स्थान – कैथा, गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक:14.08.2016, दिन रविवार.
कैथा में भागवत महापुराण कथा का पांचवां दिन – श्रीमद भागवत के छठे से नौवें स्कंध का चल रहा वर्णन
विषय- भारी बारिश और प्रतिकूल प्राकृतिक दशा के वावजूद भी पावन यज्ञस्थली कैथा के श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में चल रही भागवत कथा, आज दिनांक 14 अगस्त को अजामिल, समुद्र मंथन, वामन अवतार, देवासुर संग्राम और मत्स्यावतार, मनु तथा उनके पांच पुत्रों के वंशानुचरित का वर्णन आता है.
(कैथा, रीवा) यज्ञों की पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में चल रही श्रीमद भागवत कथा के छठे से नौवें स्कंध तक की मुख्य कथा प्रसंगों में दिनांक 13 एवं 14 अगस्त 2016 दिन को आचार्य श्री चंद्रमणि प्रसाद पयासी के मुखारबिंद से अजामिल के पतित होने और उसके उद्धार की कथा, समुद्र मंथन, देवासुर संग्राम, भगवान् विष्णु के वामन और मत्स्यावतार सहित राजा मनु और उनके वंशानुचरित और उनके पाँचों पुत्रों के वंश इक्ष्वाकु वंश, निमी वंश, चन्द्र वंश, विश्वामित्र वंश, पुरु वंश, भरत वंश, मगध वंश, अनु वंश, यदु वंश, आदि का वर्णन चल रहा है. भगवान् श्रीराम के अवतार और सीता-राम के कथा प्रसंगों और उनके आदर्शों का वर्णन भी चल रहा है. समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत को जब असुरगण लेकर भागने लगे तब भगवान् विष्णु जी के मोहिनी अवतार की भी चर्चना हुई.
इस बीच पिछले कुछ दिनों से भारी बारिश के वावजूद अमृतमयी मोक्षप्रदायक श्रीमद भागवत कथा का श्श्रवण पान करने हेतु काफी संख्या में भक्त गण मौजूद रहे.
श्रीमद भागवत महापुराण के सातवें तथा आठवें को प्रभु की बांह, और नौवें को कंठ बताया गया है.
दिनांक 13 अगस्त को जहाँ मूल कथा महर्षि दधीचि के लोक कल्याण हेतु अस्थिदान का प्रसंग, अजामिल के पतित होने और मोक्ष की कथा हुई.
श्रीमद भागवत कार्यक्रम में विशेष सहयोगीगण - इस सार्वजनिक कार्यक्रम के विशेष सहयोगियों में कैथा ग्राम से बी.एस.एफ सेवानिवृत निरीक्षक बुद्धसेन पटेल, समिति सदस्य वृजभान केवट, विशेषर प्रसाद केवट, दसरथ केवट, नन्दलाल केवट, गोकुल केवट, सेवानिवृत शिक्षक भैयालाल पाण्डेय, सेवानिवृत आर्मी कैप्टन रामाधार पाण्डेय, सोरहवा निवासी हरिबंस पटेल, अरुणेन्द्र पटेल, राम नरेश पटेल, आदित्य पटेल, हिनौती से अखिलेश उपाध्याय, अश्वनी द्विवेदी, जमुई से आचार्य पंडित श्री त्रिवेणी प्रसाद उपाध्याय, दुवगमा से महेंद्र त्रिपाठी, अमिलिया से मतिगेंद पटेल, और समिति के उपाध्यक्ष सिद्धमुनि प्रसाद द्विवेदी मुख्य सहयोगियों में से थे.
अजामिल और भागवत के छठे से नौवें स्कंध की मुख्य कथा प्रसंग - दिनांक 13 एवं 14 अगस्त की कथा प्रसंगों में छठे स्कंध की कथा में अजामिल का प्रसंग का वर्णन हुआ. अजामिल एक संस्कारित ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वाला धार्मिक ब्राह्मण था. प्रातः-सायं भगवान की आरती पूजा, ऋषिओं और आगंतुकों की सेवा करने वाला व्यक्ति था. वेद-शास्त्रों का यथोचित ज्ञान था और कर्मकांड में प्रयुक्त होने वाली समस्त समिधा और फल-फूल सामग्री वह स्वयं ही जंगल में जाकर लाता था.
