स्थान – कैथा-गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 04.10.2016, दिन मंगलवार,
(कैथा-गढ़,
रीवा) परम ब्रह्म
परमेश्वर निराकार, सर्वत्र व्याप्त, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान है. वह ब्रह्म जब इस मायारूपी
श्रृष्टि की रचना करता है तब वह महामाया परमशक्ति का आवाहन करता है. यद्यपि यह परमशक्ति
भी उसी की शक्ति का अभिन्न अंग है और उससे अलग नहीं है. क्योंकि परमशक्ति के बिना
इस श्रृष्टि की रचना संभव नहीं होती. जिस प्रकार किसी कार्य को करने हेतु हमे
शक्ति की आवश्यकता होती है वैसा ही सिद्धांत ईश्वरीय शक्ति के साथ भी है. परन्तु
हमारी भौतिक शक्तियों और ईश्वर की आदिशक्ति में अंतर है. ईश्वर सर्वशक्तिमान और
स्वयंभू है, जबकि मानव की शक्तियां इस संसार सागर में छिन्न-भिन्न होती हैं. उन्ही
छिन्न-भिन्न और विखरी शक्तियों को समेटने का पर्व है नवरात्रि. नवरात्रि पर्व है
यह मंथन और चिंतन का हम ईश्वर से अलग न होकर उसी का अंग और अंश हैं. कैसे हम उस
सर्व शक्तिमान को जानकर पहचानकर उससे एकाकार हो पायें और स्वयं भी वही “तत्वमसि” हो
जाएँ यही जानने और ध्यान का पर्व है नवरात्रि.
देवी दुर्गा के चतुर्थ स्वरुप माँ कुष्मांडा का ध्यान मन्त्र –
वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥
भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्।
कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥
भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्।
कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥
-नवदुर्गा के चौथे स्वरुप माँ कुष्मांडा का ध्यान
और अनाहत चक्र का भेदन -
नवदुर्गा का चौथा दिन माता कुष्मांडा के स्वरुप
की आराधना का होता है. महाशक्ति द्वारा अपनी मंद हंसी से “अंड” अर्थात ब्रह्माण्ड
को उत्पन्न करने के कारण इन्हें “कुष्मांडा” कहा जाता है. संस्कृति भाषा के
निघंटु-निरुक्त के अनुसार “कुष्मांड” को “कुम्हड़ा” भी कहा जाता है इसीलिए भक्तों
और अनुयाइयों में इन्हें “कुम्हड़े” की बलि भी दी जाती है. इनकी आठ भुजाएं हैं
इसीलिए इन्हें अष्टभुजा कहा जाता है. यह आदिशक्ति देवी हैं क्योंकि ब्रह्म विचार
से नवीन श्रृष्टि हेतु सबसे प्रथम इन्ही का अवतरण हुआ. यह सूर्यलोक के भीतर निवास
करती हैं. सांसारिक व्यक्तियों के लिए पूर्ण समर्पण के भाव से माँ के इस स्वरुप के
ध्यान से सभी रोग दूर होते हैं और आयु, यश, स्वास्थ्य और बल में वृद्धि होती है.
वहीं अध्यात्मिक व्यक्ति के लिए शक्ति का यह चौथा स्वरुप अत्यंत महत्वपूर्ण होता
है. कुण्डलिनी योग के अनुसार अनाहत चक्र का स्थान मूलाधार, स्वाधिष्ठान और मणिपूर
चक्र के बाद आता है. अनहद नाद = शाश्वत ध्वनि, अर्थात ॐ या ओंकार ध्वनि. अनहद
ओमकार ध्वनि के कारण ही इसे अनाहत चक्र कहते हैं. इसका स्थान ह्रदय के पास सीने के
बीच में है. इसका मूलाक्षर मंत्र “यं” है. जिस प्रकार आकाश समष्टि का सूचक है और
इसका रंग हल्का नीला होता है उसी प्रकार अनाहत चक्र का भी रंग नीला है. इसका रूप
तत्त्व वायु है. वायु प्रतीक है फैलाव, स्वतंत्रता, और अनंतता का. ॐ ध्वनि इस श्रृष्टि
की मूल ध्वनि है. अ, उ और म से बना ॐ ईश्वर के अनंत नामों में से एक अत्यंत
महत्वपूर्ण और मूल नाम है. चूंकि अनाहत का केंद्र विन्दु ह्रदय के पास होता है अतः
अनाहत चक्र के जागृत होने से दयालुता, विशालता, समग्रता, शांति, खुसी, धैर्य,
सहानुभूति, प्रेम अहिंसा जैसे भावनात्मक गुण जागृत होते हैं.
