स्थान – कैथा-गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 06.10.2016, दिन गुरुवार,
(कैथा-गढ़, रीवा) कुण्डलिनी योग और चक्र संस्थान में नवरात्रि की
पांचवीं तिथि आश्विन शुक्ल को जहाँ विशुद्धि चक्र पर ध्यान एवं साधना का दिन है
वहीँ नवदुर्गा शक्ति के पंचम स्वरुप एवं शिव-शक्ति पुत्र स्कन्द अर्थात कार्तिकेय
की माता स्कंदमाता के पूजन आराधन का भी दिन है.
नवरात्रि के पांचवें दिन कंठ के पास स्थित
विशुद्धि चक्र पर होता है साधक का ध्यान -
नवरात्रि की आश्विन शुक्ल की पांचवीं तिथि को
साधक-योगी प्रातः काल उठकर माता भगवती के पांचवें स्वरुप माँ स्कंदमाता का ध्यान
कर कंठ के पास स्थित विशुद्धि चक्र पर ध्यान केन्द्रित करते हैं और अभूतपूर्व
अध्यात्मिक लाभ प्राप्त करते हैं.
माँ शक्ति के पांचवें अवतार स्कंदमाता का ध्यान मन्त्र –
वन्दे वांछित कामार्थे
चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम्।।
धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।
अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्।
कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम्।।
धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।
अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्।
कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥
देवी महादुर्गा के पांचवें अवतार को स्कंदमाता
कहा गया है. स्कन्द पुराण और देवी भागवत पुराण में इनका वृहद् वर्णन आता है.
स्कंदमाता की चार भुजाएं बताई गयी हैं, यह दाहिनी ऊपरी भुजा में भगवान् स्कन्द
अर्थात अपने पुत्र कार्तिकेय को गोद लिए हुए हैं. और दाहिनी निचली भुजा जो ऊपर उठी
हुई है उसमे कमल धारण किये हुए हैं. इनका वाहन सिंह है. सिंह में आरूढ़ यह देवी
स्कन्दमाता धर्म रक्षा और भक्तों की रक्षा के लिए सदैव युध्य के लिए तत्पर हैं ऐसा
प्रतीत होता है.
कुण्डलिनी योग में विशुद्धि चक्र का वैज्ञानिक
सिद्धांत -
कंठ में अति सूक्ष्म रूप में विशुद्धि चक्र स्थित है. जिस प्रकार
तत्त्व के गुणों में उसके परमाणुओं और इलेक्ट्रान, प्रोटोन और न्यूट्रान आदि
सूक्ष्म कणों को नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता उसी प्रकार कुण्डलिनी योग में इन
षड-चक्रों को भी नहीं देखा जा सकता. इनका अनुभव इनके जागरण मात्र से ही प्राप्त
होता है. निरंतर ध्यान साधना से जब योगिक शक्तियों का प्रादुर्भाव होने लगता है तब
इनके जागरण का अनुभव प्राप्त होता है. साधक योगी को अलौकिक शांति और पारलौकिक
अनुभव प्राप्त होने लगते हैं.
विशुद्धि चक्र का सम्बन्ध थाईराईड ग्रंथि तथा उसके पीछे स्थित
फेरेंजिअल और लेरेंजियल प्लेक्सस से होता है. इस चक्र के जागृत होने से साधक योगी
को अतीन्द्रिय अनुभूतियाँ होती हैं. यह चक्र सीधे अचेतन मन व चित्त को प्रभावित कर
मस्तिष्क के दायें भाग में स्थित “साइलेंट एरिया” को जागृत करता है. विशुद्धि चक्र
पर स्थित कमल 16 पंखुड़ियों का होता है तथा इसका बीज मन्त्र “हं” है. इसकी
तन्मात्रा स्पर्श है और आकाश इसका तत्व है.