अजामिल का एक वेश्या के प्रेम प्रसंग में पड़ना और धर्म मार्ग से पतित होना - एक बार की बात है जब अजामिल जंगल से समिधा और पूजा के लिए फल-फूल लेकर लौट रहा था रास्ते में उसने एक युवक और स्त्री को प्रेम प्रसंग में रत देख लिया. वह प्रथमतः संस्कारवश स्वयं को उस काम-विचार से हटाने का प्रयास करता रहा परन्तु काम का आवेग प्रवल होने के कारण अजामिल ऐसा करने में असफल रहा. अजामिल बार-बार युवक-स्त्री के प्रेम प्रसंग को सोचकर अनादित होने लगा. ऐसा कृत्य अजामिल को उस स्त्री के पास खींच लाया. परिचय प्राप्त करने पर पता चला की वह स्त्री एक वेश्या थी. इस प्रकार जानते हुए भी अजामिल काम के वशीभूत हो उस स्त्री के प्रेम में इतना उलझ गया की अपनी स्वयं की भार्या को भूल उस वेश्या से नौ पुत्र की उत्पत्ति किया और दसवां पुत्र अभी उस वेश्या की कोख में ही था.
मुनियों का आगमन और अजामिल के उद्धार की प्रक्रिया – एक बार उसी गाँव में कुछ संतों का आगमन हुआ. रात होने के कारण रुकना जरूरी समझ संतों ने ग्रामवाशियों से जानकारी प्राप्त की तो ग्रामीणों ने मजाक में संतों को अजामिल के घर का रास्ता दिखा दिया. जब संत समूह अजामिल के दरवाजे पर पंहुचते हैं तो “राम नाम” की आवाज़ लगाने पर अजामिल की दूसरी पत्नी (जो पहले वेश्या थी) घर से बाहर आती है. यह सब देख वह स्त्री समझ जाती है की यदि अजामिल आ जायेगा तो मुस्किल हो सकती है इसलिए वह संतो को अनाज, बर्तन लकड़ी देकर पास ही बगीचे में भोजन बनाकर ग्रहण करने के लिए आग्रह करती है. इस प्रकार संत समूह भोजन बनाकर जैसे ही प्रसादी ग्रहण करने के लिए तत्पर होते है तो उन्हें ज्ञान होता है की यह तो एक उच्च संस्कारवान ब्राह्मण के घर का अन्न है और दुर्भाग्यवश कुसंस्कार वश अब वह पतित हो चुका है अतः संत होने के नाते हमे अजामिल के उद्धार के उपाय करने चाहिए. इस प्रकार वार्तालाप कर संत समूह अजामिल के घर आता है और उसकी पत्नी को बताता है की तुम अपने दसवें पुत्र का नाम “नारायण” रखना और संत समूह वहां से प्रस्थान कर जाते हैं.
अजामिल के दसवें पुत्र नारायण का जन्म होता है. अजामिल अपनी पत्नी और नारायण के आसक्ति में डूब जाता है. समय आता है और यमदूत अजामिल को लेने आते हैं. यमदूतों को सामने देख अजामिल अपने पुत्र “नारायण” को पुकारता है. यह सुनकर भगवान् नारायण के गण अजामिल और यमदूतों के समक्ष उपस्थित हो जाते हैं. गण यमदूतों को नारायण नाम की महिमा वखान करते है और यमदूत यमलोक जाकर सब कुछ धर्मराज को बताते हैं. ऐसा सुन धर्मराज स्वयं यमदूतों को फटकार लगते हैं और कहते हैं की जब कभी भी कोई भगवान् नारायण का नाम ले रहा हो वहां यमदूतो तुम कभी मत जाना और स्वयं भी नारायण का स्मरण करना.
