स्थान – कैथा-गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 09.10.2016, दिन रविवार,
(कैथा-गढ़,
रीवा) मप्र के रीवा
क्षेत्र में यज्ञों की पावन धर्मस्थली कैथा के नाम से मशहूर अति प्राचीन श्री
हनुमान मंदिर प्रांगण में इस वर्ष की शारदेय नवरात्रि का पावन कार्यक्रम निरंतर चल
रहा है. दिनांक 09 अक्टूबर को कार्यक्रम का नौवां दिन और आश्विन
शुक्ल की आठवीं तिथि को महादुर्गा के आठवें अवतार महागौरी की पूजा अर्चना की गयी.
इस बीच भारी संख्या में माताएं, बहने और बालक-बूढ़े सभी प्रकार के भक्तों का ताँता
लगा रहा. कन्याओं द्वारा देवी गीत प्रस्तुत किये गए. क्षेत्र के पूर्व सरपंच श्री कुञ्जमणि
प्रसाद तिवारी द्वारा बहुत ही मनमोहक भजन प्रस्तुत किया गया. श्री तिवारी
शास्त्रीय गायन परंपरा में संगीत गायन में दक्ष हैं. इसके पूर्व संध्या पर भठवा-मदारी
क्षेत्र के कलाकार जिसमे मुख्य रूप से डॉ. अम्बिका प्रसाद पटेल ने शानदार देवी भजन
प्रस्तुत कर समस्त श्रोताओं का मन मोह लिया.
कुण्डलिनी चक्रों का वर्णन और मुण्डक-उपनिषद –
देखिये अथर्ववेद अंतर्गत आने वाले मुण्डक उपनिषद्
के २/१/८ मंत्र में कुण्डलिनी यज्ञ का कितना सुन्दर वर्णन आता है जिसमे ऋषि कहते
हैं की “सभी सत्यप्राणी उसी कुण्डलिनी शक्ति से उत्पन्न हुए हैं. अग्नि की सात
ज्वालायें भी उसी से उत्पन्न हुई हैं. यही सातों कुण्डलिनी चक्र ही सातों समिधाएँ
और सातों हवि हैं. इनकी प्रचंड उर्जायें उन सप्त लोकों तक जाती हैं जिनका श्रृजन
परमेश्वर ने ऊंचे प्रयोजनों हेतु किया है.”
कुण्डलिनी शक्ति के सात
केन्द्रों की भांति सात लोक भी हैं जिनका की उल्लेख श्रीमद देवी भागवत में विस्तृत
रूप से किया गया है. इन सप्त लोकों में सप्त शक्तियां भू:, भुवः, स्वः, महः, जनः,
तपः, एवं सत्य इस प्रकार समाहित बताई गयी हैं. इनके सप्त शक्तियों के वर्णन क्रमशः
– भू: - धरती या पृथ्वी, भुवः में वायु, स्वः में तेजस, महः में महानता, जनः
में जन समुदाय, तपः में तपश्चर्या, एवं
सत्य में वाक् सिद्धि के रूप में आते हैं.
या पिंडे सः ब्रह्मांडे -
मानव का शरीर एक यज्ञस्थल-धर्मस्थल है. मानव शरीर
एक मंदिर है जिसमे आत्मा रुपी ईश्वरीय शक्ति स्थित है. इस मानव शरीर में स्थित
मूलाधार चक्र को भूलोक और सहस्रार को सूर्य लोक की उपमा दी गयी है. जहाँ भूलोक सत्य
और निष्ठापूर्वक कर्त्तव्य कर्म और सत्कर्म का प्रतीक है वहीँ सूर्य लोक अथवा
सूर्य का तेज प्रतीक है परम शक्ति का – परम ब्रह्म परमेश्वर का, क्योंकि गायत्री
मन्त्र में जिस सावित्री देवता की उपासना का मन्त्र का वर्णन आता है उसमे सूर्य की
ही प्रधानता है. जब भी तेजस्विता और प्रकाश और ज्ञान का उल्लेख आता है तब सूर्य का
नाम आता है.
पृथ्वी और सौर ऊर्जाओं के सामंजस्य से ही चलता है
संसार -
अनंत सूर्यों के प्रकाश स्वरुप सहस्रार चक्र या
ब्रह्मरंध्र से पृथ्वी रुपी मूलाधार चक्र को ऊर्जा मिलती है. इस ऊर्जा सप्लाई का
काम मेरुदंड के मध्य से होता है जिसके आसपास और मध्य में अति सूक्ष्म रूप में अन्य
पांच चक्र जो मूलाधार और सहस्रार के अतिरिक्त हैं अवस्थित होते है. जिस प्रकार
सूर्य के प्रकाश के ही फलस्वरूप पृथ्वी में जीवन चलायमान है यदि सूर्य का प्रकाश
और इसकी ऊर्जा समाप्त हो जाए या अवरुद्ध हो जाए तो पृथ्वी पर जीवन यापन भी अवरुद्ध
हो कर सब बर्फ के गोले की तरह जम जायेगा उसी प्रकार ब्रह्मरंध्र अथवा सहस्रार से
निकलने वाली अनंत ऊर्जा से ही हमारे सभी अंग और शरीर चलायमान होते हैं. इस
सिद्धांत को समझ कर अंततः उस ऊर्जा के परम स्रोत ब्रह्मरंध्र में पंहुच कर उस परमशक्ति
से एकाकार होना ही मानव जीवन का मूल उद्येश है. क्या मेरुदंड में समस्या पैदा होने
अथवा रीढ़ की एक भी गोटी अव्यवस्थित होने पर कोई मानव चल सकता है? क्या वह जीवन
यापन कर सकता है? संभवतः नहीं जब तक की रीढ़ को दुरुस्त न किया जाये. इसी आख्यान से
समझा जा सकता है की मेरुदंड और रीढ़ में स्थित कुण्डलिनी चक्रों का कितना विशेष
महत्व हो सकता है.
