Wednesday, 28 March 2018

श्रीहनुमान प्रकटोत्सव पर विशेष – यज्ञस्थली कैथा मे विशेष आयोजन श्रीहनुमान और श्रीराम हैं अभिन्न, एकोब्रहमद्वितियोनास्ति

दिनांक 29 मार्च 2018, स्थान – पावन यज्ञस्थली कैथा से, गढ़ गंगेव रीवा मप्र

(कैथा, शिवननाद द्विवेदी, रीवा मप्र)

श्रीहनुमान प्रकटोत्सव पर विशेष – यज्ञस्थली कैथा मे विशेष आयोजन श्रीहनुमान और श्रीराम हैं अभिन्न,एकोब्रहमद्वितियोनास्ति

      श्रीहनुमान प्रकटोत्सव के अवसर पर पावन यज्ञस्थली कैथा स्थित अति प्राचीन श्रीहनुमान मंदिर प्रांगण मे दिनांक 30 से 31 मार्च तक ॐ नमः शिवाय के अखंड जाप एवं संकीर्तन का कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम 24 घंटे अनवरत चलेगा। इस बीच क्षेत्र मे भक्तों एवं श्रद्धालुओं से मंदिर प्रांगण मे पहुचने और कार्यक्रम मे सहभागिता की अपील की गई है।

श्रीहनुमान प्रकटोत्सव पर विशेष – हनुमान बिना रामराज्य की कल्पना है अधूरी,

हनुमान न होते तो श्रीराम के बिगड़े काम न होते

      तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस एवं बाल्मीकीकृत रामायण कालजयी इतिहास ग्रंथ हैं जिनमे भगवान श्रीराम के आदर्श चरित्र का सुंदर वर्णन मिलता है। अभी कुछ ही दिन पूर्व चैत्र नवरात्रि की रामनवमी को राम प्रकटोत्सव मनाया गया जिसमे भगवान श्रीराम के पावन चरित्र की चर्चना हुई, जगह जगह उत्सव मनाया गया और साथ ही श्रीराम कथा आदि कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इस बीच भगवान श्रीराम के सुंदर पावन चरित्र के अनुकरण कर भटकते हुये भारतीय एवं वैश्विक समाज को नई दिशा देने की बातें आयीं। सम्पूर्ण रामायण और श्रीराम चरित मानस ग्रंथ ही प्रभु श्रीराम और श्री हनुमान के महान कृत्यों से भरा पड़ा है। पर जब भी हम रामायण का पाठ करते हैं और तुलसीकृत श्रीरामचरित मानस की चौपाइयाँ और दोहे गाते हैं तो देखते हैं की श्रीराम के सभी महत्वपूर्ण कार्यों मे श्रीहनुमान का कितना सुंदर योगदान है। चाहे वह माता सीता की खोजकर रावण के अहंकार की प्रतीक लंका को धू धू करके जलाना रहा हो,चाहे रावण के राक्षसी समाज के मनोबल को चूर चूर करना रहा हो, चाहे लक्ष्मण के शक्ति बाण लगने पर हिमालय के दुर्गम क्षेत्र से संजीवनी बूटी सहित पहाड़ उखाड़कर लाना रहा हो, चाहे अहिरावण को मारकर पाताल लोक से राम-लक्षमन को कंधे मे बैठाकर लाना रहा हो। यह सभी दुर्गम कार्य थे जो किसी के बस के नहीं थे ऐसे मे श्रीहनुमान ही याद आए और उन्होने अपने प्रभु श्रीराम के प्रति सम्पूर्ण भक्ति और निष्ठा सेवाभाव से दुर्गम से दुर्गम कार्यों को हँसते हुये और जय श्रीराम कहकर पूरा किया। इसीलिए जब रावण ने छल पूर्वक सीतामाता को अपहरण कर लंका स्थित अशोक वाटिका के नीचे छोड़ दिया और श्रीहनुमान सैकड़ों योजन समुद्र लांघ कर जब लंका सीतामाता की खोज करने पहुचे और असंभव कार्य किए तो सीता जी प्रसन्न होकर श्रीहनुमान को अजर अमर होने और अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों का वरदान दिया। श्रीहनुमान को कलयुग का देवता बताया।

