स्थान – कैथा-गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 07.10.2016, दिन शुक्रवार,
(कैथा-गढ़, रीवा) अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा में
नवरात्रि का यह पावन और ऐतिहासिक कार्यक्रम निरंतर चल रहा है जिसका दिनांक 10
अक्टूबर को हवन और भंडारे के साथ समापन होगा.
दिनांक 07 अक्टूबर 2016 को अश्विन शुक्ल की छठी तिथि को भवानी के छठे अवतार
माँ कात्यायनी की पूजा अर्चना की गयी. प्रातः काल से शक्ति के आराधक माताएं, बहने
और अन्य साधकगण श्री हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा में एकत्रित हुए और विधि-विधान से माँ
शक्ति की पूजा अर्चना की. कुछ साधक भक्तगण आज नवदुर्गा की बैठकी के अनुसार सातवाँ
दिन मानकर माँ भवानी के सप्तम अवतार माँ कालरात्रि की भी आराधना की जो उतना ही
अधिक फलदायी है.
नवदुर्गा के छठे अवतार कात्यायनी देवी का ध्यान
मन्त्र –
वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥
स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पञ्वाधरां कांतकपोला तुंग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम॥
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥
स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पञ्वाधरां कांतकपोला तुंग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम॥
प्राचीन भारतीय संस्कृति में बताये गए मुक्ति के
कई मार्ग -
हिन्दू-सनातन धर्म में चार पुरुषार्थ बताये गए
हैं. अर्थ, काम, धर्म, मोक्ष यह चार पुरुषार्थ की धर्मविहित प्राप्ति कर मोक्ष की
प्राप्ति ही मानव जीवन का मूल उद्येश्य है. अर्थ – अर्थ का संस्कृत में एक तात्पर्य
होता है धन से. अर्थपूर्ण धन की प्रप्ति मानव जीवन जीने के लिए अति आवश्यक है.
धर्मविहित कार्यों में रत रहकर जीवन यापन हेतु सत्य, धर्म का पालन करते हुए
एकत्रित धन ही हिन्दू-सनातन धर्म में मान्य है. अनीति, अधर्म, अत्याचार पूर्वक
एकत्रित धन पाप की संज्ञा में रखा गया है. इसी प्रकार काम – का तात्पर्य कामनाओं
की पूर्ति से होता है. कैसी कामनाएं होनी चाहिए? कौन सी कामनाएं सही हैं और कौन सी
गलत? वैदिक धर्म के मत अनुसार वास्तव में मानव जीवन का मूल उद्येश्य कामनाओं पर
विजय प्राप्त करना है क्योंकि यह कामनाएं हमारे मन-मष्तिस्क में जब तक जीवित
रहेंगी तब तक जन्म-मृत्यु और पुनर्जन्म का खेल चलता रहेगा. श्रीकृष्ण जी ने श्रीमद
भगवद गीता में कहा है कि अवचेतन मन में शेष कामनाएं ही हमे पुनर्जन्म हेतु मजबूर
करती हैं. क्यूंकि इन्ही कामनायों की पूर्ति हेतु ही आत्मा नित नया शरीर धारण करती
है और यह जन्म-मृत्यु का चक्र चलता रहता है. पर क्या वास्तव में इस भौतिक संसार
में पूरी तरह से कामनायों से मुक्त हुआ जा सकता है? ऐसा प्रश्न जब अर्जुन ने श्रीकृष्ण
जी से पूंछा तो उन्होंने जबाब दिया की कामनायों पर विजय प्राप्त करना मानव और
देवताओं सभी के लिए अति दुष्कर कार्य है. ऐसे विरले ही होते हैं जो कामनायों पर
विजय प्राप्त कर पायें और फिर ऐसे महापुरुष ब्रह्म ज्ञानी बन जाते हैं. परन्तु
कामनायों पर विजय प्राप्त करने के सन्दर्भ में श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन से कहा की
हे कौन्तेय! तू सभी कर्मों को तटस्थता के भाव से कर और सभी कर्मों को मुझे अर्थात
ईश्वर को समर्पित कर दे. ऐसा करने से तू कर्म और उससे प्राप्त होने वाले फलों से
मुक्त हो जायेगा. क्योंकि ईश्वर को समर्पित कर किया जाने वाला कर्म सभी बन्धनों से
मुक्त होता है.
सम्पूर्ण समर्पण के भाव से धर्मविहित कामनायों
की पूर्ति करते हुए जीवन यापन करने वाला व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी बनता है इस
प्रकार वखान हिन्दू-वैदिक संस्कृति के कालजयी धर्म ग्रन्थ श्रीमद भगवद गीता में
आता है. सनातन सस्कृति में मोक्ष या मुक्ति के कई मार्ग हैं. वैदिक-दर्शन में
मुख्य स्थान प्राप्त करने वाले प्रमुख षड-दर्शनों अर्थात छः दर्शन-शास्त्रों में
छः मुक्ति के मार्ग बताये गए हैं. इन छः दर्शन शास्त्रों में – पूर्व मीमांसा, न्याय,
सांख्य, वैशेषिक, योग, और वेदांत या ब्रह्मसूत्र या उत्तर मीमांसा इस प्रकार छः दर्शनशास्त्र
माने गए हैं. इन छहों दर्शन शास्त्रों में साधक की रूचि अनुसार छः अलग-अलग मार्ग
बताये गए हैं.