अजामिल-यमदूत-नारायण प्रसंग की अध्यात्मिक विवेचना – अजामिल एक पतित ब्राह्मण था. यद्यपि अजामिल के पूर्वकर्म सात्विक और धार्मिक थे परन्तु कुसंस्कार वश अजामिल पतित हो जाता है. लेकिन उसके पूर्व शुभकर्म अंत में प्रभाव दिखाते हैं और ईश्वर अजामिल के मुक्ति का साधन बना देते हैं. समस्त जीव जो जन्म लेता है उसका शरीर त्याग सुनिश्चित है. यमदूत वह हैं जो अंत में शरीर को आत्मा से अलग कर इस नश्वर शरीर को पञ्च महाभूतों पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, और आकाश को समर्पित कर देते हैं. आत्मा अज़र, अमर शाश्वत और सनातन है. श्रीमद भगवद गीता में कहा भी गया है. “न जायते म्रियते व कदाचित नायं भूत्वा भविता व न भूयः, अजो नित्यः शाश्वतोअयं पुराणों न हन्यते हन्यमाने शरीरे” अर्थात श्रीकृष्ण जी कहते है की हे अर्जुन यह मत भूलो की तुम आत्मा हो यह शरीर नहीं और “यह आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है, यह न पहले कभी भूत में कभी जन्मी और न भविष्य में मरने वाली है, यह अज़र अर्थात जरा-रोग रहित है, यह नित्य और शाश्वत है, यह अत्यंत सनातन है, यह शरीर के नष्ट होने के बाद भी नष्ट नहीं होती”.
यमदूत हैं शरीर को आत्मा से पृथक करने वाले और जीव को उसके जीवनभर के बुरे कर्मो के फल देने वाले तत्व. नारायण के गण हैं, जीव के सत्कर्म और जीव के शुभ और भले कर्मों का फल देने वाले तत्त्व. यहाँ पर ध्यान देने की बात है की अजामिल के भी कथा प्रसंग से श्रीमद भगवद गीता के ही कर्म-फल और पुनर्जन्म के सिद्धांत को दृढ़ता दी गयी है. पिछले भी लेख में भगवान् श्री कृष्ण के द्वारा अर्जुन को कुरुक्षेत्र में भगवद गीता के ज्ञान के समय शरीर त्याग के वक्त प्राप्त होने वाले अगले जन्म के विषय में बताया गया है की अंत समय में जो व्यक्ति जिस भाव में अवस्थित रहेगा वह उसी भाव/योनी की प्राप्ति करेगा. यहाँ पर यद्यपि अजामिल एक धर्मात्मा ब्राह्मण था परन्तु पतित होने के बाद भी मात्र अपने पुत्र के नारायण नाम रखने के कारण और अपने अंतिम समय में उसी नाम के उच्चारण के फलस्वरुप भगवान् नारायण के लोक को प्राप्त होना और मोक्ष को प्राप्त करना बताया गया है. संतजनो का अजामिल और उसकी पूर्व की वेश्या पत्नी के घर आना मात्र संयोग नहीं बल्कि अजामिल के पूर्व शुभ सात्विक कर्मो का परिणाम था. इसी प्रकार उस वेश्या का संत समूह से झूंठ न बोलकर सच-सच अपने विषय में बता देना भी व्यक्ति के संगत के प्रभाव को दर्शाता है. यद्यपि वह पूर्व में व्यभिचारिणी वेश्या होते हुए भी जैसे ही अजामिल के सानिध्य में आयी वह गृहस्थ तो बनी ही साथ ही एक स्त्री-धर्म का भी पालन करने के संस्कार उस वेश्या नारी में पड़ गए और यह मात्र अजामिल (और उस वेश्या नारी के) के पूर्व के संस्कार कर्मो से हुआ. अजामिल का नारायण नाम का पुत्र प्राप्त होना, अजामिल का अपने पुत्र नारायण के प्रति अतिसय आसक्ति उत्पन्न होना और अजामिल का “नारायण” नाम के भाव में पूर्णतया दृढ हो जाना अजामिल के पूर्व कर्मों का फल और संस्कार से हुआ.
इस प्रकार यह देखा जा सकता है की प्रभु नाम की महिमा और उनकी कृपा प्राप्त करना हमारे वश में नहीं है. यह सब हमारे पूर्व जन्म के संचित शुभ और प्रारब्ध कर्मों का सम्मिलित रूप होता है. पूर्व जन्म को तो नहीं परन्तु वर्त्तमान जन्म को तो सुधारा ही जा सकता है. हिन्दू-सनातन संस्कृति की महानतम उपलब्धि और कालजयी ग्रन्थ श्रीमद भागवत महापुराण के सतत सानिध्य से हम अपने इस जन्म और साथ ही पूर्व और भविष्य के जन्मों को भी सफल बना सकते हैं ऐसा उल्लेख बारम्बार भागवत में आता है. ऐसा भी कहा गया है की किसी भी कुल में जन्म लेने वाला व्यक्ति यदि भगवत-भक्ति का मार्ग ग्रहण करता है तो वह न केवल अपना उद्धार करता है साथ ही अपने कुल के सात जन्मों पूर्व और सात जन्म आगे के वंश का भी उद्धार करता है ऐसी है ईश्वर की शरणागति. श्रीमद भागवत महापुराण जैसे कालजयी ग्रन्थ का अभ्युदय ही इस कलिकाल में अजामिल और इनसे भी अधिक पतित मानवों के उद्धार के लिए हुआ है. आवश्यकता है मात्र सम्पूर्ण समर्पण भाव से ईश्वर शरणागति की.