मानव का आतंरिक स्वरुप ही है अर्धनारीश्वर का -
जहाँ मूलाधार नारी तत्त्व का बोधक है वहीँ
सहस्रार या ब्रह्मरंध्र नर तत्त्व का बोधक है. प्रकृति में जन्म लेने के कारण कई
कर्मों में से एक महत्वपूर्ण कर्म है नर-नारी का संयोग. वास्तव में जिस प्रकार धर्मविहित
प्रजनन और संसार चक्र के चलायमान रखने हेतु नर-नारी संयोग होता है वैसे ही
ईश्वरीय, और अध्यात्मिक शक्तियों की प्राप्ति हेतु मूलाधार चक्र का सहस्रार के साथ
संयोग आवश्यक है. क्योंकि जहाँ सुप्त कुण्डलिनी यदि मूलाधार में ही पड़ी रही तो
व्यक्ति निष्क्रिय और तामसी प्रकृति का बनकर पशुवत जीवन यापन करता रहता है और ऐसे
मानव एवं पसु में कोई भिन्नता नहीं होती है क्योंकि आहार, निद्रा, भय और मैथुन तो
मानव और पशुओं में एक सामान ही होते है और यदि कोई गुण जो मानव को पशुओं से अलग
करता है तो वह है बौद्धिक या अध्यात्मिक शक्तियां. और वह अध्यात्मिक शक्ति तब तक
जागृत नहीं हो सकती जब तक की मानव मूलाधार से उठकार सहस्रार तक नहीं पंचुचता.
वास्तव में यदि मनुष्य की एनाटोमी की जाए और आज
की डाक्टरी भाषा में चीड़-फाड़ की जाये तो नसों, नाड़ियों के गुच्छों के अतिरिक्त शायद
इन सांसारिक डाक्टरों को मेरुदंड के आसपास कुछ हासिल नहीं होगा परन्तु यह समझना
चाहिए की कुण्डलिनी के सात चक्र कोई दृश्य वस्तु नहीं हैं यह ऊर्जा के केंद्र
विन्दु हैं और ऊर्जा के प्रवाह को बताते हैं. पहले भी जिक्र आया है की जिस प्रकार
सूक्ष्म कणों जैसे बोसॉन अथवा गॉड-पार्टिकल को नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता
वैसे ही इन सूक्ष्म ऊर्जा के केन्द्रों पर जब सूक्ष्म बुद्धि से ध्यान केन्द्रित
किया जाता है तभी इनको समझा जा सकता है.
नवरात्रि पर्व है संयम, योग, साधना और आतंरिक शक्तियों
को जागृत करने का -
जब मानव काम वासना की अति कर देता है और सांसारिक
भोग विलास में ही रात-दिन लगा रहता है तो उसका जीवन पशुवत है. ऐसे मानव का होना पसु
के समान है. पृथ्वी तत्त्व का प्रतीक मूलाधार चक्र इसीलिए गुदा के पास बताया गया
है क्योंकि जननेद्रियों के माध्यम से जो असीम और श्रृष्टिकारक ऊर्जा भोग-विलास के
माध्यम से प्रवाहित हो नष्ट जाती है उसे जब रोककर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए
मानव उसे कुण्डलिनी योग के माध्यम से ऊर्ध्व गमन करवाता है, अर्थात जब वह
ऊर्ध्वरेतस हो जाता है, और एक-एक करके चक्रों से होते हुए यह ऊर्जा मानव मष्तिष्क
में पंहुचती है और सहस्रार में पंहुचती है तब मानव में अभूतपूर्व अध्यात्मिक और
परलौकिक शक्तियां आती है. यह सब ऊर्जा और शक्ति का ही खेल है इसलिए नवरात्रि में
जहाँ शक्ति की उपासना होती है वह वही कुण्डलिनी शक्ति ही है और सब कुछ इसी में
समाहित है अन्यत्र कहीं से नहीं आएगी. इसी परमशक्ति की खोज का ही पर्व है
नवरात्रि. आइये उस परमशक्ति को अपने शरीर के भीतर ही खोजें और प्राप्त कर अमरता को
प्राप्त करें और उस परमब्रह्म परमेश्वर से एकाकार हो जाएँ. क्योंकि अपनी बिखरी हुई
शक्तियों को एकत्रित किये बिना न तो हमे शांति मिल सकती और न ही मोक्ष.