देवी कात्यायनी की आराधना से प्राप्त होते हैं
सभी पुरुषार्थ –
उक्त पुरुषार्थों की प्राप्ति कर मुक्ति की दिशा
में अग्रसर करने वाली देवी शक्ति का स्वरुप माना गया है देवी कात्यायनी का. देवी
कात्यायनी के नामकरण में दो सब्दों का समवेश है. कात्य गोत्र में जन्म लेने वाले
कात्यायन ऋषि ने माँ शक्ति से इस स्वरुप की आराधना कर प्रकट किया था. महर्षि
कात्यायन ने शक्ति स्वरूपा माँ भवानी से वरदान मागा की आप मेरे पुत्री के रूप में
अवतरण लें. इस प्रकार महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण
देवी का नामकरण कात्यायनी पड़ा.
हिन्दू संस्कृति में देव-देवियों के बहु अंगों का
निरूपण और इसका वैज्ञानिक दर्शन -
देवी कात्यायनी की चार भुजाएँ बताई गयीं हैं. एक
बात विशेष तौर पर ध्यान देने योग्य है की हिन्दू धर्म में जो देवी-देवताओं में बहु-भुजाओं
का बात आती है उसका तात्पर्य यह है की वह देव-देवी विशेष उतने विभिन्न कार्य करने
में दक्ष होते हैं. बहु अंगों का चित्रण मात्र उन देव-देवी की विशेषता समझने के
लिए है न की उसे अक्षरसः ग्रहण करने के लिए. भक्त-श्रद्धालु अपने इष्ट देव-देवी की
विशेषता दर्शाने हेतु उन्हें अपनी भावनाओं अनुरूप बहु अंगों से शुसोभित कर देते
हैं. कई बार यह प्रश्न आते हैं क्या किसी देव-देवी में इतने हाँथ और शिर हो सकते
हैं? क्यों नहीं हो सकते? अवश्य हो सकते हैं. क्योंकि जो स्वयंभू,
सर्व-अन्तर्यामी, सर्व शक्तिमान है वह अपना कोई भी स्वरुप ग्रहण कर सकता है. पर
फिर भी इस बात को हमारे हिन्दू-सनातन धर्म के अनुयाई समझने का कष्ट करें की देव-देविओं
का चित्रण जो कलाकारों-चित्रकारों द्वारा किया जाता है वह उस देव-देवी विशेष के
बहुत विशेष गुणों को दर्शाने हेतु किया जाता है. अतः यह मात्र श्रद्धा, प्रेम,
विश्वास का सवाल है न की तर्क-वितर्क का. जो लोग तार्किक दृष्टिकोण रखते हैं उनका
भी जबाब हमारे पास मौजूद है जिसका यथोचित संतुष्टीकरण किया जायेगा.
शक्ति के अवतार देवी कात्यायनी का स्वरुप है
अभीष्ट फल प्रदायक-
उदाहरण के तौर पर देवी कात्यायनी का चित्रण चार
भुजाओं वाली शेर पर सवार माता शक्ति के अवतार के रूप में किया गया है. क्या है
इसका तात्पर्य? चार भुँजाओं का क्या तात्पर्य है? और उनकी भुजाओं की मुद्रा और
उसमे धारण किये गए अस्त्र सस्त्रों का क्या तात्पर्य है इसे समझना आवश्यक है? इनके
दो दाहिने और दो बाएं हाँथ बताये गए हैं. एक दाहिना हाँथ ऊपर उठा हुआ अभय मुद्रा
में और दूसरा वर मुद्रा में हैं. अभय मुद्रा का तात्पर्य स्वयं भी भयहीन और अपने
साधक को भी समस्त दुःख-कष्ट भय से निर्भय कर प्रसन्नता और साहस प्रदान करना है. जो
दायाँ हाँथ वर मुद्रा में है उससे वह अपने समस्त धार्मिक भक्त पुत्रों को
सुख-शांति-समृद्धि, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष प्रदान करती हैं. माता कात्यायनी के एक बाएं
हाँथ में कमल का फूल और दूसरे में तलवार है. कमल तो भारतीय और हिन्दू-सनातन
संस्कृति का आधार है. सभी देवी-देवता कमल को या तो धारण किये होते हैं अथवा कमल के
पुष्प में विराजमान होते हैं. कमल हमेशा कीचड़ में खिलता है अतः इसका यह भी
तात्पर्य है की इस संसार-सागर रुपी कीचड़ में फंस कर भक्तों को कमल पुष्प की तरह सन्मार्ग
और धर्म-मार्ग का अनुसरण नहीं छोड़ना चाहिए. तलवार या खडग शक्ति की प्रथम पहचान है.
