Saturday, 8 October 2016

धर्मस्थली कैथा में माता के दरबार का आठवां दिन, महाकालिका के कालरात्रि के सातवें स्वरुप का हुआ पूजन. मंदिर प्रांगण में भक्तों श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ी. आज के दिन भानुचक्र या मध्य ललाट पर साधक का होता है ध्यान



स्थान – कैथा-गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 08.10.2016, दिन शनिवार,

(कैथा-गढ़, रीवा) ऋग्वेद के दसवें मंडल का 129 वां सूक्त है नासदीय सूक्त. नासदीय सूक्त में ब्रह्माण्ड के उद्भव और निर्माण के विषय में हमारे वैदिक ऋषियों ने आज के वैज्ञानिक युग के बहुत पहले ही अपने ब्रह्म ज्ञान से मन्त्रों के रूप में संजो दिया था.
नासदीय सूक्त में कुल सात मन्त्र हैं जिनके हिंदी भावार्थ को समझने का प्रयास करें तो यह है की - इस जगत या ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के पहले न तो किसी का अस्तित्व था और न ही किसी का अनस्तित्व. तब न तो वायु थी और न ही असमान और न ही उसके परे कुछ था. चरों तरफ घने अन्धकार की तरह कुछ ऐसा था जो सर्वत्र व्याप्त था. उस समय न मृत्यु और न ही अमरत्व था. उस समय मात्र एक अनादि पदार्थ था जिसका न तो आदि था और न अंत. प्रारंभ में अन्धकार में लिप्त अन्धकार व्याप्त था और वह अनादि पदार्थ था जो अपने आयतन बदले बिना मात्र अपना आकार बदल सकता था. फिर उस अनादि पदार्थ से सतत तप से वह रचयिता अर्थात परमात्मा/ब्रह्म प्रकट हुआ. इस प्रकार रचयिता को इस श्रृष्टि रचना का भाव आया. और तब उस ब्रह्म-विचार से सूर्य किरणों की भांति ऊर्जा निकलकर उस अनादि पदार्थ से मिलकर इस श्रृष्टि की रचना की. ऋषि कहते हैं की अभी वर्तमान में कौन बता सकता है की इस श्रृष्टि की रचना कैसे हुई? क्योंकि विद्वान् लोग तो श्रृष्टि रचना के पश्चात आये. श्रृष्टि रचना का स्रोत क्या है? कौन है इसका करता धर्ता? श्रृष्टि का संचालक, अवलोकन कर्ता कहीं स्वर्ग में है बैठा. हे विद्वानों! तुम उस परम तत्त्व को जानो क्योंकि यदि तुम नहीं जान सकते तो कौन जान सकता है?
इस प्रकार नासदीय सूक्त में जहाँ एक तरफ श्रृष्टि के निर्माण की बात कहीं गयी है वहीँ दूसरी तरफ उस परम ब्रह्म परमेश्वर को जानने की भी बात कही गयी है. उसे कौन जान सकता है इस सन्दर्भ में ऋषि कहते हैं की वह जिज्ञासुओं और विद्वानों का कार्य है. क्योंकि जिसमे उसे जानने और पाने की जितनी जिज्ञासा होगी वह उस ब्रह्म के उतने ही करीब पंहुच पायेगा. 

आदिशक्ति का कालरात्रि के रूप में अवतार लेना –
महामाया महाकाली का सप्तम स्वरुप है कालरात्रि का. इनके चित्रांकन में इनके शरीर को घने काले रंग का बताया गया है. इनके गले में बिजली की गर्जना के समय चमकने वाली बिजली की शक्ति की भांति चमकीली माला दिखाई गयी है जो अद्भुत शक्ति का केंद्र मानी गयी है. इनके तीन ऑंखें भी बिजली की भांति चमकीली और ब्रह्माण्ड की भांति गोल दिखाई गयी हैं. इनकी नासिका से भी रेचक-पूरक के समय अग्नि की भयंकर ज्वालायें निकलती हुई दिखाई गयी हैं. इनका वाहन गर्दभ अर्थात गधा बताया गया है. दाहिने ऊपर का हाँथ वरदानी और नीचे का हाँथ अभय मुद्रा में है. बाएं ऊपर के हाँथ में कई त्रिशुलों जैसा कांटा और नीचे के हाँथ में खडग है. महादुर्गा का कालरात्रि स्वरुप यद्यपि देखने में बड़ा ही भयावह है परन्तु अत्यंत शुभ एवं फलदायक है. इनकी कृपा और स्मरण मात्र से समस्त प्रकार के भयों का नाश हो जाता है और साधक अभय होकर पुण्य का अधिकारी बनता है.
नवरात्रि के सातवें दिन साधक गण करते हैं भानु चक्र या सहस्रार चक्र में ध्यान -
नवरात्रि के आठवें दिन महाकाली कालरात्रि का दिन होता है. वैसे ऊर्जा के केंद्र चक्रों की मूल संख्या सात ही है और अब साधक का ध्यान सीधे सहस्रार में होना चाहिए परन्तु साधकगण शरीर के अन्य सूक्ष्म ऊर्जा के केन्द्रों में भी ध्यान केन्द्रित करते हैं. जैसे कई ग्रंथों में वर्णन आता है की साधकगण भानुचक्र पर ध्यान केन्द्रित करते हैं जो ललाट के मध्य में भृकुटी के ठीक ऊपर स्थित बताया गया है यद्यपि यह अन्य नामों से जाना जाता है परन्तु भानु चक्र भी सहस्रार या ब्रह्मरंध्र के उप चक्रों में से ही है.
सहस्रार चक्र के विषय में विस्तृत वर्णन बाद में आएगा और वर्तमान में इतना ही कहा जा सकेगा की सहस्रार या ब्रह्मरंध्र का तात्पर्य हजारों पंखुड़ियों वाले कमल से है. ब्रह्मरंध्र का तात्पर्य ब्रह्म के द्वार से भी है अर्थात यह सिद्ध या जागृत होने के बाद ब्रह्म या ईश्वर का द्वार खुल जाता है. जिस प्रकार छोटी-छोटी नदी नाले होते हैं और अंत में सभी सागर में मिल जाते हैं और स्वयं भी सागर बन जाते हैं वैसे ही सहस्रार या ब्रह्मरंध्र समस्त नाड़ियों का केंद्र विन्दु होता है. इसके खुलने से ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय में अंतर समाप्त हो जाता है. अर्थात आत्मा समष्टि में मिल जाती है. अर्थात जीवात्मा ब्रहमांड की आत्मा के साथ एकाकार हो जाती है. सहस्रार चक्र दर्शन या इसकी सिद्धि व्यक्ति के जीवन का अंतिम उद्येश्य है. यही से मोक्ष का द्वार खुल जाता है. अलौकिक सिद्धियाँ और शक्तियां साधक को प्राप्त हो जाती हैं ऐसा वर्णन योग और तंत्र ग्रंथों में आता है.
अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा में नवरात्रि का यह पावन और ऐतिहासिक कार्यक्रम निरंतर चल रहा है जिसका दिनांक 10 अक्टूबर को हवन और भंडारे के साथ समापन होगा.  

नवदुर्गा के महाकालिका अर्थात कालरात्रि स्वरुप का ध्यान मन्त्र –
करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥
दिव्यं लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।
अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम॥
महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।
घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥
सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।
एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥

 अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा में शारदेय नवरात्रि के इस विशेष आयोजन में आप सभी सादर आमंत्रित हैं.


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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा  (म.प्र.) पिन ४८६११७
मोबाइल नंबर – 0786999213909589152587

































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