्नि का वध करने के कारण बदला लेने और अन्यायी-अत्याचारी क्षत्रियों को सबक सिखाने के लिए इक्कीस बार परशुराम ने पृथ्वी से अत्याचारी क्षत्रिय राजाओं का सफाया किया. परशुराम को भगवान् विष्णु के चौबीस अवतारों में से एक महत्वपूर्ण अवतार माना जाता है. ऐसी भी मान्यता है की परशुराम का नाम उन्हें भगवान शिव से प्राप्त वरदान स्वरुप फरसे (या परशु) के कारण पड़ा.

भारतीय संस्कृति के वैदिक काल में वर्ण विभाजन और वर्ण धर्म – वर्ण क्रम का विभाजन सनातन है ऐसा श्रीमद भगवद गीता में श्री कृष्ण जी के द्वारा भी बताया गया है. भारतीय संस्कृति में वैदिक काल से ही वर्ण-धर्म परंपरा चली आ रही है. परन्तु यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि वैदिक काल की वर्ण-व्यवस्था आज के वर्ण-व्यवस्था जैसी नहीं थी. वैदिक काल की वर्ण व्यवस्था में व्यक्ति के “गुण-कर्म-स्वभाव” तीनों के आधार पर बनाई गयी थी न की व्यक्ति के जन्म और जाति के आधार पर जैसी की आजकल वर्तमान परिवेश में चल रही है. स्वयं ऋग्वेद में व्याख्या आती है की सृष्टि की उत्पत्ति में उस परमपुरुष अर्थात परमेश्वर के पाद (जंघा और उसके नीचे के भाग) से शूद्र (शूद्र का तात्पर्य मजदूर और लेबर समुदाय से है), उदर भाग से वैश्य (वैश्य का तात्पर्य खेती-किसानी और व्यापार करने वाले समुदाय से है), छाती-भुजाओं से कक्षत्रिय (क्षत्रिय का तात्पर्य सुरक्षा व्यवस्था, शासन-प्रशासन का कार्य देखने वाले समुदाय से है) और शिर से ब्राह्मण (ब्राहमण का तात्पर्य ज्ञान, शिक्षा, अद्ययन-अध्यापन के कार्य में रूचि रखने वाले और रत रहने वाले बौद्धिक समुदाय से है) का अवतरण हुआ. वेदों उपनिषदों में ऐसा भी व्याख्यान आता है की हर मानव जन्म के समय बाल्यावस्था में शूद्र होता है, और मात्र अपने भविष्य के कर्मों के अनुरूप ही वह द्विज बनता है. द्विज का तात्पर्य है जिसका की दूसरा जन्म हुआ हो. यह जन्म कैसा होता है? निश्चित तौर पर वैज्ञानिक और भौतिक दृष्टि से प्रत्येक जीव का जन्म मात्र एक बार ही होता है. परन्तु यहाँ दूसरे जन्म का तात्पर्य है ज्ञान प्राप्त करने से और मोक्ष की दिशा में अग्रसर होने से है. जब कोई मानव जन्म लेता है तो वह पूर्णतया अज्ञानी होता है और बाल्यावस्था में पांच वर्ष तक मात्र उसके पूर्व जन्मों के संचित कर्म ही उसके साथ रहते हैं. परन्तु वह जन्म लेने के बाद कैसे संस्कार प्राप्त करता है, किस परिवेश में पलता-बढ़ता है, कैसी शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करता है उसके अनुरूप जाकर वह व्यापारी, योध्या, अथवा ज्ञानी बनता है. इसी को दूसरा जन्म अर्थात द्विज कहा गया है. सामान्यतया आजकल पोंगा-पंडित की भाषा में द्विज का तात्पर्य मात्र “जनेऊ संस्कार” और “गुरु मन्त्र” लेने तक ही सीमित कर दिया गया है जो उचित व्याख्या नहीं है. इस प्रकार की अधूरी व्याख्या से धर्म और शास्त्रों के प्रति भ्रम और विशंगति पैदा होती है.
 वर्ण व्यवस्था के विषय में तथाकथित मनुवादी परंपरा का विरोध करने वाले तथाकथित बुद्धिमान व्यक्ति ऐसा आक्षेप लगाते हैं कि वेदों में चार वर्णों की जो व्याख्या की गयी है उसमे शूद्र को पुरुष के पैरों और जांघ के नीचे से उत्पन्न होना बताया गया है और यह ब्राह्मणवादी पंडितों द्वारा निम्न जातिवर्ग के समुदाय को अपमानित करने की साजिश है. परन्तु यह सही धारणा नहीं है. वास्तव में वह “परम पुरुष” कोई सामान्य “पुरुष” नहीं वह “परम पुरुष” अर्थात स्वयं परमेश्वर ही है जिसके शरीर के विभिन्न भागों से चारों-वर्णों को उत्पन्न होना बताया गया है. ऐसे नास्तिक आलोचकों को यह नहीं भूलना चाहिए की बड़े से बड़े महान से महानतम तत्वज्ञानी, ब्रह्मर्षि ऋष-मुनि भी जिन “परम पुरुष” के चरण कमलों अर्थात श्रीराम और श्रीकृष्ण के चरण कमलों में अपना ध्यान लगाये रहते हैं तो क्या इसमें यह मान लिया जाय कि कोई ब्राह्मण या ब्रह्मर्षि तत्वज्ञानी क्यों उस “पुरुष” के चरणों में ध्यान लगाये जहाँ से शूद्रों की उत्पत्ति बताई गयी है. तात्पर्य यह है की यह समझाने हेतु एक रूपक मात्र है. यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक ही शक्ति “परम ब्रहम” की शक्तियों से संचालित है. देव-दानव, जीव-जंतु, चराचर, स्थावर-जंगम सब वहीँ उसी से उत्पन्न हुए हैं कहीं अन्यत्र से नहीं. और वर्ण-व्यवस्था की व्याख्या के पीछे का उदेश्य मात्र यह समझाना है की कर्म-गुण-स्वभाव तीनों के अनुरूप ही व्यक्ति मजदूर, योध्या या पंडित बनेगा. आज यदि कोई प्रधानमत्री या राष्ट्रपति यह सोचे की उसकी संतान या सम्बन्धी उसी की तरह क्यों प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं बन पाए अथवा कैसे वैज्ञानिक-प्रोफेसर की संतान वैज्ञानिक और प्रोफेसर नहीं बन पाए तो यह पत्थर में शिर फोड़ने जैसा है. आज जेनेटिक विज्ञान भी भलीभांति यह सिद्ध कर चुका है की जिस व्यक्ति में जैसे जींस रहते हैं वह वैसा ही बनता है. कुल मिलाकर अपने पूर्व-जन्म के प्रारब्ध कर्मों और अपनी किस्मत को दोष देना ज्यादा उत्तम रहेगा. इसमें वर्ण व्यवस्था बनाने वालों का कोई दोष नहीं है. यदि वैदिक काल में वर्ण-व्यवस्था नहीं होती तो सभी एक सामान होने के लिए लड़-मर जाते, चोरी-डकैती करते, और अनैतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती इस बात को वर्तमान काल में महात्मा गाँधी भी स्वीकारते हैं.
वर्ण व्यवस्था सामाजिक व्यवस्था को चलाने के लिए बनाई गयी एक अत्यंत वैज्ञानिक व्यवस्था है जैसा की आज भी बनाया जा रहा है. यहाँ तक की श्रीकृष्ण के माध्यम से अर्जुन को समझाते  हुए बताया गया है की “हे अर्जुन! काल के प्रारंभ में मैंने ही गुण-कर्म-स्वभाव के अनुरूप वर्ण व्यवस्था का निर्माण इस संसार चक्र को चलाने हेतु किया है”. ध्यान दें की श्री कृष्ण यहाँ कह रहे हैं कि वर्ण-व्यवस्था “गुण-कर्म और व्यक्ति के स्वभाव” के अनुसार बनाई गयी है न की जाति के आधार पर जैसा की सत्ता की लोलुपता वाले तथाकथित नेता आज इसको बना दिए हैं. किसी भी संस्कृति के शास्त्र-ग्रन्थ उनके उद्भव के समय की व्यवस्था बयां करते हैं. मानाकि आज समय परिवर्तित हो गया है परन्तु जो लोग वर्ण-व्यवस्था को मनुवादी बता रहे हैं क्या उनके पास आज के सांस्कृतिक-आतंकवाद का कोई जबाब है? क्या ऐसे आलोचक यह बता सकते हैं कि आज जो सम्पूर्ण विश्व में पूंजीवादी व्यवस्था अपने चरम पर है और जिसके पास धन-बल हैं रूपया-पैसा है उसे सभी सुख-सुविधा मिलती है और जिसके पास धन नहीं है वह शूद्रों से भी बदतर जीवन जीने के लिए मजबूर है? इन सबका क्या तोड़ है? हम भी ऐसे आलोचकों से पूंछना चाहते है- आज जो नक्सलवाद, मजदूर-मालिक, धनी-गरीब में संघर्ष हो रहा है उसका क्या समाधान आज की सरकारों और ऐसे आलोचकों के पास है?         
   वास्तविकता तो यही है की जो भी सामाजिक व्यवस्थाएं बनती हैं वह अपने समय की यथोचित व्यवस्था ही होती हैं परन्तु व्यवस्था बनने के उपरांत उनके दुरुपयोग की प्रथा आदि काल से चलती आ रही है. प्रत्येक समाज के कुछ स्वार्थी तत्त्व व्यवस्थाओं को आधार बनाकर अपनी रोटी सेंकने लगते हैं. और वही वर्ण-व्यवस्था के साथ भी हुआ. श्रीमद भगवद गीता और वेदों में वर्णित वर्ण व्यवस्था में कोई कमी नहीं थी मात्र कमी थी उसके सही क्रियान्वयन में.

