Tuesday, 21 August 2018

कैथा में भागवत कथा का तीसरा दिन - सत्य एक ही है ज्ञानी उसे अलग अलग नाम से बखान करते हैं

दिनाँक 21 अगस्त 2018, स्थान - गढ़/गंगेव, रीवा मप्र 

(कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी)

  यज्ञों की पावन स्थली कैथा के प्राचीन श्रीहनुमान मंदिर प्राँगण में आचार्य श्री दिलीप जी महाराज के मुखारविंद से दिनाँक 18 अगस्त से प्रारम्भ हुई श्रीमद भगवद कथा अविरल प्रवाहित हो रही है. दिनांक 21 अगस्त दिन मंगलवार को कथा प्रवचन का तीसरा दिन रहा. इस बीच भागवत महापुराण के द्वितीय एवं तृतीय स्कंध का परायण एवं प्रवचन चल रहा है. कैथा, मिसिरा, सोरहवा, बड़ोखर, करहिया, डाढ़, हिनौती, अकलसी, अमिलिया, पडुआ सहित आसपास के कई ग्रामों के भक्त श्रद्धालुगण कार्यक्रम में पहुंच रहे हैं और भागवत कथा का रसपान कर रहे हैं. 

   भागवताचार्य श्री दिलीप पयासी जी महाराज ने बताया की भागवत कथा एक ऐसा फल है जिंसमे मात्र रस ही है गुठली नही इसीलिए भागवत कथा का रसपान करने के लिए कहा गया है. 

आचार्य ने बताया मंगलाचरण का महत्व

   आचार्य जी ने मंगलाचरण का महत्व बताते हुए कहा की सत्कर्म मार्ग में अनेक बिघ्न उत्पन्न होते हैं उन सभी विघ्नों के निवारण के लिए मंगलाचरण की आवश्यकता होती है. मंगलाचरण का तात्पर्य होता है जिसका आचरण मंगलमय हो. अतः कथा में बैठने के पहले, कोई भी शुभ कर्म करने के पहले मंगलाचरण करना चाहिए जिससे बिघ्न उत्पन्न न हों. बताया गया की शास्त्र कहते हैं की देवगण भी सत्कर्म में बिघ्न उत्पन्न करने का प्रयाश करते हैं. इन्द्रादि देवों ने विश्वामित्र आदि ऋषियों और महात्माओं के द्वारा किये गए यज्ञ, तप आदि में बिघ्न उत्पन्न करने के प्रयाश किये. देवों ने सोचा की यदि मॉनव तप यज्ञ करके शक्ति प्राप्त कर लेंगे और नारायण के समान हो जाएंगे तो उन देवों के लिए खतरा उत्पन्न होगा इसलिए भी देवता गण विक्षेप उत्पन्न करते हैं. अतः देवों की भी प्रार्थना करनी होती है की हे देवो! हमारे सत्कर्मों में विक्षेप उत्पन्न न करें. सूर्य हमारा कल्याण करें, वरुण देव हम पर कृपा करें आदि. काम का चिंतन न करें क्योंकि काम का चिंतन करने से मन में काम वासना आती है जिससे क्रोध उत्पन्न होता है और फिर बुद्धि तर्कसंगत निर्णय, कल्याणकारी निर्णय लेने में सक्षम नही होती. श्रीकृष्ण जी पूर्णब्रह्म हैं जिनमे काम लेश मात्र भी नही अतः उनका चिंतन करने से, ईश्वर का चिंतन करने से काम वासना नष्ट होकर निष्काम भक्ति प्राप्त होती है. 

   आचार्य जी ने बताया की प्रभात, मध्यान्ह और रात में सोते समय मंगलाचरण करना चाहिए. व्यास जी ने बताया की ईश्वर के किसी एक स्वरूप का चिंतन मनन करना चाहिए जिससे मन उस स्वरूप में अवस्थित हो जाए जिससे ईश्वर के उस स्वरूप के प्राप्ति हमारी निष्ठा मजबूत हो. आचार्य जी ने बताया की ध्यान का अर्थ मानस दर्शन से है. राम कृष्ण अथवा शिव किसी भी एक स्वरूप का ध्यान करने से हमारे मन में उन्ही प्रभु के गुण आने लगते हैं और हमारा मन सत्कर्म में प्रवित्त होता है और समस्त मनोविकार नष्ट होकर मोक्ष की दिशा में अग्रसर होते हैं. मंगलाचरण करने से ब्रह्मांड की समस्त शक्तियां प्रसन्न होकर शुभ कार्य में सहयोग करती हैं. इसलिए सभी शुभ कर्मों के पहले और शांत मन से संध्या वंदन के पहले मंगलाचरण करना चाहिए.

एकं सद विप्रह बहुधा बदन्ति - एक ही सत्य को ज्ञानी लोग अलग अलग रूप में बखान करते हैं

  आचार्य जी ने वेद वाक्यों का वर्णन करते हुए बताया वेद का कथन है की एकं सद विप्रह

बहुधा बदन्ति अर्थात ईश्वर सत्य है और वह एक ही है. क्योंकि सत्य एक ही हो सकता है यदि वह सत्य नही है तो असत्य है परंतु सत्य दो नही हो सकते, अतः ईश्वर एक ही है. उसी सत्य को ज्ञानी लोग अलग अलग नाम से बखान करते हैं. जैसे आईना एक ही है जिसका गुणधर्म है उसके समक्ष जो भी वस्तु रखी जाती है वह उसी का प्रतिबिम्ब दिखाती है. ठीक इसी प्रकार ईश्वर एक ही है और जो भी व्यक्ति उसको जिस भाव से देखता है उसे उस सत्य रूपी ईश्वर में वही दिखता है. कोई उसे ईश्वर राम के रूप में मानता है कोई श्रीकृष्ण के रूप में तो कोई शिव तो कोई देवी स्वरूप में तो कोई अन्य स्वरूप में पर वह ईश्वर है एक ही. 

    आचार्य जी ने आगे बताया की दूसरे सम्प्रदायों के लोग हिन्दू वैदिक धर्म के बारे में भ्रांतियां पाल कर रखते हैं और कहते हैं हिन्दू धर्म में बहुत से देवी देवताओं की पूजा का विधान है परंतु ऐसा नही है. और इसी वेद वाक्य में सम्पूर्ण वैदिक धर्म का दर्शन समाहित है और हिन्दू धर्म की विशालता को स्पष्ट करता है. हिन्दू वैदिक धर्म इतना विशाल है की इसमे सभी कुछ समाहित है. वैदिक धर्म कोई सम्प्रदाय नही है बल्कि यह समग्र है. इसमे संपूर्णता है. 

संलग्न - कार्यक्रम की फ़ोटो संलग्न है. 

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र मोबाइल 9589152587, 7869992139

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