Sunday, 19 February 2017

(Rewa, MP) कैथा में गो भागवत का तीसरा दिन: गौमात्र न विधते – अर्थात गौ अनुपमेय है (यजुर्वेद)



दिनांक – 19/02/2017
स्थान –  (रीवा, मप्र)


कैथा में गो भागवत का तीसरा दिन: गौमात्र न विधते –
 अर्थात गौ अनुपमेय है (यजुर्वेद)

(गढ़, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) पावन यज्ञस्थली कैथा में महाशिवरात्रि के पुनीत अवसर पर दिनांक 17 फरवरी से प्रारंभ हुई गो भागवत कथा का प्रवचन कार्य आचार्य श्री चंद्रमणि पयासी जी के मुखारविंद से निरंतर चल रहा है. कार्यक्रम के तीसरे दिवस दिनांक 19 फरवरी को गो भागवत कथा में गोमाता की महिमा का वखान चल रहा है. गो माता और भारतीय संस्कृति एक दूसरे के पूरक हैं. बिना गाय के भारतीय संस्कृति की कल्पना ही नहीं की जा सकती. चारों वेदों में से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाने वाले यजुर्वेद में मन्त्र आया है की गौमात्र न विधते – अर्थात गौ अनुपमेय है (यजुर्वेद). गाय को अनुपमेय अर्थात जिसकी उपमा न की जा सके ऐसा वर्णन करते हुए आचार्य श्री कहते हैं की गाय सभी कामनाओं का सागर है. गाय से ही सभी जीवों की उत्पत्ति हुई है और गाय में ही स्वयं त्रिदेव और न्सभी देवी-देवतागण विराजमान रहते हैं. इसीलिए इसे कामधेनु भी कहा गया है. गाय जननी का स्वरुप है इसीलिए धेनु, धरती और स्वमाता अर्थात हमारी माता का पूजन करने वाली भारतीय संस्कृति में कहा गया है की जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी. अर्थात जननी अपनी स्व-माता, जन्मभूमि अर्थात अपनी धरती माता और इसी प्रकार गोमाता जहाँ पर हैं वह स्थान पृथ्वी पर होते हुए भी स्वर्ग से भी बढ़कर है. अब आज हम मानव अपनी संस्कृति और गोमाता का विनाश करने में तुले हुए हैं वह निश्चित रूप से हमारी भारतीय संस्कृति को गर्त की ओर ले जाते वाला कदम ही है. अतः आचार्य जी ने बताया की हमे अपनी माता, गोमाता और धरती माता के प्रति पूर्ण निष्ठावान होकर इनकी आराधना कर इनकी सुरक्षा करनी चाहिए. ऋग्वेद में आगे वर्णन आया है की गाय निरपराध जीव है उसे नहीं मारना चाहिए (ऋग्वेद 10.101-15 ). ऋग्वेद में कहा गया है की गाय अवध्य है अर्थात जिसे मारना नहीं चाहिए. संभवतः इस प्रकृति में यदि कोई सबसे शांत प्राणी है तो वह है गाय. क्योंकि गाय शाकाहारी, शांत, और किसी भी प्रकार से किसी भी जीव को कोई हानि पहुचाने वाला प्राणी नहीं है. गाय सदैव परोपकार करने वाली प्राणी है. गाय से मानव को दुग्ध उत्पाद के साथ खेतों और कोल्हू में चलने वाले बलवान बैल मिलते हैं. अब आज वर्तमान समय में मशीनों के उद्भव और विकास से यद्यपि इनकी महत्वा कम हो गयी है लेकिन किसी भी प्रकार से गोमाता की उपयोगिता और उसके भारतीय संस्कृति में महत्व को कम नहीं कहा जा सकता. गोमाता भारतीय मानव धर्म के सोलह संस्कारों से जुड़े हुए हैं जिसमे गर्भस्थ शिशु से लेकर मृतोरांत तक के सभी संस्कारों में गोमाता की महिमा का वखान आता है. इसी प्रकार आगे ऋग्वेद में कहा है की गौहत्या जैसे घृणित दुष्कृत्य करने वाले का शिर धड़ से अलग कर देना चाहिए (ऋग्वेद 18.87.16). जो जीव सबसे शांत और परोपकारी है उसे मारने और उसका वध करने वाले को ऋग्वेद में मृत्युदंड की सजा का विधान बताया गया है. हमारे भारत वर्ष में पूर्व में भी जो राजा हुए उन्होंने गोहत्या के अपराध में मृत्युदंड की सजा रखी थी. कुछ पाश्चात्य और विदेशी नास्तिक शासकों के अतिरिक्त सभी स्वदेशी शासकों ने गोहत्या पर कड़े दंडात्मक विधान बनाये थे. परन्तु दुर्भाग्य से आज तथाकथित भारतीय लोकतंत्र में स्वतंत्रता के नाम पर कुछ राज्यों और इण्डिया में अभी भी गोमांश का भक्षण करने की छूट देकर निरंतर गोमाता का अपमान किया जा रहा है और मानवता की पराकाष्ठा को पार किया जा रहा है. गो के प्रति निर्दयता और क्रूरता मानवता के अंत का द्योतक है. इसीलिए ऋग्वेद के उक्त सूक्ति में गौहत्या के दोषी को मृत्युदंड का विधान बताया गया है जिससे गोपालन और गोसंवर्धन को बढ़ावा देकर उनकी सुरक्षा आदि काल से की जा रही थी.


!!! सादर धन्यवाद !!!

संलग्न – प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा की कुछ तस्वीरें. धर्मार्थ समिति कैथा का लोगो.
             

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Shivanand Dwivedi
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