स्थान – कैथा-गढ़ (रीवा, म.प्र.), दिनांक: 05.10.2016, दिन वुधवार
(कैथा-गढ़,
रीवा) पवित्र श्री हनुमान
मंदिर प्रांगण कैथा में आज नवरात्रि का पांचवां दिन और विक्रम संवत 2073 आश्विन शुक्ल पक्ष की चौथी तिथि रही. भले ही
अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से आज पांचवां दिन हो परन्तु देवी नवदुर्गा की यह चौथी
तिथि है जिसमे माँ भवानी के चौथे स्वरुप अर्थात माँ कुष्मांडा की आराधना की जाती
है.
कई स्थानों पर जो माता के भक्त-श्रद्धालु कल चौथी
तिथि मानकर कुष्मांडा देवी का पूजन किये और आज पंचमी का दिन मानकर देवी के पांचवें
स्वरूप माँ स्कंदमाता का भी पूजन आराधन किये वह भी उतने ही फलदायक है.
कैथा के श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में भक्त और श्रद्धालुओं
का ताँता लगा रहा और बड़ी संख्या में भक्त श्रद्धालुगण कार्यक्रम में माता के दरबार
में एकत्रित हुए.
नवदुर्गा में है भगत गाने की है प्राचीन परंपरा –
नवरात्रि में विशेषकर ग्रामीण अंचलों में भगत
गाने की प्राचीन परंपरा है. पूरे नौ दिन माता के भक्तगण पूरी रात्रि में जागरण
रखकर भगत गाते-बजाते और आनंदित होते हैं. गीत-संगीत में भगत एक अति सामान्य राग और
टोन में गाई जाने वाली भजन की ही तरह है जिसमे संगीत के कम से कम इंस्ट्रूमेंट का
प्रयोग किया जाता है. भगत में एक या दो ढोलक, एक नगरिया, और झांझ के सहयोग से माता
के भक्तगण रातभर जमकर भगत गाते हैं झूमते-झामते हैं. इन अवसरों पर ग्रामीण अंचल
में भक्तों के शिरे में देवी सवार होने की भी परंपरा होती है. जो भक्त देवी माता
के कठिन व्रतधारी होते हैं उनका मानना होता है की जब भगत गाई जाती है तो साक्षात्
देवी का स्वरुप उन भक्तों के शिरे सवार हो जाता है और ऐसे भक्त अपना होसों-हवास भूलकर
खूब झूमते हैं और बांकी अन्य दर्शक लोग इसका भरपूर आनंद लेते हैं. देवी के शिरे पर
सवार होते ही अन्य पीड़ित दुखी, रोगी आदि जो भी जिनकी समस्या होती है वह शिरे-सवार देवी
के समक्ष रखते हैं और वह देवी उनको भभूत और वीरा आदि देती हैं. यह कुछ ग्रामीण
अंचल की परम्पराएँ हैं जो मात्र आस्था और विश्वास वालों के लिए ही हैं. जो इस
प्रकार की भावना और आस्था रखते हैं उन्हें इनका मनोवैज्ञानिक लाभ भी प्राप्त होता
है. कई लोग रोते हुए और दुखी आते हैं और प्रसन्न मुद्रा में वापस जाते हैं. यह सब
आस्था-विश्वास से ही संभव होता है. वहीँ पर तार्किक दृष्टिकोण वाला बैठा व्यक्ति
इन सबको वकवास ही समझता है परन्तु जो भक्त इसमें आस्था रखते हैं उनके लिए यह भभूत-वीरा
किसी संजीवनी से कम नहीं होती है.
मन के हारे हार हार है मन के जीते जीत –
जी हाँ यह सब हमारे मन और मस्तिष्क का ही तो खेल
है. श्री तुलसी कृत श्रीरामचरितमानस में कहा भी गया है “जाकी रही भावना जैसी प्रभु
मूरति देखि तिन तैसी” अर्थात जिस व्यक्ति की जैसी सोच और भावनाएं होती हैं उसे
वैसा ही दीखता और मिलता है. यह सब मन और सोच का ही तो खेल है. एक ग्रीक दार्शनिक
ने कहा भी है की चूंकि मैं सोचता हूँ इसलिए मैं हूँ. ठीक यही हमारा हिन्दू-दर्शन
सनातन काल से कहता आ रहा है. सब इस मन में
ही है इसलिए वैदिक मन्त्रों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण मन्त्र है “तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु”
अर्थात “ऐ मेरे मन तू शुभ और कल्याण कारी ही सोच !”