ध्यान में जब साधक की
चेतना इस चक्र में समाहित हो जाती है तो उसे अद्भुत अध्यात्मिक ज्ञान और बुद्धि की
प्राप्ति होती है. विशुद्धि चक्र का प्रतीक पशु सफ़ेद हांथी बताया गया है. योगी
साधकों के अनुभव अनुसार साधक को इसके चित्र में एक चन्द्रमा की छवि भी दीखती है जो
मन का प्रतीक है. चन्द्रमा शीतलता और शांति का प्रतीक है. शाकाहारी सफ़ेद हांथी भी
शांति का ही प्रतीक है. अतः इस चक्र में ध्यान से हमे अद्भुत मानशिक शांति भी प्राप्त
होती है. क्योंकि कोई भी सांसारिक अथवा अध्यात्मिक कार्य अशांति के वातावरण में
संभव नहीं है. विशुद्धि चक्र प्रसन्नता और स्वतंत्रता को दर्शाता है जो हमारी
योग्यता को निखारते हैं. इस चक्र को भेदन करने वाला साधक गायन, भाषण, स्पष्ट वाणी,
और संतुलित तथा शांत विचार का धनी होकर सर्वत्र सम्माननीय बनता है.
विशुद्धि चक्र के जागृत होने से होता है वाणी और
व्यक्तित्व विकास –
विशुद्धि चक्र के
सुप्तावस्था में पड़े रहने से व्यक्ति के अन्दर नकारात्मक भावनाएं जैसे चिंता, स्वतंत्रता का अभाव, बन्धन, और कंठ वाणी
की समस्याएँ पैदा होती हैं. ऐसे व्यक्ति का सर्वंगीन विकास अवरुद्ध हो जाता है और
वह पतन की दिशा में चला जाता है. क्योंकि वाणी ही व्यक्ति की अभिव्यक्ति में सबसे महत्वपूर्ण
भूमिका निभाती है और यदि कंठ ही अवरुद्ध हुआ तो मानवीय व्यक्तित्व विकास के सभी
मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं.
विशुद्धि चक्र में कमल
जैसी सोलह पंखुडियां होती हैं अतः योगियों और कुण्डलिनी शास्त्रों की भाषा में
व्यक्ति की सोलह कलाओं या योग्यताओं का भी प्रतीक है विशुद्धि चक्र. विशुद्धि चक्र
का केंद्र बिंदु कंठ या गला होने से इसमें स्थित 16 कमल दल संगीत की सोलह स्वरों
से भी सम्बंधित हैं. विशुद्धि चक्र का भेदन कर सिद्ध करने वाला साधक-योगी
वाक्सिद्धि को प्राप्त कर लेता है. यहाँ पर समझने की आवश्यकता है की वाक-सिद्धि का
तात्पर्य होता है की साधक वाणी से जो भी सब्द निकले वह सत्य हो. ऐसा साधक जो भी
कहता है वही होता है. यह सभी ईश्वरीय गुण हैं जो कुण्डलिनी शक्ति के जागरण से
प्राप्त होते हैं.
कुण्डलिनी
शक्ति और षड-चक्र दर्शन तथा इसका सदुपयोग -
हिन्दू सनातन धर्म का आधार
स्तम्भ ही है जीव-कल्याण के लिए सभी धर्मविहित कार्य करते हुए जन्म-मृत्यु के चक्र
से छुटकारा प्राप्त कर मोक्ष या ब्रह्म की प्राप्ति करना. एक बात विशेष ध्यान देने
योग्य है की हिन्दू-सनातन धर्म में मात्र ध्रर्मरक्षा एवं व्यापक लोक-कल्याण हेतु
ईश्वर को समर्पित कर की गयी हिंसा ही मान्य है अन्य कोई भी हिंसा पाप-अधर्म की
श्रेणी में रखी गयी है. किसी भी प्रकार के शक्तियों के दुरुपयोग की सनातन धर्म
भर्त्सनाकरता है. चाहे वह अश्वत्थामा द्वारा पांडवों के ऊपर प्रयोग किया गया
ब्रह्मास्त्र रहा हो अथवा रावण जैसे घोर आसुरी शक्तियों द्वारा प्रयोग की गयी