समुद्र मंथन और देवासुर संग्राम – श्रीमद भागवत महापुराण के आठवें स्कंध में समुद्र मंथन, देवासुर संग्राम, भगवान् के मोहिनी अवतार, और वामन अवतार की चर्चना चल रही है.
पिछले गतांक में संक्षिप्त में आये दैत्यराज बलि और भगवान विष्णु के वामन अवतार की चर्चना हुई थी. यहाँ पर समुद्र मंथन, देवासुर संग्राम और भगवान् विष्णु के मोहिनी अवतार पर ध्यान केन्द्रित किया गया है. समुद्र मंथन के कथा प्रसंग में भगवान् विष्णु के कश्यप अर्थात कछुए के अवतार का भी वर्णन आता है. भगवान् विष्णु के कई अवतारों में कछुए का भी एक अवतार महत्वपूर्ण बताया गया है. समुद्र मंथन की क्रिया एक असंभव प्रतीत होने वाली क्रिया थी. समुद्र मंथन का कार्य मात्र देवताओं या मात्र दानवों के द्वारा नहीं की जा सकती थी इसके लिए दोनों पक्षों का साथ होना आवश्यक था. ऐसा बताया गया है की मदरांचल पर्वत को मथनी, वासुकी नाग को डोरी, और भगवान् के कश्यप अवतार को मथनी का आधार बनाकर समुद्र का मंथन किया गया. समुद्र मंथन में देवों की नीति के अनुसार पूंछ का भाग देवताओं ने पकड़ा और मुख का भाग असुर-दैत्यों को पकडाया गया. इस कारण जैसे ही समुद्र मंथन प्रारंभ होता है दबाब के कारण वासुकी नाग की विषैली फुफकार से कई असुरों को मृत्यु हो जाती है. कई आख्यानों की तरह ही यहाँ भी देवताओं को नीति और चालाकी में जड़ असुरों से जय निपुण बताया गया है.
बहरहाल, समुद्र मंथन हुआ और उसमे से चौदह रत्न निकलना बताया गया है. इन चौदह रत्नों में में अमृत और विष भी निकलता है ऐसा उल्लेख आता है. ऐसा बताया गया है की जैसे ही समुद्र मंथन से घोर हलाहल विष निकला वैसे ही तीनों लोको में हलाहल का प्रभाव छा जाता है. आकाश धरती पाताल हर स्थान पर त्राहि-त्राहि होने लगती है. विष तीव्र होने के कारण उसे ग्रहण करने वाला जब कोई ग्राहक नहीं बचा तो ब्रह्मा-विष्णु सहित सब देव-दानव महाकाल शिवजी की पास जाते हैं और सृष्टि के कल्याण हेतु भगवान् शिव विष को अपने कंठ में ग्रहण कर मानवता के लिए महान त्याग करते हैं. समुद्र मंथन से प्राप्त घोर हलाहल विष को अपने कंठ में धारण करने के कारण उनका कंठ नीला पड़ जाता है इसी कारण शिवजी का नाम नीलकंठ पड़ा ऐसा उल्लेख शास्त्रों में मिलता है. तत्पश्चात अमृत को लेकर देव-दानवों में प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है और समस्या के निराकरण के लिए और अमृत के दुरूपयोग को रोकने के लिए और अमृत को अन्यायी, अत्याचारी, दुष्ट असुर-दैत्यों के हाँथ मे जाने से रोकने के लिए भगवान् विष्णु अपना मोहिनी का रूप धारण करते हैं और अमृत कलस दैत्यों से छीनकर देवताओं को देते हैं. इसी अमृत कलस के प्रकरण को लेकर और दैत्य-असुरों से भेदभाव को लेकर आगे चलकर देवासुर-संग्राम होता है. ऐसी मान्यता है की जब असुर-देवों में अमृत कलस की झड़प को लेकर प्रतिस्पर्धा होती है तो जहाँ जहाँ अमृत कलस को लेकर जाया जाता है और जहाँ जहाँ अमृत कलस छलकता है वहां वहां आज कुम्भ का मेला लगता है. हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन, नाशिक चार मुख्य जगह अमृत का छलकना बताया गया है और यहीं पर हर 12 वर्ष बाद कुम्भ का मेला लगता है. कुम्भ में विशेष मुहूर्त में स्नान-दान करने से व्यक्ति अमृत को प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त करता है ऐसी हिन्दू संस्कृति की मान्यता है.