आस्था-विश्वास से ही परलौकिक और असंभव भी कार्य
होते हैं सफल -
भगवान् श्री कृष्णजी ने भी तो श्रीमद भगवद गीता
में अर्जुन को समझते हुए यही कहा की हे अर्जुन जो मुझे जिस भाव से मानता-पूजता है
मैं भी उसे उसी भाव में मिलता हूँ. ठीक ऐसे ही यद्यपि वह परमब्रह्म सर्वत्र कण-कण में
विद्यमान और कुछ लोग उसकी पूजा श्रीविष्णु के रूप में तो कुछ श्रीशिव, कोई देवी
दुर्गा तो कोई श्री हनुमान, तो कोई श्रीकृष्ण तो कोई श्रीराम के रूप में करता है.
वैसे ही यदि देवी माता के भक्तों को भगत गाते समय देवी शिरे पर सवार हो जाएँ और
यदि उनके द्वारा दिए जाने वाले भभूत-वीरा और राख मात्र से बड़े से बड़े रोग ठीक हो
जाएँ तो किसी अति तार्किक और तथाकथित वैज्ञानिक विचारधारा रखने वाले व्यक्ति को
कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि भले ही आज का भौतिक विज्ञान मात्र भौतिक
प्रयोगों पर ही विश्वास करता हो परन्तु पारलौकिक शक्तियों और मन की शक्ति को तो यह
भौतिक विज्ञानं न कभी समझ पाया है और संभवतः न कभी समझ ही पायेगा क्योंकि मन को
पढने वाला ही अन्तर्यामी बन जाता है.
भविष्य और मन को समझ पाना मात्र ईश्वर के ही वश की बात है. तो जैसा की हमारी
चर्चना भगत गाने और उसमे झूमने वाले भक्तों, माता के शिरे पर सवार होने और भभूत-वीरा
देने के विषय में चर्चना से हुई तो यही अटल सत्य है की प्रत्येक व्यक्ति की
भावनाएं और सोच अपनी अलग-अलग होती हैं और इसीलिए यदि ईश्वरीय शक्तियों और देवी में
आस्था रखने वाले गरीब गाँव के व्यक्ति को मात्र भभूत-वीरा और राख से बड़ी से बड़ी बीमारियों
से निजात मिल जाए तो आज के ज्यादातर लुटेरे डॉक्टरों, जिनकी पैसा ऐंठने के
अतिरिक्त कोई अन्य धर्म है ही नहीं, उनके हांथों लुटने से तो बेहतर ही होगा...
परम ब्रह्म परमेश्वर स्वयंभू है- सर्वज्ञ, सर्वव्यापी,
अनंत, चैतन्य है -
परम ब्रह्म परमेश्वर निराकार, सर्वत्र व्याप्त,
सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान है. वह ब्रह्म जब इस मायारूपी श्रृष्टि की रचना करता है तब
वह महामाया परमशक्ति का आवाहन करता है. यद्यपि यह परमशक्ति भी उसी की शक्ति का
अभिन्न अंग है और उससे अलग नहीं है. क्योंकि परमशक्ति के बिना इस श्रृष्टि की रचना
संभव नहीं होती. जिस प्रकार किसी कार्य को करने हेतु हमे शक्ति की आवश्यकता होती
है वैसा ही सिद्धांत ईश्वरीय शक्ति के साथ भी है. परन्तु हमारी भौतिक शक्तियों और
ईश्वर की आदिशक्ति में अंतर है. ईश्वर सर्वशक्तिमान और स्वयंभू है, जबकि मानव की शक्तियां
इस संसार सागर में छिन्न-भिन्न होती हैं. उन्ही छिन्न-भिन्न और विखरी शक्तियों को
समेटने का पर्व है नवरात्रि. नवरात्रि पर्व है यह मंथन और चिंतन का हम ईश्वर से
अलग न होकर उसी का अंग और अंश हैं. कैसे हम उस सर्व शक्तिमान को जानकर पहचानकर
उससे एकाकार हो पायें और स्वयं भी वही “तत्वमसि” हो जाएँ यही जानने और ध्यान का
पर्व है नवरात्रि.
देवी दुर्गा के चतुर्थ स्वरुप माँ कुष्मांडा का ध्यान मन्त्र –
वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥
भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्।
कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥
भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्।
कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥
अति
प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा में नवरात्रि का यह पावन और ऐतिहासिक
कार्यक्रम निरंतर चल रहा है जो 10 अक्टूबर को हवन और भंडारे के साथ संपन्न होगा.
कैथा की पावन स्थली में आयोजित माता के दरबार में आप सभी सादर आमंत्रित हैं.
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शिवानन्द द्विवेदी
(प्रचारक, प्रवक्ता
एवं राष्ट्रीय संयोजक)
श्रीमद भगवद कथा
धर्मार्थ समिति (भारत)
ग्राम कैथा, पोस्ट
अमिलिया, थाना गढ़,
जिला रीवा (म.प्र.) पिन ४८६११७
मोबाइल नंबर – 07869992139, 09589152587



























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