दिनाँक 23 अगस्त 2018, स्थान - गढ़/गंगेव, रीवा मप्र
(कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी)
यज्ञों की पावन स्थली कैथा के श्रीहनुमान मंदिर प्राँगण में दिनांक 23 अगस्त दिन बृहस्पतिवार को श्रीमद भागवत का पांचवा दिन रहा. इस बीच आचार्य श्री दिलीप जी महाराज के मुखारविंद से अमृतमयी मोक्षप्रप्रदायनी भागवत कथा का परायण एवं प्रवचन कार्य सतत चल रहा है.
चौथे दिन की कथा के बाद पांचवें दिन की कथा में सातवें, आठवें, नौवें एवं दसवें स्कंध की मूल कथा प्रसंगों का वर्णन हुआ. दसवें स्कंध की कथा के साथ ही श्रीकृष्ण जी का जन्म एवं उनकी बाल लीलाओं का समावेश हुआ. उपस्थित भक्त श्रद्धालुओं ने दिनांक 22 अगस्त बुधवार की कथा में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाया. वहीं दिनांक 23 अगस्त की कथा श्रीकृष्ण जी की बाल लीलाओं पर केंद्रित रही. पिछले दिनों भगवान के दशावतारों में से भगवान श्रीराम के भी अवतार की चर्चना हुई जिंसमे आचार्य जी ने श्रीराम सहित चारों भाइयों की कथा की व्याख्या करते हुए कथा की आध्यात्मिक गहराईयों की चर्चना भी की.
दसवें स्कंध की चल रही कथा
दसवें स्कंध की कथा प्रेमरस प्रदायिनी श्रीकृष्ण कथा की महत्वा के साथ प्रारम्भ हुई जिंसमे वसुदेव देवकी विवाह, आकाशवाणी तथा कंस द्वारा देवकी के छः संतानों की हत्या, भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य, गोकुल में भगवान का जन्मोत्सव, भगवान शिवशंकर का अवधूत वेश में बालकृष्ण का दर्शन, पूतना उद्धार, तृणावर्त उद्धार, नामकरण संस्कार एवं बाललीला, मिट्टी खाने के बहाने यशोदाजी को श्रीकृष्ण द्वारा अपने मुख में ब्रह्मांड दर्शन, कृष्णलीला से साहसिक समाधि, मैया यशोदा का स्नेहपुरित वात्सल्य, श्रीकृष्ण का मूसल से बंधा जाना, यमलार्जुन उद्धार आदि कथा प्रसंगों का वर्णन हुआ.
प्रेमरस प्रदायनी मोक्षप्रदायनी है श्रीकृष्ण कथा
श्रीमद भागवत कथा सात दिनों में मुक्ति दिलाने वाली है. आचार्य जी ने बताया की ब्राह्मण पुत्र के श्राप के बाद महाराज परीक्षित को सात दिवश के भीतर तक्षक नामक नाग के काटने से मृत्यु होना बताया गया. सात दिन में मृत्यु होने का तात्पर्य का वर्णन करते हुए आचार्य जी ने बताया की सभी को इन सात दिनों के भीतर ही शरीर छोड़ना होता है क्योंकि सप्ताह में मात्र सात दिन ही होते हैं आठवां नही.
मृत्युशैया पर बैठे व्यक्ति का क्या कर्तव्य होना चाहिए - परीक्षित जी का प्रश्न
श्री शुकदेव जी के समक्ष उपस्थित होकर महाराज परीक्षित ने जो जनहितैसी प्रश्न किया उसकी गहराईयां समझाते हुए आचार्य जी ने बताया की हड़बड़ाहट और भय में व्यथित न होकर धैर्य सामर्थ्य का परिचय देते हुए और अपने राजा के कर्तव्य का पालन करते हुए महाराज परीक्षित ने अपने व्यक्तिगत उद्धार की नही बल्कि जनहित में यह प्रश्न रखा की मृत्युशैया पर विराजमान अर्थात ऐसा व्यक्ति जिसकी मृत्यु होना निकट है जिसका की उसे पूर्णरूपेण पता चल जाए, ऐसे व्यक्ति को कौन से कार्य करने चाहिए. इस प्रकार श्री शुकदेव जी ने मोक्षप्रदायक भागवत सप्ताह कथा कही।
मुक्ति मन को मिलती है आत्मा को नही, क्योंकि आत्मा तो नित्य मुक्त है
आचार्य जी ने वैदिक वाक्यों का बखान करते हुए आगे बताया की आत्मा अजर, अमर, शास्वत, सनातन, सच्चिदानंद स्वरूप परम ब्रह्म का परम अंस है अतः वह नित्य आनंदमयी, नित्य सत्य, एवं नित्य मुक्त है. कालजयी ग्रंथ एवं ब्रह्मविद्या उपनिषद श्रीमद भगवद गीता में स्पष्ट रूप से श्रीकृष्ण ने ही अर्जुन को शिक्षा देते हुए बताया की हे अर्जुन इस धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में उपस्थित होकर नपुंसकता मत दिखाओ क्योंकि आर्यों के लिए तो यह बिल्कुल ही शोभा नही देता क्योंकि जिस शरीर के मोह में तुम फंसे हुए हो वह तो पैदा लेते ही मर जाता है क्योंकि जिसका जन्म है उसकी मृत्यु सुनिश्चित है. अतः मृत की चिंता करना छोड़ दो. आत्मा को न तो हवा उड़ा सकती, न पानी भिंगो सकता, न अग्नि जला सकती है क्योंकि वह तो हमारा अर्थात परम तत्व का अंस है.
