स्थान – कैथा-गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 02.10.2016, दिन रविवार,
(कैथा-गढ़,
रीवा) क्षेत्र के पुण्य
और पावन हिन्दू धर्मस्थल कैथा के प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में नवरात्रि
की बैठकी के साथ कल दिन शनिवार से दुर्गोत्सव प्रारंभ हुआ जिसमे माता शैलपुत्री की
पूजा अराधना की गयी.
देवी दुर्गा के द्वितीय स्वरुप का ध्यान मन्त्र –
वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखराम्।
जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गां
त्रिनेत्राम।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥
परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि
नितम्बनीम्॥
देवी ब्रह्मचारिणी श्वेत वरण धारण किये हुए अपने
दायें हाथ में माला और बाएं हाँथ में कमंडल धारण किये हुए हैं. दांये हाँथ में माला
और बाएं हाँथ में कमण्डल जप-तप की निशानी मानी जाती है.
“तत्वमसि” की व्याख्या और बालक महर्षि संवाद –
नवरात्रि के नौ दिवस के विषय में जैसा की गतांक
में वर्णन आया है की यह मानव के अध्यात्मिक उद्भव का समय होता है. इस मायारुपी
संसार सागर में पड़ा जीव इस संसार को ही सब कुछ मानने लगता है और यही इस माया की
विशेषता भी है. इस संसार में जो भी जीव आता है वह इसमें इतना रम जाता है की न तो
वह अपना पूर्व-जन्म और न ही अगले प्रयाण के विषय में विचार करता है. जबकि यह अटल
सत्य है की जो भी इस जगत में आया है उसे जाना ही पड़ेगा. जगत में ज धातु और गत धातु
आती है. “ज” का तात्पर्य जन्म से और “गत” का तात्पर्य “जाने” अर्थात “मृत्यु” से
है. कौन आता है और कौन जाता है? आत्मा तो अज़र, अमर, साश्वत, और सनातन है वह तो न
जन्मी है और न ही उसकी मृत्यु होनी है. वह अनंत शुद्ध चैतन्य स्वरुप है. पर जब
परमेश्वर नवश्रृष्टि के समय अपने इस माया का खेल रचते हैं और अपने स्वयं के स्वरुप
इस आत्मा को संसार के खेल में उलझा देते हैं तो वह स्वयं भी अपने आपको भूल जाते
हैं. मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम त्रेता युग की अवतारी लीला में इतना उलझ
गए की वह स्वयं भी भूल गए की उन्हें भी इस मृत्युलोक से प्रयाण करना था. जब उन्हें
याद आया तो महाकाल का आवाहन किया. जब काल उपस्थित हुआ तो श्रीराम जी ने स्वयं कहा
की स्वयं हमी ने तो आपको बुलाया है और अब हमारी लीला के अंत का समय आ गया है. आत्मा
कुछ और नहीं उसी परम ब्रह्म परमेश्वर का अभिन्न हिस्सा है. बल्कि यहाँ तक कहें की
श्रुति ग्रन्थ वेद और वेदांत तो यह कहते हैं की – “तत्वमसि”. संस्कृत में “तत” का
तात्पर्य है “वह”, “त्वं” का अर्थ है “आप, तू या तुम” और “असि” का अर्थ है “हो या
है” अर्थात “तत्वमसि” का तात्पर्य है कि “वह ब्रह्म तुम स्वयं हो”. वेदांत और
अरण्यक ग्रंथों में एक आख्यान ऐसा आता है की एक बार एक बालक एक ऋषि के समक्ष जाता
है और वह बड़ी ही उत्सुकता के साथ महर्षि से पूंछता है की मुनिदेव कृपया बताने का
कष्ट करें की जिसकी आप हम और सभी धर्मार्थीजन ध्यान पूजा आराधना करते हैं वह है
कौन? वह कहाँ है? जिसे आप परमेश्वर अथवा ब्रह्म कहते हैं क्या आपने उसको देखा है?
कैसा है वह ब्रह्म? इस प्रकार सुन महर्षि बड़े ही सहज भाव से बालक को जबाब देते हैं
की “तत्वमसि” अर्थात “वह तुम हो”. तात्पर्य की “वह परम ब्रह्म परमेश्वर तुम स्वयं
हो”. यह सुन बालक आश्चर्य में पड़ जाता है की यह महर्षि क्या बोल रहे हैं? वह बालक
अपने आपको देखता है तो वह तो चमड़ी, मांस, हड्डी का एक समूह है जिसमे स्थित प्राण
से वह चलायमान मात्र है. अतः वह ब्रह्म कैसे हो सकते है. क्योंकि महर्षि और संतगण
जिस ब्रह्म का निरंतर ध्यान करते हैं उस ब्रह्म के गुणों में तो सत्, चित, आनंद,
निराकार, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, अनंत, चैतन्य स्वरुप बताया गया है, और यहाँ कैसे यह
मुनिदेव कह रहे हैं की “वह ब्रह्म स्वयं तुम हो”.