बिना दंड के सामाजिक व्यवस्थाएं तो कभी सनातन काल से भी संभव नहीं हो पायीं हैं
अतः शक्ति के लगभग सभी स्वरूपों में तलवार, कृपाण अथवा खडग धारण होना बताया गया
है. इस खडग से ईश्वरीय शक्ति दंड व्यवस्था कायम कर अपने भक्तों के मार्ग में आने
वाली सभी बाधाओं को चिन्न भिन्न कर टुकड़ों में काट डालती हैं ऐसा इसका तात्पर्य
है. अभय मुद्रा में सिंह पर आरूढ़ माँ भवानी धर्म और सत्य की रक्षा हेतु सदैव तत्पर
रहती हैं.
शक्ति स्वरूपा देवी कात्यायनी का ध्यान और कुण्डलिनी
शक्ति के आज्ञा चक्र का भेदन-
आश्विन शुक्ल की छठी तिथि को आज भक्त साधक जहाँ
देवी शक्ति के छठे स्वरुप माँ कात्यायनी की पूजा आराधना करते हैं वहीँ योगी-साधक
का ध्यान आज कुण्डलिनी शक्ति के आज्ञा चक्र पर होता है. आज्ञा चक्र को कुण्डलिनी चक्रों
की श्रेणी में रखा जाये इस विषय में कुछ भिन्न-भिन्न मत भी हैं. कई साधक और ज्ञानीगण
कुण्डलिनी शक्ति में मात्र छः अर्थात षड-चक्र को ही बताते हैं और कई साधकगण अपने
अध्यात्मिक और परलौकिक अनुभव के आधार पर सात प्रमुख ऊर्जा के केंद्र बताते हैं. इन
सात प्रमुख ऊर्जा केन्द्रों में आज्ञा चक्र का अति महत्वपूर्ण स्थान है. आज्ञा चक्र
को दोनों भौहों के मध्य अर्थात भृकुटी के मध्य में अति सूक्ष्म रूप में स्थित बताया
गया है. नवरात्रि के इस विशेष तिथि को साधक भक्त माँ कात्यायनी की पूजा अर्चना
प्रातः काल से ही उठकर करते हैं और कुछ साधकगण त्राटक अर्थात एक विशेष ज्योति
केंद्र पर ध्यान केंदित करते हुए अपना ध्यान आज्ञा चक्र में लगाते हैं. आज्ञा चक्र
के भेदन से भी साधक को परलौकिक अनुभव प्राप्त होते हैं. सबसे पहले तो आज्ञा चक्र
भृकुटी के मध्य मस्तक के बीच में स्थित होने से सीधे यह बौद्धिकता और ज्ञान का
प्रतीक है. जिन योगी-साधकों का आज्ञा चक्र जागृत हो जाता है ऐसे साधक तीव्र और
कुशाग्र बुद्धि वाले बनकर सर्वत्र सम्मान प्राप्त करते हैं. ऐसे साधकों की
याददाश्त अर्थात मेधा शक्ति अत्यंत तीव्र हो जाती है. कई ऐसे व्यक्तियों के किस्से
सुनने को मिलते हैं जिन्हें मात्र एकबार पढ़ या देख लेने से हजारों वस्तुओं के नाम
याद हो जाते हैं. वह सभी व्यक्ति अपने पूर्व जन्म के अच्छे कर्म संस्कारों के संचय
से जब नवीन जन्म प्राप्त करते हैं तो वह सब गुण उनको विरासत के रूप में प्राप्त
होते हैं इसीलिए कई बच्चे जन्म से ही कई परलौकिक वस्तुओं के ज्ञाता होते हैं और
उनकी बुद्धि अत्यंत तीक्ष्ण होती है.
यह तो हुई पूर्व जन्म के कर्म संस्कारों का फल,
परन्तु इस मानवीय जन्म में भी जो साधक तप पूर्वक सतत अभ्यास से अपनी कुण्डलिनी
शक्ति के केन्द्रों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं उन्हें भी तप अर्थात कठिन साधना
द्वारा वह सभी दैवीय गुणों की प्राप्ति हो जाती मात्र आवश्यकता होती है एक अच्छे
गुरु के सानिध्य में कुण्डलिनी योग के अभ्यास की.
अति
प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा में शारदेय नवरात्रि के इस विश्वव्यापी विशेष
आयोजन में आप सभी सादर आमंत्रित हैं.
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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता
एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा
धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट
अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा (म.प्र.) पिन ४८६११७
मोबाइल नंबर – 07869992139, 09589152587










































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