आत्मा की मुक्ति का तो प्रश्न ही नही, मुक्ति तो मन को मिलती है क्योंकि जिस समय यह मन इस भव बंधन से मुक्त होता है उसी समय मुक्ति मिल जाती है. दर्शनशास्त्रियों ने भी इसकी व्याख्या करते हुए बताया है की मन ही है जो व्यक्ति के बंधन और मुक्ति का कारण है अतः अपनी दशों इंद्रियों को साधो और जब इंद्रियां सध जाएं तो मन को साधो क्योंकि यह मन ही समस्त पाप का कारण है. काम, वासना, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और द्वैतभाव में बंधा हुआ यह मन जीव को इस सन्सार सागर में घुमाता रहता है. जीव को मुक्त नही होने देता अतः मन को पहले मुक्त करना चाहिए. माया से मुक्त मन ही ईश्वर प्राणिधान की दिशा में अग्रसर हो सकता है.
आचार्य आदि शंकर के अद्वैतवाद में ईश्वर और जीव एक है
दर्शन पर जाते हुए आचार्य श्री दिलीप पयासी जी महाराज ने आगे बताया की हमारे ऋषि मुनियों, दर्शनशास्त्रियों, और महात्माओं योगियों ने दार्शनिक स्तर पर हमारे वैदिक और उपनिषदिक सिद्धान्तों की बहुत ही बेहतरीन व्याख्या की है. हमारे छहों मुख्य दर्शन ग्रंन्थों में ईश्वर और आत्मा की ही प्रधानता रखी गई है और उसके आधार पर ही इस सृष्टि को समझने का प्रयाश किया गया है.
आचार्य जी ने बताया की आज सम्पूर्ण संसार में सबसे अधिक चर्चित दर्शन सिद्धांत आचार्य आदि शंकर जी का है. गुरुदेव शंकर का जन्म दक्षिण भारत में हुआ था और उनकी शिक्षा दीक्षा नर्मदा नदी के तट पर हुई थी. आगे बनारस जाकर काशी नगरी में भगवान शिव की नगरी में विश्वनाथ जी की कृपा से उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ जहां साक्षात भगवान शिव ही एक कसाई के रूप में आकर आचार्य शंकर की परीक्षा लिए और उन्हें अंतिम और आत्म ज्ञान प्रदान किया.
आचार्य शंकर ने अपने अद्वैत सिद्धांत में बताया की ईश्वर और जीव एक ही हैं अलग नही हैं. यह अलग होने का भेद मात्र इस अज्ञान और माया के कारण ही दिखाई देता है. जब अज्ञान का आवरण मन मस्तिष्क से दूर हो जाता है तो मन को मुक्ति मिल जाती है. उन्होंने विभिन्न प्रकार से उपमाएं देते हुए बताया की रात के अंधेरे में रस्सी को देखकर सर्प होने का एहसास होने से अचानक मन में डर उत्पन्न होता है लेकिन प्रकाश करने पर रस्सी का आभास होने से सर्प का भय दूर हो जाता है, अतः यह संसार भी आभासी ही है जब अज्ञान का आवरण हट जाता है तब हम संसार में एकरूपता देखते हैं. इसी प्रकार जल का उदाहरण देते हुए बताया की जल का स्वभाव तो सीतलता है मगर जब हम अग्नि से जल को गरम करते हैं तो उसमे उष्णता आती है, यह उष्णता मात्र आभासी है. वह उष्णता मिटने में बाद जल पुनः अपने शीतलता के स्वरूप में आ जाता है. इसी प्रकार घटाकाश और व्यापक आकाश का उदाहरण देते हुए आचार्य जी ने बताया की खाली घड़े के अंदर भी एक आकाश होता है जिंसमे आभासी तौर पर ऐसा आभास होता है यह आकाश घड़े में समाहित होता है लेकिन जब घड़ा फोड़ दिया जाता है तो घड़े के अंदर का आकाश व्यापक आकाश में बदल जाता है, अतः यह भेद भी आभासी है. इसी प्रकार यह आत्मा जब इस शरीर योनि में होती है तो ऐसा लगता है की जीव बंधा हुआ है उस शरीर मात्र से, लेकिन जैसे में आत्मा शरीर को छोड़ मुक्त होती है वह उस सर्वव्यापक परमेश्वर से मिल जाती है और शरीर का आभास या भेद पूर्णतया मिट जाता है.