श्रीहनुमान की जयंती नहीं बल्कि प्रकटोत्सव मनाया जाता है

      श्रीहनुमान की जयंती नहीं मनाई जाती क्योंकि जयंती उसकी मनाई जाती है जिसका जन्म हुआ और फिर मृत्यु हुई हो। परंतु श्रीहनुमान अजर अमर हैं कलयुग के देवता हैं। श्रीहनुमान का गर्भज जन्म नहीं हुआ है बल्कि श्रीहनुमान प्रकट हुये हैं,अवतार लिए हैं। अतः श्रीहनुमान की जयंती नहीं बल्कि प्रकटोत्सव मनाया जाना चाहिए। श्रीहनुमान अमर हैं भगवान शिव के 11 वें रुद्रावतार माने गए हैं। भगवान शिव के अंश हैं। जब रावण जैसे घोर असुर राक्षस के अधर्म अत्याचार अनाचार का साम्राज्य तीनों लोकों मे अत्यधिक बढ़ गया और इसकी अति हुई तो ब्रह्मा विष्णु महेश ने धरती माता के बोझ को उतारने के लिए और धर्म की  स्थापना के लिए अपना श्रीराम अवतार जो की मर्यादा पुरुषोत्तम है का अवतार ग्रहण किया। इस प्रकार इस प्रभु लीला मे सभी देवी देवताओं ने अपने अपने अंश को इस पृथ्वी पर अवतार लेकर भेजा। यहाँ तक की जिनहे बानर भालू समझा गया वह सब सामान्य बानर भालू न होकर सभी देवताओं के अवतार ही हैं। इस प्रकार श्रीहनुमान भगवान शिव के अवतार हैं जो प्रभु राम की लीलाओं मे सम्मिलित हुये। ऐसा नहीं है की श्रीहनुमान अथवा श्रीराम मे कोई भिन्नता है। दोनों अद्वैत हैं। एक है दूसरा नहीं – यही है अद्वैत वाद का सिद्धान्त। ईश्वर मात्र एक ही है। क्योंकि दो होते तो आधिपत्य की लड़ाई प्रारम्भ हो जाती और शृष्टि का संतुलन बिगड़ता। जिस प्रकार ईश्वर के तीनों स्वरूपों ब्रह्मा विष्णु महेश मे कोई अंतर नहीं है और तीनों एक ही हैं। परम ब्रह्म के तीन स्वरूप ब्रह्मा विष्णु महेश अर्थात शिव हैं। परम शक्ति को जब इस शृष्टि के निर्माण के माया के खेल को खेलना होता है तब वह सर्वज्ञ, सर्व अंतर्यामी, कालातीत, अवस्थातीत, कण कण मे व्याप्त, भूत भविष्य वर्तमान का ज्ञाता परम ब्रह्म परमेश्वर अपने तीनों स्वरूपों ब्रह्मा विष्णु महेश के रूप मे आता है। ब्रह्मा रचनात्मकता, विष्णु पालन करने, और महेश अर्थात महादेव शिव अत्याचार अनाचार बढ्ने पर संहार के प्रतीक हैं। इसी प्रकार दर्शन ग्रन्थों मे प्रकृति के तीनों गुणों सत्व रज और तम को भी ब्रह्मा विष्णु एवं महेश से जोड़ा गया है। सत्व प्रारम्भिक अवस्था है जब संतुलन स्थापित रहता है जब सब कुछ अच्छा ही अच्छा रहता है जब इस शृष्टि के निर्माण की बात होती है। रजोगुण शृष्टि निर्मित होकर चलाने मे प्रधान होता है क्योंकि शृष्टि के संचालन मे क्रियत्मकता अथवा एक्टिविटी की प्रधानता होती है। जब शृष्टि मे एक बार अत्याचार, अनाचार,अधर्म का प्रभाव अत्यधिक सीमा से अधिक बढ़ जाता है तब इस शृष्टि को संहार करने के लिए और इसे पुनः प्रारम्भिक अवस्था जो नासदीय सूक्ति मे वर्णित है मे बदलने के लिए तमोगुण की ही आवश्यकता होती है। क्योंकि सत्व और रजोगुण पूरी तरह से संहार नहीं कर सकता इसके लिए तम की आवश्यकता होती है। क्योंकि इसमे फिर बुद्धि को एकाग्र कर असंभव कार्य को करना होता है। मात्र कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं। जैसे केदारनाथ मे कठोर निर्णय लिया। यह नहीं देखा की कौन जीवित रहेगा और कौन मरेगा। सब को समूहिक रूप से मोक्ष प्रदान कर दिया। ऐसी क्या बात रही होगी की केदारनाथ स्वामी ने इतना तामसिक और संहारक स्वरूप दिखाया?कुछ न कुछ तो बात रही होगी। अब उसकी माया को वही जान सकता है। इस प्रकार यहाँ से भलीभाँति समझा जा सकता है ईश्वर के सभी स्वरूप समान और बराबर होते हैं उनके आवश्यकता और समयानुसार मात्र कार्य अलग अलग बंटे हुये रहते हैं। जैसे किसी व्यक्ति का उसके घर मे अलग नाम और बाहर के लोग अलग तरह से जानते है। जैसे एक व्यक्ति को उसके माँ बाप उसे बेटे के रूप मे जानते हैं पत्नी पति रूप मे, भाई भाई के रूप मे, दोस्त दोस्त के रूप मे, कर्मचारी अपने बॉस के रूप मे, और हर कोई अपने अपने नजरिए से देखते हैं वैसे ही भगवान एक ही है उसके अनंत नाम और अनंत रूप हैं। जो उसे जिस भाव से पूजता मानता है वह उसे उसी भाव मे मिल जाता है। श्रीकृष्ण ने श्रीमद भगवद गीता मे अर्जुन को यहाँ तक बता दिया की हेय अर्जुन इस शृष्टि मे सब कुछ मई ही हूँ। सबकी आत्मा मे सभी जीवों मे सम्पूर्ण ब्रह्मांड मे मै ही मै हूँ और मुझसे अलग कुछ नहीं है। यहाँ तक यह सम्पूर्ण शृष्टि मेरे अंश मात्र मे ही टिकी है।  