नवदुर्गा
के आठवें स्वरुप महादेवी महागौरी की पूजा है असीम फलदायक – नवरात्रि
के नौ दिनों में आठवें दिन महागौरी की पूजा आराधना का दिन है. देवी पुराण, शिव
पुराण सहित अन्य हिन्दू धर्म ग्रंथों में इनका वर्णन आता है. शिव पुराण में ऐसा
वखान आता है की मात्र आठ वाढ की ही आयु में माता भवानी पार्वती जी ने भगवान् शिव
की आराधना की और उनकी तपश्या में निरंतर कई वर्षों तक लगे रहने से उनका श्वेत वर्ण
में कालिमा आ गयी. वह कालिमा निरंतर तप करते रहने से आयी. भगवान् शिव पार्वती जी
की तपश्या से अति प्रसन्न हुए और मन जाता है की उन्हने अपने शिर में धारण की हुई
गंगा नदी को प्रवाहित कर उनके शरीर को धोया और देवी का शरीर अत्यंत श्वेत वर्ण हो
गया तभी से उनका नाम महागौरी पड़ा ऐसा वर्णन आता है. जहाँ महागौरी रुपी परम शक्ति
प्रकाश उल्लास और तेज का प्रतीक है वहीँ महाकाली का स्वरुप तम, प्रलय, और संहार की
प्रतीक हैं. महाकाली स्वरुप में देवी भवानी साधक के अहंकार, काम, क्रोध, मोह,
ईर्षा, द्वेष, मद, मत्सर आदि रुपी तामसिक प्रवृत्तियों को नष्ट कर दुर्गुणों का
संहार करती हैं और स्वयम अपने अन्दर समाहित कर लेती हैं क्योंकि महाकाली महान सागर
का प्रतीक हैं जब इस श्रृष्टि में अन्धकार ही व्याप्त था न तो सत् था और न ही असत.
इस प्रकार वह साधक भक्तों के सभी दुर्गुणों को समष्टि में समाहित कर देती हैं जहाँ
पर सभी प्रकृति के गुण स्वयं भी अपना अश्तित्व खो देते हैं. इस प्रकार साधक भक्तों
में प्रकाश और उल्लास भरकर वह साधकों को अपने अगले स्वरुप महागौरी के रूप में
प्राप्त होंती हैं. महाकाली और महागौरी दोनों दी देवी शक्ति के स्वरुप अत्यंत ही
फलदायक होते हैं.
महागौरी के स्वरुप का चित्रण -
महागौरी के स्वरुप के
चित्रण में उन्हें श्वेतवरण धारण किये हुए वृषभ पर आरूढ़ बताया गया है. उन्हें
चतुर्भुजी माता के रूप में वृषभ सहित कमल पर आरूढ़ बताया गया है जिनका दायाँ ऊपरी
हाँथ वर मुद्रा में, और नीचे का हाँथ त्रिशूल से शुसोभित है. बाएं ऊपरी हाँथ में
डमरू और निचला हाँथ अभय मुद्रा में है. माता महागौरी के ध्यान आराधन से ललाट के
ऊर्ध्व में स्थित सहस्रार का उपचक्र जिसे शाक्त उपासक “सोमचक्र” कहते हैं वह जागृत
होता है. सांसारिक दृष्टि से माता महागौरी की उपासना से भक्तों को संकट से मुक्ति
मिलती है और श्री, समृद्धि, धन संपत्ति की वृद्धि होती है. श्वेत वर्ण शांति,
सहजता, प्रकाश की निसानी होने से साधक गण सोमचक्र अर्थात चन्द्रमा जैसी सीतलता
वाले चक्र पर ध्यान केन्द्रित कर चन्द्रमा जैसे ही असीम शांति का अनुभव करते हैं.
अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा में
नवरात्रि का यह पावन और ऐतिहासिक कार्यक्रम निरंतर चल रहा है जिसका दिनांक 10
अक्टूबर को हवन और भंडारे के साथ समापन होगा.
नवदुर्गा के महागौरी के स्वरुप का ध्यान
मन्त्र –
वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम्॥
पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्।
वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर किंकिणी रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वाधरां कातं कपोलां त्रैलोक्य मोहनम्।
कमनीया लावण्यां मृणांल चंदनगंधलिप्ताम्॥
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम्॥
पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्।
वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर किंकिणी रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वाधरां कातं कपोलां त्रैलोक्य मोहनम्।
कमनीया लावण्यां मृणांल चंदनगंधलिप्ताम्॥
अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा में
शारदेय नवरात्रि के इस विशेष आयोजन में आप सभी सादर आमंत्रित हैं.
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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता
एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा
धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट
अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा (म.प्र.) पिन ४८६११७
मोबाइल नंबर – 07869992139, 09589152587







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