आचार्य शंकर के सिद्धांत और उनके अनुयायी अन्य मतों का खंडन करते हुए बताते हुए कहते हैं की यदि जीवात्मा को परमात्मा से अलग मान लिया जाएगा तो सर्वव्यापक परमात्मा खंडित हो जाएगा क्योंकि आत्मा यदि ईश्वर अंस है तो वह अंस उस ईश्वर से अलग नही हो सकता है. क्योंकि जब किसी अंशभाग को आप मूल से अलग करेंगे तो मूल खंडित हो जाएगा. अतः आचार्य शंकर के मतों के अनुसार जीव और ईश्वर एक ही हैं वह अलग नही हैं. मात्र अज्ञान के कारण भ्रम उत्पन्न है इसलिए मॉनव मन उसे अलग समझता है.
द्वैतवाद के अनुसार जीव और ईश्वर अलग अलग हैं
वहीं दार्शनिक स्तर पर रामानुजाचार्य, बल्लभाचार्य आदि द्वैतवाद सिद्धांत कहते हैं की जीव और ईश्वर अलग अलग ही हैं. यहां पर अपने अपने दार्शनिक मत देते हुए द्वैतवाद के दार्शनिक बताते हैं की देखिए समुद्र का उदाहरण लीजिये. जिस प्रकार यह समुद्र होता है उसमे पृथिवी का सम्पूर्ण जल समाहित होता है और उसी जल से वर्षा से लेकर सम्पूर्ण पृथ्वी में उसका प्रयोग होता है अतः परमात्मा उस समुद्र के समान ही है जिंसमे से अंस रूपी आत्मा अलग होते हुए भी मूल समुद्र के जल को प्रभावित नही कर पाती है. क्योंकि समुद्र से कुछ बूंदें निकाल भी दी जाएं तो भी समुद्र के मूल स्वभाव और उसके जल में कोई परिवर्तन नही होता है.
इस प्रकार आचार्य जी ने सभी दार्शनिक सिद्धान्तों का निचोड़ लेते हुए बताया की हमारे हिन्दू धर्म दर्शन में सभी सिद्धान्तों को आजादी है जिसे जो सिद्धांत पसंद हो उसका अनुकरण कर सकता है दूसरे अन्य वैश्विक सम्प्रदायों की तरह हिन्दू वैदिक धर्म दर्शन में कोई पावंदी नही है. अपने गुण स्वभाव रुचि के अनुसार किसी भी सिद्धांत का पालन करते हुए धर्म के मार्ग पर चलते हुए, सत्य, शौच, अहिंसा, सत्कर्म का पालन करते हुए व्यक्ति ईश्वर के किसी विशेष स्वरूप में अधिष्ठ होकर अपने जीवन को आस्तिकता पूर्वक धन्य बना सकता है.
आचार्य जी ने बताया की कृष्णकथा की यही महिमा है की देहभान भुला देती है. अपना देहभान भूलने पर ही मानव आध्यात्मिक स्तर पर पहुंच सकता है. कृष्णकथा महिमामयी है. इस कथा में लीन मन जगत को भूल जाता है. संसार का सम्पूर्ण विस्मरण एवं परमात्मा का सतत स्मरण ही तो मुक्ति है. मनुष्य का मन किसी न किसी रस में फंसा हुआ होता है अतः सभी रसों को भूलकर मात्र कृष्णभक्ति के रस में डूब जाने पर ही कृष्ण की प्राप्ति हो सकती है.
संलग्न - कृपया संलग्न कार्यक्रम की फ़ोटो देखने का कष्ट करें.
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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,
ज़िला रीवा, मप्र, मोबाइल 9589152587, 7869992139
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