मानसिक रोगों के उपचार में अनाहत चक्र का ध्यान
लाभदायक –
आज जब सम्पूर्ण विश्व अनियंत्रित प्रतिस्पर्धा
में लगा हुआ है और भौतिक सुख सुविधा प्राप्त करने और धन विलासिता की सामग्री एकत्र
करना ही मानव जीवन का मुख्य उद्येश्य बनता जा रहा है ऐसे में आज योग और विशेषकर कुण्डलिनी
योग अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है. वर्तमान वैज्ञानिक गणना के आधार पर यह आसानी से
देखा जा सकता है कि आज मानसिक रोगों में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती जा रही है. हर
स्थान पर अशांति, भय और असुरक्षा का वातावरण निर्मित हो गया है. तनाव, अनिद्रा, उन्माद
जैसी मानसिक बीमारियाँ आज आम बात हो गयी हैं. ऐसे में अनाहत चक्र पर ध्यान करने और
अपने आप को भावनात्मक रूप से मजबूत करने और करुणा, दया, क्षमा, प्रेम, अहिंसा,
सहानुभूति जैसे दैविक गुण विकसित करने से निश्चित तौर पर इन सभी समस्याओं पर विजय
प्राप्त की जा पायेगी. इस प्रकार आज हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा दी गयी इन
महत्वपूर्ण योग और ब्रह्म विद्याओं की शरण ही मानवता के लिए एकमात्र सहारा रह गया
है.
विशुद्धि चक्र में ध्यान और देवी स्कंदमाता की
आराधना का दिन है नवदुर्गा का पांचवां दिन
नवदुर्गा के अगले और पांचवें दिन योगी-साधक का
ध्यान विशुद्धि-चक्र में होना चाहिए. इस दिन माता के पांचवें स्वरुप स्कंदमाता की
पूजा आराधना की जाती है. स्कंदमाता का तात्पर्य है- स्कन्द अर्थात कार्तिकेय की
माता अर्थात महाशक्ति स्वरूपा पार्वतीजी का अगला स्वरुप है स्कंदमाता. इनके ध्यान
और आराधन से साधक में क्रियाओं और चित्तवृत्तियों का लोप होकर साधक परम चैतन्य
स्वरुप ब्रह्म से एकाकार की दिशा में अग्रसर होता है और समस्त लौकिक मायायिक और सांसारिक
बंधनों का त्याग होता है और स्कंदमाता की कृपा और भक्ति प्राप्त कर परम पद का
अधिकारी बनता है.
योग और तंत्र के साधकों के लिए इन षडचक्रों का
भेदन कर अंत में शहस्रार में पंहुच कर मोक्ष प्राप्ति अंतिम उदेश्य होता है.
अति
प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा में नवरात्रि का यह पावन और ऐतिहासिक
कार्यक्रम निरंतर चल रहा है जो 10 अक्टूबर को हवन और भंडारे के साथ संपन्न होगा.
कैथा की पावन स्थली में आयोजित माता के दरबार में आप सभी सादर आमंत्रित हैं.
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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता
एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा
धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट
अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा (म.प्र.) पिन ४८६११७
मोबाइल नंबर – 07869992139, 09589152587

























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