ऐसा प्रश्न आने पर दयालु ब्रह्मज्ञानी महर्षि उस
जिज्ञासु बालक को अपने पास बुलाते हैं और प्यार से कहते हैं की हाँ ऐसा ही है. पर
उस “तत्वमसि” की अनुभूति के लिए हे बालक तुम्हे हमारे सानिध्य में कम से कम पांच
वर्ष तक रहना पड़ेगा. बालक जिज्ञासु था अतः वह महर्षि का आदेश सहर्ष ग्रहण कर उनके
सानिध्य में रहने के लिए प्रतिबद्ध हो जाता है. और पांच वर्ष व्यतीत होने के कुछ
वर्षों पहले ही वह जिज्ञासु बालक उन महर्षि के परम प्रिय शिष्यों और वेदांत
ज्ञानियों में से एक बन जाता है.
आखिर ऐसा क्या ज्ञान उन महर्षि ने उस बालक को कुछ
ही वर्षों में दिया की उस बालक ने उस परम तत्व को समझ लिया?
छान्दोग्य उपनिषद् में विरोचन और इंद्र का
प्रजापति के समक्ष तत्वमसि की शिक्षा लेना
छन्दोग्य उपनिषद में “तत्वमसि” के वर्णन में एक
और भी रुचिकर और मूल कथानक आता है जिसमे देवराज इंद्र और राक्षसराज विरोचन प्रजापति
जी के पास जाते हैं और उनसे निवेदन करते हैं की आपने “उस अज़र अमर, सर्वव्यापी
आत्मा” की जो बात कहीं है उसे हम जानना समझना चाहते हैं. तब प्रजापति इंद्र और
विरोचन दोनों को 32 वर्षों तक उनके सानिध्य में रहने और शिक्षा प्राप्त करने के
लिए कहते हैं. इंद्र और विरोचन दोनों आचार्य जी की बात मान लेते हैं. 32 वर्षों
बाद भी जब प्रजापति उनको कहते हैं की “वह जो सभी की आँख में प्रकाश और तेज़ स्वरुप
दृष्टिगोचर हो रहा है और जो कभी मृत्यु अथवा जन्म को प्राप्त नहीं करता और जो सदैव
अभय है वही तुम हो”.
सद्बुद्धि रुपी रथ पर सवार हो मन और इन्द्रियों
के निग्रह से मिलगा “तत्वमसि”
ऐसा सुनकर दोनों आईने के पास जाकर देखते हैं तो
इंद्र अपने तर्क और कुशाग्र बुद्धि से समझ पाते हैं की सबसे प्रथम आईने में दिखने
वाला यह शरीर और दशों कर्मेन्द्रियाँ हैं जो नष्ट होने वाली और जरा अर्थात बुढ़ापा को
प्राप्त होने वाली हैं अतः यह आत्मा नहीं हो सकती. जब इंद्र शरीर से ध्यान हटाकर
अपने दशों ज्ञानेन्द्रियों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं तो अपनी बुद्धि से समझते
हैं की स्वाद, स्पर्श, घ्राण, दृष्टि आदि भी वह अविनाशी आत्मा नहीं हो सकती
क्योंकि शरीर के नष्ट होते ही ज्ञानेद्रियाँ भी नष्ट होने वाली हैं. अगले तर्क में
इंद्र मन पर ध्यान केन्द्रित करते हैं और समझते हैं की मन तो वायु से भी ज्यादा
सहस्रों गुना तेज है. वह तो क्षण मात्र में कहीं भी पंहुच जाता है और जिस दिशा में
इन्द्रियां इस मन को ले जाती हैं हवा के तीव्र झोंको की तरह मन उसी दिशा में चला
जाता है. और यह मन तो चलायमान हैं. प्रजापति ने जिस आत्मा की परिभाषा बताई है वह
तो सर्वत्र व्याप्त सर्वत्र समरूप है परन्तु मन तो सर्वत्र समान और एक जैसा नहीं
रहता अतः मन भी आत्मा नहीं हो सकता. इसी प्रकार बुद्धि पर ध्यान केन्द्रित करते
हैं और वहां भी पाते हैं की बुद्धि भी चलायमान है परन्तु बुद्धि से मन और
इन्द्रियों को नियंत्रित किया जा सकता है. अतः बुद्धि भी मन और इन्द्रियों से तो