शक्तियां रही हों. जब भी कोई साधक चाहे वह असुर-दैत्य रहा हो अथवा देव-मानव घोर
तपस्या कर ब्रह्मा-विष्णु-शिव और शक्ति से वरदान स्वरुप शक्तियां अर्जित कीं तो
इनको सदैव आगाह किया गया कि सभी शक्तियों का सदुपयोग धर्म रक्षा की स्थिति में ही
होनी चाहिए अन्यथा इनके घोर परिणाम भी भुगतने पड़ेंगे. और हुआ भी वही शक्तियां
बन्दर के हांथों में तो सौंप दी गयीं परन्तु उनका प्रयोग करना बहुत ही कमतर को
आया. जिसकी जो प्रवृति थी उसी के अनुरूप उसका प्रयोग भी किया गया. रावण-मेघनाद,
कौरव, कंस, जरासंध, हिरानाक्ष्य, हिरनकश्यप को जब यह शक्तियां और वरदान मिले तो
इन्होने शक्ति का दुरुपयोग ही किया क्योंकि यह अधर्मचारी और अन्यायी आसुरी
प्रवृत्ति के थे. और यही शक्तियां जब पांडवों, श्री राम, ऋषि-मुनियों, वसिष्ठ,
परसुराम, आदि धर्मात्मा पुरुषों को कठोर ताप से प्राप्त हुईं तो उनका धर्मार्थ
कार्यों में ही सदुपयोग हुआ. कहते हैं की “जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखि
तिन तैसी” अर्थात सब व्यक्ति की भावनाओं और उसके सोच-विचार पर ही केन्द्रित है की
यदि वह आसुरी-राक्षसी प्रवृति का है तो वह दानवी कार्यों और अधर्म-अत्याचार में ही
शक्तियों का प्रयोग करेगा और यदि वह धार्मिक-सदाचारी है तो वह सत्य-धर्म की रक्षा,
शुख शांति स्थापित करने हेतु लोक-कल्याण हेतु इन अर्जित शक्तियों का सदुपयोग
करेगा.
परमाणु शक्तियों की तरह ही है कुण्डलिनी शक्ति इसका
करें सदुपयोग -
परमाणु, अणु आदि शक्तियों की तरह ही कुण्डलिनी
शक्ति भी अत्यंत शक्तिशाली होती है. कुण्डलिनी शक्ति मानवीय शरीर में सूक्ष्म
ऊर्जा के केंद्र विन्दु होते हैं. जो जितना सुक्ष्म है उसमे उतनी ही अधिक शक्ति
संचित है. आज का वैज्ञानिक सिद्धांत भी जितनी अधिक सूक्ष्मता में प्रवेश करता जा
रहा है उसे उतनी ही गूढ़ प्राकृतिक सच्चाई का पता चलता जा रहा है. अणु के बाद
परमाणु फिर इलेक्ट्रान प्रोटोन और न्यूट्रॉन और अब उसके अन्दर भी सुक्ष्म कण और
यहाँ तक की बोसॉन आदि कणों की खोज से वैज्ञानिक गॉड-पार्टिकल की खोज की बात
करने लगे हैं. नैनो का तात्पर्य सूक्ष्मता से ही है. आज नैनो टेक्नोलॉजी की धूम
मची है. यह कोई ज्यादा आश्चर्य की बात नहीं है. वैदिक काल और सनातन समय से हमारे
भारतीय ऋषि-मुनि यह सब पहले से ही जानते थे. कुण्डलिनी शक्ति के माध्यम से आतंरिक
शक्ति के प्रस्फुटन की जो बात कुण्डलिनी योग में की जाती है वह उसी सूक्ष्मता की
खोज की बात है. यद्यपि आज हमारे भारतीय समाज का दुर्भाग्य है की स्थूलता और
भौतिकतावाद में हम इतने उलझ चुके हैं कि न तो हमे अपना और न ही हमे अपनी आत्म-शक्तियों
का आभास रहा. आज आवश्यकता है पुनः सूक्ष्मता की ओर अग्रसर हो उसी ईश्वरीय तत्त्व
के खोज की जो कहीं अन्यत्र नहीं हमारे इस शरीर रूपी मंदिर में ही स्थित है. अर्थात
कहा भी गया है – “या पिंडे सः ब्रह्मांडे”.
