Wednesday, 28 March 2018

कैथा मे श्रीहनुमान मंदिर एवं देवी मंदिर मे निकाला गया परंपरागत जवारे का जुलूश, सिरे आई देवी ने दूर किया भक्तों के दुख कष्टों को, बांटा भभूत और बीरा

दिनांक 28 मार्च 2018, स्थान - गढ़/गंगेव, रीवा मप्र 

(कैथा, शिवानंद द्विवेदी)

     यज्ञों की पावन स्थली कैथा मे परंपरागत रूप से प्रति वर्ष चैत्र नवरात्रि के समय निकाला जाने वाला जवारे का जुलूश निकाला गया जिसमे मुख्य रूप से कैथा मे रह रहे हरिजन आदिवाशी समूहों ने अपना नौ दिन का व्रत तोड़ते हुये जवारे का विसर्जन देवी मंदिर कैथा मे किया। समान्यतया हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक चैत्र नवरात्रि मे प्रारम्भ से ही जवारे की बोवनी की जाती है जो नवें दिन तक बड़े हो जाते हैं जिनको किसी पास ही स्थित धर्मस्थल और मूलरूप से किसी देवी मंदिर मे ले जाकर विसर्जित किया जाता है। इस जुलूश मे छोटे बड़े महिलाएं पुरुष सभी सम्मिलित होते हैं और जुलूश का पूरा आनंद लेते हैं। 


   परंपरानुसार जुलूश मे देवी साधक के सिरे मे देवी सवार होने की प्रथा होती है। जिससे वह व्यक्ति विभिन्न मुद्राओं मे नृत्य करता हुआ दूसरे भक्त श्रद्धालुओं को राख़ की भभूत भी देता है जिसमे यह मान्यता है की जो भी व्यक्ति उस भभूत को लेता है उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। ग्रामों की मान्यताओं के अनुसार जिसके सिरे मे देवी सवार होती हैं उस देवी भक्त से अन्य पीड़ित लोग बीरा भी ग्रहण करते हैं जिसका तात्पर्य होता है की कुछ विशेष अभिमंत्रित शक्तियों के रूप मे राख़ भरकर किसी छोटी डिबिया मे दिया जाता है जो पीड़ित व्यक्ति पूरे सालभर धारण करता है। एक साल पूरा होने के बाद ऐसी मान्यता होती है पीड़ित व्यक्ति पुनः जाकर बीरा लेता है जिससे उसे आगे भी कोई आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक समस्याएँ न हों। 

विश्वास से बड़ा कुछ नहीं - गरीबों द्वारा इन लुटेरों डाक्टरों के पीछे लाखों खर्च करने से तो बेहतर ही है मात्र चुटकी भर विश्वास की भभूत  

       सही मायने मे यदि देखा जाए तो अँग्रेजी मे एक शब्द है फेथ हीलिंग का, जिसका तात्पर्य होता है किसी भी दृश्य अथवा अदृश्य शक्ति मे पूर्ण विश्वास का होना। जैसे लगभग सभी धर्मों संप्रदायों के लोग किसी न किसी शक्ति पर विश्वास रखते हैं चाहे वह अल्लाह पर हो अथवा जीसस क्राइस्ट पर ठीक इसी प्रकार हिन्दू मतावलंबियों मे भी भक्त लोग ईश्वर के किसी स्वरूप देवी देवताओं और ईश्वर पर विश्वास रखते हैं। और आज यह बात वैज्ञानिक तौर से भी सिद्ध हो चुकी है की विश्वास से बढ़कर कुछ नहीं है। वह चाहे ईश्वर पर हो अथवा अपने ऊपर, जो भी महत्वपूर्ण कार्य होते हैं वह विश्वास से ही संभव हैं। बिना विश्वास के कुछ संभव नहीं है। यहाँ तक की श्रीमद भगवद गीता मे भगवान श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को ज्ञान देते हुये बताया की हे अर्जुन मै जो भी कहता हूँ उस पर तू पूर्ण विश्वास और श्रद्धा रख चूंकि जो संसयात्मा है वह नष्ट हो जाता है अर्थात शंसय करने वाला व्यक्ति कभी भी अपने लक्ष्य को प्राप्त नही कर सकता अतः तू जो भी कर उसमे संशय मत कर। 


    तो यदि ग्राम क्षेत्र के गरीब मजदूर और कम पढे लिखे लोग ईश्वर के देवी रूप मे विश्वास करते हैं और बीरा भभूत लेकर साल भर अथवा जीवन भर प्रसन्न रह सकते हैं तो निश्चित रूप से माफिया बन चुके और लुटेरे उन डाक्टरों से तो बेहतर ही है जिनके पीछे लाखों करोड़ों खर्च कर देने के बाद भी किसी दैहिक अथवा मानसिक बीमारी का पुख्ता इलाज हो पाये यह बिलकुल ही स्पष्ट नहीं है। भभूत बीरा तो यमदूत बन चुके ऐसे डाक्टरों से ज्यादा ही बेहतर और शुखद है। 

जवारा विसर्जन प्राचीन ग्रामीण परंपरा -

    ग्राम क्षेत्रों मे जावरा बोवनी और फिर पूरे जुलूश के साथ उसका विसर्जन एक प्राचीन ग्रामीण परंपरा है जिसे कई लोग तो श्र्द्धा के रूप मे लेते हैं और कई लोग इसे लेकर आनंदित भी होते हैं क्योंकि जिस व्यक्ति के सिरे मे देवी सवार होती हैं वह विभिन्न प्रकार से मनोरंजन करते हुये जुलूश देखने के लिए इकठ्ठा हुये अन्य भक्तों का मनोरंजन भी करते हैं। देवी विभिन्न मुद्राओं मे खप्पर तलवार लेकर नृत्य करती हैं। जिस व्यक्ति के सिरे मे देवी आती हैं वह काली माता का मुकुट अथवा मुखौटा भी लगाता है जिससे हांथ मे खप्पर और तलवार लेकर नृत्य करते समय ऐसा प्रतीत होता है मानों साक्षात कालिका धरती पर अवतरित हुई हैं और तांडव नृत्य करने वाली हैं।  

 संलग्न - कैथा श्रीहनुमान मंदिर मे आए हुये जवारे का दृश्य जिसमे कैथा ग्राम के हरिजन भाइयों बहनों ने देवीमंदिर कैथा मे जाकर जवारे का विसर्जन किया। 

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शिवानंद द्विवेदी, सामाजिक मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र। 


मोब - 0786999213909589152587 (whatsapp)


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