श्रेष्ठ है परन्तु यह भी अविनाशी है क्योंकि शरीर और मन के नष्ट होने पर बुद्धि भी
नष्ट हो जाती है. क्योंकि जब मृत्यु के पश्चात वह आत्मा यदि कर्मफल और पुनर्जन्म के
सिद्धांत के आधार पर अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के आधार पर नवीन शरीर ग्रहण करती
है तो उसके पूर्व जन्म की यादें जो उसकी बुद्धि से प्राप्त होती हैं वह भी नष्ट हो
जाती हैं अतः बुद्धि भी आत्मा नहीं हो सकती. इस प्रकार इंद्र एक के बाद एक अपने
कुशाग्र बुद्धि और तर्कशक्ति से निग्रह करते हुए उस आत्मतत्व को समझ पाते हैं की
वास्तव में प्रजापति जी ने जो बात आत्मा के विषय में कही है अर्थात “तत्वमसि” वह सत्य
है. परन्तु इसको प्राप्त करने के लिए जीव को इन्द्रियों, मन, अहंकार, बुद्धि आदि से
परे जाना पड़ेगा तभी वह “उसे” प्राप्त कर सकता है.
“तत्वमसि” की प्राप्ति प्रकृति के तीनों गुणों
तम, रज और सत्व से भी परे जाने से होगी
वहीँ दूसरी तरफ राक्षस विरोचन तामसिक, दुष्ट और
जड़ बुद्धि होने के नाते प्रजापति जी के “तत्वमसि” के सिद्धांत और तत्वज्ञान को
नहीं समझ पाया. वह अपने अहंकार में डूबा रहा. उसने अपने स्वाभाविक राक्षस
प्रवित्तिवश, सात्विक मार्ग नहीं अपनाया और अपने तामसिक प्रवृत्ति जिसमे मद्यपान,
मांस भक्षण और अनैतिक-अधार्मिक कृत्यों में ही पड़ा रह गया अतः उसकी बुद्धि भी
तामसिक आर अहंकारी प्रवृत्ति की बनी रह गयी. सांख्ययोग में प्रकृति के तीन गुणों
में से तम, रज और सत्व हैं इस प्रकार बताया गया है. जब तक जीव अपने तामसिक प्रवृति
से उठकर सत्व की तरफ नहीं जाता तब तक वह उस “तत्वमसि” वाले आत्मज्ञान की दिशा में
अनुभूति नहीं कर सकता. क्योंकि “तत्वमसि” की प्राप्ति तो “गुणातीत” और “अवस्थातीत”
होने के बाद ही प्राप्त की जा सकती है. गुणातीत का तात्पर्य है प्रकृति के तीनों गुणों
सत्व-रज-तम के परे जाना और अवस्थातीत का तात्पर्य है जागृति, स्वप्न और
सुप्तावस्था के भी परे जाना.
माण्डुक्य उपनिषद् और “अवस्थातीत” होकर जीव का
तुरीय अवस्था की प्राप्ति करना
वेदांत ग्रंथों में प्रसिद्ध माण्डुक्य उपनिषद्
में एक बहुत ही सुन्दर आख्यान आता है जिसमे उस “तुरीय” अर्थात चतुर्थ अवस्था की
बात बताई गयी है. कुल बारह श्लोक वाले माण्डुक्य उपनिषद के सातवें श्लोक/मन्त्र
में कहा गया है की “...शिवम् शान्तं अद्वैतं, चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः”
अर्थात “वह जो शांत, कल्याणकारी, द्वैतभाव से परे अद्वैत है, और जो चतुर्थ अवस्था
मानी गयी गई है अर्थात वह जो तुरीय अवस्था या आत्मा है वह सभी के लिए जानने योग्य
है”. अतः अहंकार बस विरोचन ने स्वयं अपने
नश्वर शरीर को ही वह आत्मा और ब्रह्म समझ लिया. इस प्रकार यह समझकर अहंकारवश उसने
अपने बाह्य और भौतिक शरीर को ही ब्रह्म समझ कर उसका दुरुपयोग अनैतिक और अधार्मिक कृत्यों
में किया और पतित ही बना रहा. और इस जन्म मृत्यु रुपी संसार सागर रुपी नरक में ही
पड़ा रह गया.