कुण्डलिनी शक्तियों के दुरुपयोग से हो सकती है
अनिष्टि –
जिस प्रकार परमाणु और आणुविक शक्तियों का
दुरूपयोग क्षण मात्र में इस संसार को महाकाल के विकराल गाल में समाहित कर सकता है
वैसे ही हमारे अन्दर निहित यह कुण्डलिनी शक्ति और चक्र केंद्र जागृत होने पर इनका
सदुपयोग होना चाहिए और लोक-कल्याणार्थ सत्य धर्म न्याय के कार्यों में ही होना
चाहिए ऐसा बारम्बार वर्णन हिन्दू-सनातन धर्म ग्रंथों में आता है. उदाहरण के लिए
यही विशुद्धि चक्र के जागरण से जब वाक्-शक्ति शिद्ध हो जाये तो साधक योगी को इसका
दुरूपयोग श्राप देने मिथ्या भाषण में नहीं बल्कि वरदान देने, ईश्वरीय नाम-जप
संकीर्तन सहित लोक-कल्याण के लिए ही किया जाये. क्योंकि दुरूपयोग करने से संचित
शक्तियां क्षीण होने लगती हैं और साधक पतन के मार्ग की ओर अग्रसर होता है.
अध्यात्म में कुण्डलिनी शक्ति का जागरण देता है
मोक्ष -
भारतीय अध्यात्म में शरीर के सुक्ष्म शक्ति
केंद्र या कुण्डलिनी शक्ति के जागरण से योगी-साधक मोक्ष प्राप्त करता है ऐसा
उल्लेख योग और तंत्र ग्रंथों में मिलता है. कुण्डलिनी में स्थित सुषुम्ना नाड़ी के
सात प्रमुख स्थानों पर सात चक्र होते हैं जो गुदा के नीचे मूलाधार से लेकर मस्तक
मंडल एवं शिखा के पास स्थित सहस्रार तक स्थित होते हैं. जब यह चक्र साधक एक-एक
करके जागृत करने लगता है तो उसे अतीन्द्रिय और पारलौकिक अनुभूतियाँ प्राप्त होती
हैं. यह एक ऐसी अध्यात्मिक स्थिति होती है जो साधक-योगी के अतिरिक्त अन्य कोई बयां
नहीं कर सकता. योग और तंत्र ग्रंथों में प्रमाण मिलता है की साधक को अद्भुत
शक्तियों, अद्भुत ध्वनियों का अनुभव होने लगता है. परन्तु यह अद्भुत शक्तियां साधक
में अहंकार पैदा न करें और इनके दुरुपयोग की दिशा में न जाया जाये इसका ध्यान साधक
को रखना अति आवश्यक होता है. क्योंकि जैसे ही इन अलौकिक शक्तियों का अनुभव होने
लगता है वैसे ही साधक के मार्ग में कुछ विचित्र वाधाएं भी निर्मित होने लगती हैं
जिसमे व्यग्र नहीं होना चाहिए और मनोयोग के साथ साधना में लगे रहना चाहिए ऐसा
कुण्डलिनी और तंत्र ग्रंथों में वर्णन आता है. इसीलिए कुण्डलिनी साधना को किसी
समर्थ और सक्षम गुरु के सानिध्य में ही किया जाना चाहिए ऐसा वर्णन भी योग ग्रंथों
में मिलता है. एक समर्थ एवं सक्षम गुरु अपने साधक-शिष्य को योग मार्ग से भटकने से
बचाता तो है ही इसके गूढ़ रहस्यों को भी समझाता है. जो योगी-साधक अपने योग मार्ग से
विचलित हुए बिना कुण्डलिनी साधना में रत रहता है वह परमपद को प्राप्त कर ईश्वरीय
शक्तियों का अधिकारी बनता है क्योंकि सनातन-हिन्दू धर्म में मानव जीवन का मूल उद्येश्य
ही है जन्म-कर्म के चक्र के वन्धनों से मुक्ति प्राप्त कर परम ब्रह्म और मोक्ष की
प्राप्ति.
अति
प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा में नवरात्रि का यह पावन और ऐतिहासिक
कार्यक्रम निरंतर चल रहा है जो 10 अक्टूबर को हवन और भंडारे के साथ संपन्न होगा.
कैथा की पावन स्थली में आयोजित माता के दरबार में आप सभी सादर आमंत्रित हैं.
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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता
एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा
धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट
अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा (म.प्र.) पिन ४८६११७
मोबाइल नंबर – 07869992139, 09589152587







































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