स्थान – कैथा-गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 01.10.2016, दिन शनिवार,
कैथा के श्री हनुमान
मंदिर प्रांगण में आज नवदुर्गा घटस्थापना और बैठकी का प्रथम दिन. माँ शैलपुत्री की
हुई आराधना.
(कैथा-गढ़,
रीवा) पावन यज्ञ स्थली
कैथा के प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में आज दिनांक 01 अक्टूबर दिन शनिवार
से नवदुर्गा की बैठकी और घटस्थापना हुई. शारदेय नवरात्रि का यह पर्व पूरे 10 दिन
तक चलेगा और दिनांक 10 अक्टूबर को कार्यक्रम का समापन भंडारे और हवन के साथ किया
जायेगा. अगले दिन 11 अक्टूबर को दसहरे का पर्व मनाया जायेगा.
पावन और पुनीत नवरात्रि के नौ नवदुर्गा के
स्वरूपों का वर्णन श्रीमद देवी भागवत के इस श्लोक में मिलता है:
प्रथमं
शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति. चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति.महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति. चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति.महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।
अर्थात माँ
दुर्गा के नौ स्वरूपों में से प्रथम शैलपुत्री, द्वितीय ब्रह्मचारिणी, तृतीय
चंद्रघंटा, चतुर्थ कुष्मांडा, पंचम स्कंदमाता छठा कात्यायनी सप्तम कालरात्रि,
आठवां महागौरी और नौवां स्वरुप सिद्धिदात्री है.
घटस्थापना के साथ प्रथम दिन हुई माँ शैलपुत्री की
पूजा – दिन शनिवार एक
अक्टूबर से हुई घटस्थापना के प्रथम दिवश परंपरागत रूप से माँ शैलपुत्री की पूजा
आराधना की जाती है. माँ शैलपुत्री नवदुर्गा के नौ स्वरूपों में से एक हैं. “शैल”
का तात्पर्य होता है शिला अथवा पहाड़. पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में माता
शक्ति का प्रथम अवतरण हिन्दू धर्म शास्त्रों में बताया गया है जिसका विशिष्ट वर्णन
देवी भागवत पूरण में मिलता है. शिव महापुराण, श्री राम चरित मानस और श्रीमद देवी
भागवत पुराण सहित अन्य कई शात्रों पुराणों में ऐसा वर्णन मिलता है की जब राजा दक्ष
ने माता पारवती और भगवान् शिवशंकर को अपने महायज्ञ में आमंत्रित नहीं किया तब दक्ष
पुत्री सती ने अपमानित महसूस कर वहीँ उसी यज्ञस्थल में अपनी आहुति दे दी और शरीर
को अग्नि को समर्पित कर दिया. यह देख कर भगवान् शिव ने क्रोध में दक्ष का यज्ञ
विध्वंस कर दिया. अगले जन्म में सती हिमालय राज के यहाँ पुत्री की रूप में जन्म
लेती हैं, इसीलिए उन्हें शैलपुत्री कहा जाता है. पार्वती, शक्ति, हेमवती आदि इनके
अन्य नाम हैं. दुर्गा शहस्रनाम में इनके हजारों नाम का वर्णन मिलता है.
जो भी शाक्त और अन्य हिन्दू उपासक माता शक्ति के
प्रथम स्वरुप शैलपुत्री की उपासना विधि-विधान, पूर्ण श्रद्धा भक्ति और सात्विक
मनोभाव से करते हैं उन्हें धर्मविहित मनवांछित फलों की प्राप्ति होती है ऐसा
उल्लेख हमारे धर्म ग्रंथों में आता है. इनका वाहन वृषभ है. माँ शैलपुत्री के दायें
हाँथ में त्रिशूल और बाएं हाँथ में कमल शुसोभित है.
श्रीमद देवी भागवत महापुराण में इनकी आराधना करते
हुए कहा गया है की
वन्दे
वांछितलाभाय चंद्रार्धक्रतशेखराम !
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम !!
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम !!
शैलपुत्री माता जो
यशस्विनी हैं, जिनके
मस्तक पे आधा चन्द्र सुशोभित है, जो
वृष पे आरुड़ हैं , इच्छित
लाभ देने वाली हैं, उनकी
हम वंदना करते हैं !!