नवदुर्गा का द्वितीय स्वरुप है तपस्विनी ब्रह्मचारिणी
देवी का
नवदुर्गा के नौ स्वरूपों में से प्रथम माता
शैलपुत्री की पूजा के पश्चात आज नवरात्रि का दूसरा दिवस तप की देवी ब्रह्मचारिणी
माता के पूजा आराधना में केन्द्रित रहेगा. कुण्डलिनी योग में जहाँ नवरात्रि के
प्रथम दिवस में मूलाधार चक्र पर योगी तपस्वीजन ध्यान केन्द्रित करते हैं वहीँ दूसरे
दिवस स्वाधिष्ठान चक्र पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है. स्वाधिष्ठान चक्र में
ध्यान अवस्थित कर तप-योग करने वाले योगी और साधक माता की कृपा और भक्ति प्राप्त कर
संसार सागर के दुःख कष्ट से मुक्ति की दिशा में अग्रसर होते हैं.
कठोर तप का आचरण करने से तीनों लोकों में मच गया हाहाकार,
देवी का नाम पड़ा ब्रह्मचारिणी
माता के नौ स्वरूपों में देवी ब्रह्मचारिणी को तप
की देवी कहा जाता है. शिवपुराण और अन्य शास्त्रों में ऐसा वखान आता है की हिमालयराज
और मैना देवी के घर पुत्री रूप में प्रकट होने वाली माता पार्वती का अगला स्वरुप
ब्रह्मचारिणी उनकी नारद मुनि के कहने पर भगवान् शिव की कठोर तपस्या करने के बाद
पड़ा. मुनि के मार्गदर्शन के बाद एक हज़ार वर्ष तक देवी ने मात्र फलाहार पर और अगले
सौ वर्षों तक मात्र शाक ग्रहणकर, तत्पश्चात अगले तीन हज़ार वर्षों तक मात्र सूखे
बेलपत्र ग्रहण कर खुले आसमान, तीव्र धूप, वर्षा, तूफान, में तपस्चर्या की और इसके
बाद भी कई हज़ार वर्षों तक फल, जल, सूखे हरे सभी पत्ते भी त्याग कर कठिनतम व्रत
किया. इतनी घोर तपस्या करने के कारण ही उन्हें “तप का आचरण करने वाली” अर्थात “ब्रह्मचारिणी”
नाम पडा. देवी पार्वती का एक और नाम “अपर्णा” तप के दौरान पत्ते भी त्याग देने के
कारण पड़ा. निरंतर तप करने और उनके शरीर में मात्र हड्डी शेष देख माता मैना ने दुःखवश
“उमा” अर्थात “अब और नहीं” ऐसा सब्द उच्चारित किया इसीलिए उनका नाम उमा भी पड़ा ऐसा
इतिहास ग्रंथों में वखान आता है. अंत में देवी पार्वती के घोर तप से तीनों लोकों
चौदह भुवनों में हाहाकार मच गया. जीव-जंतु, देव, मानव, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सब पुण्यवान
महसूस करने लगे. तब ब्रह्मा जी प्रकट होकर देवी पार्वती के समक्ष आकर उन्हें
मनोवांछित वरदान देते हैं और विधि अनुरूप लोक-कल्याण और शिव-लीला हेतु भगवान् शिव
प्रसन्न होकर माता पार्वती को अपनी अर्धांगिनी स्वीकारते बनाते हैं.
देवी
भागवत पुराण और शिव महापुराण समेत कई हिन्दू धर्म ग्रंथों में ऐसा वर्णन आता है की
देवी दुर्गा का यह दूसरा स्वरुप अनंत पुण्य फल देने वाला है. इनकी उपासना से मानव
में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम और धर्म परायणता की वृद्धि होती है. जीवन के
कठिनतम संघर्षों में ऐसा साधक योगी पुरुष अपने कर्त्तव्य पथ पर अविचल रहता है.
अति
प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में नवरात्रि के पावन अवसर पर सजने वाले माता
के दरबार में दिनांक 01 अक्टूबर से 10 अक्टूबर तक आप सभी सादर आमंत्रित हैं.
|||धन्यवाद|||
-----------------
शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता
एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा
धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया,
थाना गढ़,
जिला रीवा (म.प्र.) पिन ४८६११७
मोबाइल नंबर – 07869992139, 09589152587









No comments:
Post a Comment