श्रीमद भागवत कार्यक्रम में विशेष सहयोगीगण - इस सार्वजनिक कार्यक्रम के विशेष सहयोगियों में कैथा ग्राम से श्री भैयालाल द्विवेदी, बी.एस.एफ सेवानिवृत निरीक्षक बुद्धसेन पटेल, समिति सदस्य वृजभान केवट, विशेषर प्रसाद केवट, दसरथ केवट, नन्दलाल केवट, गोकुल केवट, सेवानिवृत शिक्षक भैयालाल पाण्डेय, सेवानिवृत आर्मी कैप्टन रामाधार पाण्डेय, सोरहवा निवासी हरिबंस पटेल, अरुणेन्द्र पटेल, राम नरेश पटेल, आदित्य पटेल, हिनौती से अखिलेश उपाध्याय, अश्वनी द्विवेदी, जमुई से आचार्य पंडित श्री त्रिवेणी प्रसाद उपाध्याय, दुवगमा से महेंद्र त्रिपाठी, अमिलिया से मतिगेंद पटेल, और  समिति के उपाध्यक्ष सिद्धमुनि प्रसाद द्विवेदी मुख्य सहयोगियों में से थे.    
यज्ञों की पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में दिनांक 9 अगस्त से 16 अगस्त तक  आयोजित होने वाली पापविनाशक अमृतमयी श्रीमद भगवद कथा का श्रवणपान करने के लिए आप सभी सादर आमंत्रित हैं.
|||धन्यवाद|||
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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता, एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा  (म.प्र.) पिन ४८६११७

मोबाइल नंबर – 07869992139 
















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