समुद्र मंथन और देवासुर संग्राम का वैज्ञानिक दर्शन और आध्यात्मिकता – वास्तव में समुद्र मंथन है क्या? देवासुर संग्राम का अध्यात्मिक और वैज्ञानिक पहलू क्या है? इस सबको समझने का प्रयास करते है. कई अध्यात्मिक टीकाकारों का यह मत है की समुद्र मंथन वास्तव में पानी वाले समुद्र का मंथन के अतिरिक्त एक रूपक भी है. यह रूपक ऐसा है की हमारा यह मस्तिष्क समुद्र की भांति है. व्यक्ति जब कुछ सार्थक कर्म करने हेतु विचार करने का प्रयास करता है तो वह इस समुद्र रुपी मष्तिष्क का मंथन कहलाता है. जब मष्तिष्क का मंथन होता है तो उसमे भले और बुरे दोनों तरह के विचार उत्पन्न होते हैं. यह भले और बुरे विचार क्रमशः अमृत और विष हैं. भगवान् शिव रुपी जीव को विष रुपी बुरे विचारों को आत्मसात कर मात्र भले विचार और भले कृत्य ही करना चाहिए. मानव जब कोई भी शुभ कार्य करने के लिए श्रीगणेश करता है और जितने वेग से उस कार्य में आगे बढ़ता है उतनी ही वाधाएं आ सकती हैं. उन सभी विष रुपी वाधाओं को आत्मसात कर साक्षात् कर मात्र अमृत रुपी सद-उद्येश्य की प्राप्ति ही मानव का मूल उद्येश्य होना चाहिए. देव और असुर मानव मन के अन्दर ही समाहित हैं. देवासुर संग्राम हमारे मनो-मष्तिष्क में सतत चलने वाला संग्राम है जिसमे व्यक्ति भले-बुरे विचारों के मध्य युध्य में लगा रहता है, और बुरे विचारों और कर्मों पर विजय प्राप्त कर मात्र भले और शुभ कर्म ही करे यही मानव का उद्येश्य होना चाहिए. वास्तव में यदि देखा जाए तो श्रीमद भगवद गीता और श्रीमद भागवत महापुराण ग्रन्थ आज मानव के लिए प्रवंधन की दृष्टि से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. आज सामाजिक वैज्ञानिक और समाजशास्त्री भी इस बात को पूरी तरह से मानते हैं की रूपकों के माध्यम से भारतीय-हिन्दू शास्त्र ग्रंथों में जो व्याख्यान आते हैं वह मानव जीवन के प्रवंधन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, आज आवश्यकता मात्र है उसके सही और सटीक व्याख्या और समझ की. सामान्यतया आज इन ग्रंथों को मनुवादी बताकर इनकी आलोचना करने की परम्परा ज्यादा प्रबल हो गयी है और अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है. इन शाश्त्र ग्रंथों में छिपे वैज्ञानिक और अध्यात्मिक सिद्धांतों की व्याख्या कम ही हो पा रही है. आज की वर्त्तमान पीढ़ी अपने मूल संस्कृति से भटक रही है. आज हर भारतीय को आवश्यकता है इन शास्त्र-ग्रंथों में छिपे गूढ़ अध्यात्मिक-वैज्ञानिक रहस्यों के सही व्याख्या और समझ की.
यज्ञों की पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में दिनांक 9 अगस्त से 16 अगस्त तक आयोजित होने वाली पापविनाशक अमृतमयी श्रीमद भगवद कथा का श्रवणपान करने के लिए आप सभी सादर आमंत्रित हैं.
संलग्न - १) उपरोक्त लेख का MS Word और PDF फाइल. २) कार्यक्रम के कुछ फोटो ३) धर्मार्थ समिति का लोगो.
|||धन्यवाद|||
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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता, एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा (म.प्र.) पिन ४८६११७
मोबाइल नंबर – 07869992139
























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