   अब यदि श्रीहनुमान के पावन चरित्र पर आते हैं तो पाते हैं श्रीहनुमान जी के बिना राम का काज अधूरा है। क्या कवि के पास श्रीहनुमान का कोई विकल्प है? नहीं, बिलकुल नहीं। यदि हनुमान का विकल्प होता तो जरूर उस विकल्प की बात होती परंतु राम के सभी महत्वपूर्ण और असंभव कार्यों मे हनुमान ही हैं, उनके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं। अतः यह स्पष्ट है की यदि श्रीहनुमान नहीं होते तो राम के काज पूरे नहीं होते। हनुमान और राम एक दूसरे से अलग नहीं हैं इसीलिए जब एक बार बात आई तो श्रीहनुमान ने अपना सीना चीरा तो उसमे सीताराम ही दिखे। भले ही दैहिक दृष्टि से श्रीहनुमान अलग और श्रीराम अलग दिखें लेकिन सूक्ष्म रूप मे आत्मिक रूप मे दोनों एक ही हैं। राम मे हनुमान समाहित हैं और हनुमान मे तो राम समाहित ही हैं। अतः हनुमान और राम एक दूसरे के पूरक हैं। अद्वैत हैं। अलग नहीं हैं।

      आज के इस कलयुग के समय मे सबसे बड़ी आवश्यकता है भगवान श्रीराम और श्रीहनुमान के पावन चरित्र के अनुकरण की और उस दृष्टि से देखा जाय तो भारतीय और वैश्विक समाज पीछे जा रहा है।

जय श्रीराम

संलग्न – कैथा श्रीहनुमान मंदिर प्रांगण मे आयोजित कार्यक्रमों की तस्वीरे।

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  शिवानंद द्विवेदी, संयोजक एवं प्रचारक, श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति भारत रीवा मप्र।

मोबाइल – 7869992139, 9589152587,

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