नवदुर्गा के द्वितीय स्वरूपों में दूसरे दिन माता
ब्रह्मचारिणी की पूजा आराधना अगले दिवस होगी.
असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म के विजय का पर्व
है दसहरा -
शारदीय नवरात्रि के अगले ही दिन नवमी के बाद
दसवीं अर्थात विजयदसवीं या दसहरा आता है जिसमे शास्त्रों में कई अलग-अलग वर्णन
मिलता है. एक वर्णन के अनुसार जब भगवान् श्रीराम लंकाधिपति महा आसुरी राक्षस राज रावण
का जिस दिन संहार किये थे उस विजय दिवस को विजय पर्व के रूप में भी दसहरा मनाया
जाता है. इसीलिए भारतीय संस्कृति में दसहरा की रात्रि को रावण कुम्भकर्ण और मेघनाद
के पुतले जलाने की आदिकाल से परंपरा चली आ रही है. दसहरे का पर्व धर्म की अधर्म और
सत्य की असत्य पर विजय के रूप में मनाया जाता है.
प्राचीन और मध्यकालीन राज परम्पराएँ और दसहरे पर
विजय प्रयाण –
प्राचीन और मध्यकालीन राज परम्पराओं में भी जब
कोई राजा किसी दुश्मन राजा के ऊपर चढ़ाई अथवा युद्ध करता था तो वह दसहरे का ही दिन
सुनिश्चित किया करता था ऐसी बात इतिहास ग्रंथों में आती है. ऐसा माना जाता है की नौदुर्गा
के नौ दिनों में माता शक्ति की उपासना करके उनसे शक्ति अर्जित की जाती थी और दसवें
अर्थात दसहरे के दिन उस शक्ति का प्रयोग प्राचीन राजाओं द्वारा युद्ध और बड़ी
लडाइयों में किया जाता था.
अध्यात्मिक दृष्टि से नवरात्रि काम, क्रोध,
अहंकार, मन और इन्द्रियों के निग्रह और विजय का भी पर्व है –
वास्तव में नवरात्रि की सही व्याख्या यह है कि
जहाँ सकाम उपासकों द्वारा कामना सहित भक्ति से शक्ति की उपासना की जाती है और
शक्तियां अर्जित कर धर्म विहित कार्यों में उनका उपयोग किया जाता है, वहीँ दसहरा हमारी
दशों इन्द्रियों, मन अहंकार, काम, क्रोध आदि पर विजय का भी पर्व है. जहाँ सकाम और
सांसारिक व्यक्तियों के लिए नवदुर्गा उपासना धन, वैभव, लक्ष्मी, मान -सम्मान, यश,
ऐश्वर्य और शक्ति के अर्जन का पर्व है, वहीँ पूर्ण अध्यात्मिक उपासक के लिए
नवरात्रि अपने मन और इन्द्रियों पर विजय का भी पर्व है. दसहरा का एक तात्पर्य यह
भी है की दस इन्द्रियों को हरण करने अथवा पराजित (हरा देने वाला) करने वाला. जब
जीव नवरात्रि के नौ दिनों तक कठिन व्रत उपासना करता है तो वह अपनी दशों इन्द्रियों
और मन पर नियंत्रण प्राप्त कर लेता है. इसीलिए दसहरे के दिन वह अपने भौतिक स्वरुप
पर विजय प्राप्त कर अपने आंतरिक स्वरुप अर्थात आत्मा को प्राप्त कर पाता है. अध्यात्मिक
मानव के लिए दसहरे का अर्थ श्रीराम द्वारा राक्षसराज रावण के साथ-साथ अपनी
सद्वुद्धि रुपी रथ पर सवार होकर इस आत्मा द्वारा मन, इन्द्रिय, अहंकार, काम, क्रोध,
मद, मत्सर आदि रुपी राक्षसों का वध कर विजय प्राप्ति से है, और इन आतंरिक राक्षसों
पर विजय की प्राप्ति कर धर्म और मोक्ष की प्राप्ति होती है.
अति
प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में नवरात्रि के पावन अवसर पर सजने वाले माता
के दरबार में दिनांक 01 अक्टूबर से 10 अक्टूबर तक आप सभी सादर आमंत्रित हैं.
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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता
एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा
धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट
अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा (म.प्र.) पिन ४८६११७
मोबाइल नंबर – 07869992139, 09589152587












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